गज़ल

यूँ महफिल से न निकाल हमें
इससे अच्छा है मार डाल हमें
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यहां से उठ के कहां जाएँगे
सता रहा है ये सवाल हमें
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तुम मगरिब हो और मैं मशरिक
कहेगा कौन हम-ख्याल हमें
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हमको तो कुछ खबर नहीं अपनी
तू ही कह दे हमारा हाल हमें
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दिन अब आएँगे जुदाई के
कह गई है शब-ए-विसाल हमें
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।