हिम्मत का दामन

बहुत हिम्मत का काम था वह, जो हेमा ने संभव कर दिखाया. आज उसके पति भी प्रीतम भी रिकवर कर रहे हैं और खुद हेमा भी. मुश्किल समय अब भी है, लेकिन हेमा के मुख पर तृप्ति की अनोखी चमक है. अस्पताल के बेड पर लेटी हेमा अतीत में खो गई.

पिछले साल प्रीतम को पता चला कि उनकी एक किडनी फेल हो गई है और अब किडनी ट्रान्सप्लांट ही विकल्प है. किडनी ट्रान्सप्लांट न होने पर लगातार डायलिसिस करवाना पड़ता जो कि काफी दर्दनाक होता. इसके अतिरिक्त एक और बहुत बड़ी मुश्किल थी प्रीतम की किडनी का ओ-पॉजिटिव होना. ओ-पॉजिटिव यानी बहुत मुश्किल से किडनी डोनर का मिलना. इधर हेमा की किडनी बी-पॉजिटिव ग्रुप की. हेमा क्या करे? वह किडनी डोनेट करना भी चाहे तो नहीं कर सकती.

उसने क्या नहीं किया था! बहुत-से डॉक्टरों से वह मिली थी, किसी ने तसल्ली नहीं दी. हिम्मत का दामन उसने नहीं छोड़ा. उसने इसके बारे में इंटरनेट पर सर्च किया और एबीओ इनकमपैटिबल (ABOi) ट्रांसप्लांट के बारे में पढ़ा, जिसके जरिये ब्लड ग्रुप मैच न होने पर भी किडनी डोनेट किया जा सकता है, हालांकि 100 में से एक केस में ही ऐसा होता है और खतरनाक होने के साथ-साथ इसमें असफलता का चांस भी ज्यादा रहता है.

आज हिम्मत ने उसके दामन को खुशियों से भर दिया था. सर्जरी सफल रही.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।