करवट

कभी एक कहावत सुना करते थे-
”देखें ऊंट किस करवट बैठेगा?”
आजकल न तो यह कहावत सुनाई देती है, न ही ऊंट दिखाई देते हैं. ऊंट दिखाई भी कहां से देंगे? ऊंट तो रेत पर चलते हैं, हमने सब जगह कंकरीट के जंगल बना रखे हैं, तो बेचारे ऊंट को किनारा करना पड़ गया है. फिर पक्की सड़कों पर सरपट दौड़ती गाड़ियों की घरघर से डरकर ऊंट भागने-दौड़ने लगा, तो गाड़ियों को बचने-छुपने की जगह भी नहीं मिलेगी. कभी-कभी किसी मेले-ठेले में या किसी मूवी में आज भी ऊंट दिखाई दे जाते हैं. ऊंट भले ही न दिखाई दे, लेकिन ऊंट की करवट बखूबी दिखाई दे जाती है.

अब देखिए न, हमारे किचन के नल ने कैसी करवट बदली है. एक दिन डाइनिंग टेबिल पर बैठे हम दशहरी आम चूस रहे थे, कि किचन के नल से पानी की एक बूंद टपकती दिखाई दे गई. पानी की एक-एक बूंद बचाने का उपदेश देते हुए हमने दर्जनों ब्लॉग लिख डाले हैं, सो तुरंत इंटरकॉम करके प्लम्बर को बुलवाया. प्लम्बर ने जाने कैसे हाथ लगाया, कि बूंद गायब और प्लम्बर के हिसाब से नल की समस्या खत्म. फिर तो सारे नल चेक करवाए. शुक्र है सभी नलों को ठीक घोषित किया गया, अन्यथा जेठ की तपती लू में हमे वॉशर लेने भागना पडता.

ख़ैर साहब प्लम्बर महाशय तो आने के 20-40 रुपये झटककर चलते बने, लेकिन किचन के नल ने करवट बदलनी शुरु कर दी. कहां तो जल की प्रक्रति के अनुरुप सीधा नीचे की तरफ बहता था, अब पता ही नहीं किस करवट बहेगा. हम किचन का डस्टर (डस्टर गाड़ी नहीं, सफाई करने का कपड़ा) नियत जगह पर रखें, तो नल की करवट उसे भिगो देती है, डस्टर को उसकी करवट की पहुंच से दूर रख दें, तो नल की करवट कभी हमारे चेहरे पर नमूदार हो जाती है, कभी आंखों पर. नल को धीमा खोलें, तो नल रूठा-रूठा नजर आने लगता है. फिर उसे खुश करने के लिए गाना गाना पड़ता है-


”रूठे-रूठे से नल को मनाएं कैसे? रूठे-रूठे——”


नल को तेज खोलें, तो फिर वही करवट.

 

यह करवट सब जगह दिखाई दे रही है. अब देखिए न कर्नाटक में चुनाव हुए, तो लोगों ने कर्नाटक का संधि विच्छेद करते हुए उसे कर+नाटक क्या कहा, कि कर्नाटक में सचमुच कर्नाटक में सचमुच नाटक हो गया. अनेक ब्लॉगर्स ने कर्नाटक का नाटक ब्लॉग्स लिखे और आखिर कर्नाटक के नाटक ने कैसी करवट बदली, यह हम सबने देख लिया. अब सभी पार्टियों ने तेलंगाना, आंध्र, बंगाल और उड़ीसा पर फोकस करना शुरू कर दिया है. देखें वहां ऊंट किस करवट बैठता है?

विकास के लिए भी करवट की आवश्यकता महसूस होती है. इसका नजारा यूपी में देखने को मिला.

यूपीः 10 साल में नहीं बढ़ा बच्चन के ऐश्वर्या डिग्री कॉलेज का काम, लोगों ने चंदा कर बनाया अपना कॉलेज.

यूपी में बाराबंकी के दौलतपुर गांव में दस साल पहले बॉलिवुड के महानायक अमिताभ बच्चन अपनी पत्नी जया बच्चन, बेटे अभिषेक और बहू ऐश्वर्या राय बच्चन के साथ पहुंचे थे. उन्होंने गांव में ली गई दस बीघा जमीन पर श्रीमती ऐश्वर्या बच्चन डिग्री कॉलेज का नींव रखी थी. उनके इस डिग्री कॉलेज की नींव रखते ही लोगों के सपने ऊंची उड़ान भरने लगे. उनके मन में उम्मीदें खिलने लगीं, लेकिन दस साल बाद भी वह जमीन वैसी ही है. हैरानी की बात यह है कि कॉलेज के लिए जो शिलान्यास का पत्थर लगाया गया था, वह भी गायब हो गया. ऐसे में गांव के लोगों ने खुद अपना एक डिग्री कॉलेज बनाने का फैसला लिया और उसका निर्माण कराना शुरू कर दिया. अगले शैक्षिक सत्र से इस कॉलेज में पढ़ाई शुरू हो जाएगी. विकास के लिए ली गई इस करवट ने मन खुश कर दिया.

पहले कहावत चलती थी- ”भर जाता घाव तलवार का, बोली का घाव भरे ना.”
सब लोग इस कहावत पर चलते भी थे, अब तो बोली के घाव पर घाव दिये जा रहे हैं, वार पर वार किये जा रहे हैं और और इन वारों-घावों के वीडियो भी बनते जा रहे हैं, हां वह कहावत कहीं पीछे रह गई है. लगता है कहावत ने भी करवट बदल ली है.

क्रिकेट मैच में तो पल-पल करवट का बदलना दिखाई देता है. एक पल में समाचार आता है, दिल्ली डेयरडेविल्स ने मुंबई इंडियंस के खिलाफ जीता टॉस, बैटिंग का फैसला और तुरंत पॉप अप आने लग जाते हैं कि दिल्ली डेयरडेविल्स का एक विकेट गया, दूसरा-तीसरा-चौथा विकेट गया. हम तो करवट देखते ही रह जाते हैं.

युद्ध के क्षेत्र में करवट को कैसे भूला जा सकता है? सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) ने बताया है कि अंतरराष्ट्रीय सीमा पर पाकिस्तानी रेंजर्स ने उनसे जारी जवाबी गोलाबारी रोकने की ‘अपील’ की है. बीएसएफ की जवाबी कार्रवाई में सीमा के दूसरी ओर एक जवान की मौत हो गई जिसके बाद पाकिस्तानी रेंजर्स ने यह कार्रवाई रोकने की अपील की. हमने पहले वार नहीं करने का व्रत भले ही लिया हो, वार सहते जाने का व्रत तो नहीं ही लिया है न! करवट तो लेनी ही पड़ेगी न!

चलिए अब करवट को महिमागान को यहीं विराम देते हैं, वरना ऊंट की करवट को कैसे देख पाएंगे?

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।