लेख

श्रद्धा मानव को मिले सबसे कीमती उपहारों में से एक है। श्रद्धा हमारे जीवन का मूल आधार है या यूँ कहिए कि होना चाहिए परंतु दुख की बात है ऐसा हो नहीं रहा। वो इसलिए कि हमने श्रद्धा का अर्थ बहुत संकुचित कर दिया है। हमारे लिए आज श्रद्धा का अर्थ है किसी विशेष धर्म के धार्मिक स्थल पर जा कर माथा टेकना या कुछ विशेष क्रिया-कलापों को बिना हृदय में उतारे तोते की तरह रटते रहना। श्रद्धा का अर्थ किसी विशेष धर्म या संप्रदाय या पंथ या व्यक्ति विशेष में आस्था रखना भर नहीं है। श्रद्धा सिर्फ मंदिर, मस्जिद, चर्च या गुरुद्वारे में सर झुकाना नहीं है ना ही किसी धर्मग्रंथ को रट लेना है और ना ही अपने धार्मिक संस्कारों को जड़ता से निभा लेना है। श्रद्धा का वास्तविक अर्थ है मानव मात्र में, जीवन मूल्यों में आस्था रखना। श्रद्धा का अर्थ है जड़- चेतन सबमें उस एक परम पिता का दर्शन। श्रद्धा का अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति की मौलिकता का सम्मान। श्रद्धा हमें सहिष्णुता सिखाती है, श्रद्धा हमें धैर्यवान बनाती है, श्रद्धा हमें अहोभाव से भर देती है। जो वास्तव में श्रद्धालु होता है वो कभी किसी का अपमान नहीं कर सकता। उसके लिए ये समस्त संसार उसी परमात्मा का रूप है। वो सिर्फ अपने धर्मस्थल में ही नहीं अपितु उसके बाहर भी प्रत्येक व्यक्ति, वस्तु में उसी का दर्शन करता है। इसीलिए वो सबका सम्मान करता है। श्रद्धालु व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक श्वास के लिए तो उस परम पिता को धन्यवाद देता ही है, प्रत्येक उच्छवास के लिए भी अनुग्रहित होता है। वो ये मानता है कि जीवन में जो भी हो रहा है वो अच्छे के लिए ही हो रहा है। उसे अपनी बुद्धि से अधिक परमात्मा के विवेक पर विश्वास होता है। वो किसी अन्य को अपने से हीन नहीं मानता क्योंकि उसे पता है कि हम सब एक ही कलाकार की कलाकृतियाँ हैं। इस जीवन के रंगमंच पर हम सब उस महान निर्देशक के कुशल निर्देशन में अभिनय कर रहे हैं। भूमिकाएं छोटी-बड़ी हो सकती हैं परंतु कोई भी पात्र अनावश्यक नहीं है इसलिए कोई भी अधिक या कम महत्वपूर्ण नहीं। श्रद्धालु व्यक्ति का समग्र संसार के प्रति दृष्टिकोण ही भिन्न हो जाता है। यदि हम सब में भी परमात्मा की कृपा से सच्ची श्रद्धा का अभिर्भाव हो जाए तो ये संसार स्वर्ग की भाँति सुंदर एवं शांतिपूर्ण हो जाएगा।

मानव मात्र के श्रद्धामयी जीवन की शुभकामनाओं सहित आपका मित्र :- भरत मल्होत्रा।