साहसी बकरा

चंचल नटखट भोलू बकरा,
निर्भय फिरता-कूदता था,
उछल-कूद करता था दिन भर,
नहीं किसी से डरता था.

एक बार पिकनिक करने को,
जंगल में जाने की ठानी,
मना किया था सब मित्रों ने,
बात किसी की नहीं मानी.

चलते-चलते बहुत दूर तक,
निकल गया भोलू जंगल में,
अब वापिस कैसे जंगल में,
तनिक डरा वह अपने मन में.

तभी अचानक एक शेर को,
देख सामने वह घबराया,
अब तो अंत समय है मेरा,
सोच-सोच भोलू चकराया.

लेकिन हिम्मत करके बोला,
”दावत खूब उड़ाऊंगा,
हाथी-भालू खाए थे कल,
आज शेर को खाऊंगा”.

सुनकर शेर बहुत घबराया,
भाग गया वह उल्टे पांव,
भोलू खूब प्रसन्न था मन में,
खूब लगाया मैंने दांव.

देख भागते जंगल-नृप को,
एक सियार ने जोश बढ़ाया,
”दुर्बल नन्हे बकरे से है,
जंगल का राजा घबराया!

चीर-फाड़कर पलक झपकते,
खा सकते बकरे को ऐसे,
बगुला खा जाता मछली को,
बकरा खाता झाड़ी जैसे”.

जंगल के राजा को उसने,
अपना साहस याद दिलाया,
मूंछ मरोड़े अकड़-अकड़कर,
संग सियार के वापिस आया.

हिम्मत करके भोलू बोला,
”वादा तुमने खूब निभाया,
आज शेर को लाकर तुमने,
सही समय पर कर्ज चुकाया.

अब तो शेर का सिर चकराया,
उसको कुछ भी समझ न आया,
जल्दी से वह वापिस भागा,
भोलू का था मन हर्षाया.

देख सामने संकट भारी,
डर जाता जो भोलू बकरा,
मार डालता शेर उसे फिर,
कैसे फिरता अकड़ा-अकड़ा!

संकट में उसने बुद्धि से,
काम लिया संकट टल पाया,
बल उसमें कम भले रहा हो,
बुद्धि से ही शेर भगाया.

चाहे कैसा भी संकट हो,
बच्चो कभी न हिम्मत हारो,
डटकर करो सामना उसका,
सोच-समझकर काम संवारो.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।