जन-जन का सहकार-1

जन-जन का जब हो सहकार,
मिल सकता आनंद-उपहार.

आप और हम इस बात पर तो सहमत ही होंगे, कि सरकार को अगर जन-जन का सहकार मिल जाए, तो हम आनंद का उपहार पा सकते हैं. अब देखिए न, कई दिनों से एक समाचार मन को परेशान कर रहा है-

सीतापुर में कुत्तों का आतंक, अब तक 13 बच्चों की मौत, स्कूल जाने के बजाय घरों में कैद हुए बच्चे
और
चंडीगढ़: आवारा कुत्तों ने पांच साल की बच्ची को नोंच-नोंचकर मार डाला

 

हमारे आसपास भी बहुत कुत्ते हैं, लेकिन यहां बच्चे बिंदास होकर आराम से अकेले भी घूम सकते हैं. यह सब हुआ है जन-जन के सहकार से. यहां कुछ लोगों ने इन कुत्तों के साथ इतनी मेहनत की है, कि न तो कुत्ते घूमते हुए दिखाई देते हैं और न बेवजह भौंकते हैं. यह सब कैसे हुआ?

सबसे पहले कुत्तों से प्यार बढ़ाया गया और उन्हें नियम से रोटी-पानी-दूध देकर किसी विशेष नाम से पुकारा गया.
नगर निगम के अधिकारियों से मिलकर उनकी नसबंदी करवा दी गई, ताकि उनकी संख्या और न बढ़ जाए.
सभी कुत्तों का टीकाकरण करवा दिया गया है और समय-समय पर पुनः टीकाकरण करवा दिया जाता है.
वे छाया की जगह ढूंढकर आराम से बैठे रहते हैं. जब उनके भोजन का समय होता है, तो सब आराम से लाइन में बैठ जाते हैं. भोजन लाने वाली मैडम अखबार में लपेटा हुआ भोजन चेक करके कुत्ते का नाम लेकर कहती हैं-
”बॉबी, यह आपके लिए है, गोनू यह तुम्हारे लिए है आदि-आदि.”
कोई मारधाड़ नहीं होती. जिस कुत्ते को चावल पसंद हैं उसे चावल-सब्जी, जिसे रोटी पसंद है उसे रोटी-सब्जी मिलता है. कोई कुत्ता चहारदीवारी की दीवार पर बैठकर खाना पसंद करता है, उसे वहीं भोजन दिया जाता है. 
कुछ परिवार सारा दिन यही काम करते हैं, बाकी लोग भी उनकी सहायता करते हैं.

 

जन-जन के सहकार की एक और बात अगली कड़ी में. आप लोग भी अपने अनुभव कामेंट्स में या नीचे दी गई मेल आइ.डी पर शेयर कर सकते हैं. हो सकता है आपका अनुभव आपके नाम से बलॉग के रूप में आए.

tewani30@yahoo.co.in

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।