मुक्तक….

अ_ढ़े जिद पे रहो न तुम कि बोलो प्रेम के आखर।
मुहब्बत है अगर हमसे न तोलो प्रेम के आखर।
नयन सब राज हैं खोलें अधर बैठाये क्यों पहरे-
पढ़ो “अनहद” से ये नैना कि घोलो प्रेम के आखर।

…….अनहद गुंजन अग्रवाल