गीतिका/ग़ज़ल

“गीतिका”

पर्दे में जा छुपे क्यों सुन चाँद कल थी पूनम।

कैसे तुझे निकालूँ चिलमन उठाओ पूनम।

इक बार तो दरश दो मिरे दूइज की चंदा-

जुल्फें हटाओ कर से फिर खिलाओ पूनम।।

हर रोज बढ़ते घटते फितरत तुम्हारी कैसी

जुगनू चमक रहें हैं बदरी हटाओ पूनम।।

फिर घिर घटा न आए निष्तेज हुआ सूरज

अब तो गगन खुला है रौशन लुटाओ पूनम।।

कहीं रात छुप न जाए जब भोर मुस्कुराए

झटपट पकड़ लूँ पल्लू घूँघट समाओ पूनम।।

मुखड़ा छूपाके कबतक आहें जिगर भरोगी

आकर गई अमावस चौदस छँहाहो पूनम।।

गौतम मेरे फलक पर एक बार घूम जाओ

बड़ी सर्द हैं हवाएँ मत दूर जाओ पूनम।।

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ