ओ परदेशी ओ मतवारे

ओ परदेशी ओ मतवारे,
लिखूं तुम्हे क्या तू ही बता रे।
कागज कलम लिए बैठी हूँ,
खो जाती तेरी याद सखा रे।।

मन तरसे तेरे दर्शन को,
हिय में तूफान उठा है।
स्वप्न सुखद देख-देख के,
विरह ह्रदय में जगा है।।

नयन ढूँढते हैं तुझको,
होंठो में प्यास जगी है।
नहीं पास तू है मेरे,
पर तेरी चाह बढ़ी है।।

कागज पर बेशर्मी से,
ना प्यार लिखा जाता है,
अंक आपके है रहना,
ये चाह लिखा ना जाता है।।

खिला हुवा मेरा चेहरा कहीं,
विरह अग्नि ना जल जाये।
मोहित थे जिस पर साजन,
वह रूप श्याम ना हो जाये।।

आ जाओ फिर एक बार,
मोहे अपने अंग लागलो।
प्रेम की अपनी बारिश में,
प्रिय मुझको पुनः भिगालो।।

चिंतित ना हो सुनो प्रिये,
मैंने तुमसे प्रेम किया है।
अग्नि देव के सन्मुख ही,
सात वचन भी लिया है।।

सुन सजनी मैं तेरा हूँ,
तेरा होकर ही रह जाऊंगा।
मर जाऊंगा मैं लेकिन ,
तेरी चाह न छोड़ पाऊंगा।।

चिंता तेरा व्यर्थ सखी,
मैं तुमको छोड़ न जाऊंगा।
सात जनम का लिया वचन,
मैं साथ तेरा ही निभाऊंगा।।

।।प्रदीप कुमार तिवारी।।
करौंदी कला, सुलतानपुर
7978869045

परिचय - प्रदीप कुमार तिवारी

नाम - प्रदीप कुमार तिवारी। पिता का नाम - श्री दिनेश कुमार तिवारी। माता का नाम - श्रीमती आशा देवी। शिक्षा - संस्कृत से एम ए। जन्म स्थान - दलापुर, इलाहाबाद, उत्तर-प्रदेश। मूल निवासी - करौंदी कला, शुकुलपुर, कादीपुर, सुलतानपुर, उत्तर-प्रदेश। इलाहाबाद मे जन्म हुआ, प्रारम्भिक जीवन नानी के साथ बीता, दसवीं से अपने घर करौंदी कला आ गया, पण्डित श्रीपति मिश्रा महाविद्यालय से स्नातक और संत तुलसीदास महाविद्यालय बरवारीपुर से स्नत्कोतर की शिक्षा प्राप्त की, बचपन से ही साहित्य के प्रति विशेष लगव रहा है। समाज के सभी पहलू पर लिखने की बराबर कोशिस की है। पर देश प्रेम मेरा प्रिय विषय है मैं बेधड़क अपने विचार व्यक्त करता हूं- *शब्द संचयन मेरा पीड़ादायक होगा, पर सुनो सत्य का ही परिचायक होगा।।* और भ्रष्टाचार पर भी अपने विचार साझा करता हूं- *मैं शब्दों से अंगार उड़ाने निकला हूं, जन जन में एहसास जगाने निकला हूं। लूटने वालों को हम उठा-उठा कर पटकें, कर सकते सब ऐसा विश्वास जगाने निकला हूं।।*