गज़ल

उसके जवाल पे कोई फिर शक नहीं रहा
याद जिसे सच्चाई का सबक नहीं रहा
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हर वक्त छाया रहता है सन्नाटा सा यहां
लगता है घर में अब कोई अहमक नहीं रहा
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इतने बड़े हो गए बच्चे न जाने कब
कि वालिदान का भी उनपे हक नहीं रहा
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कैसे मिले राह दिये सारे बुझ गए
और आसमां में चाँद भी चमक नहीं रहा
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कुछ आईने पे भी जमी है धूल वक्त की
कुछ रंग मेरा पहले सा शफ़क नहीं रहा
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आभार सहित :- भरत मल्होत्रा।