प्यास बढ़ाओ

अभी-अभी स्नेहा के पी.एच.डी. गाइड का बधाई का फोन आया था. बिहार के लोकगीतों पर उसका शोध स्वीकृत कर लिया गया था. स्नेहा बहुत खुश थी. उसने फोन करके अनेक प्रियजनों को भी यह शुभ समाचार दे दिया था. सभी खुश थे. स्नेहा को समझ नहीं आ रहा था, कि यह सब संभव हुआ कैसे? वह अतीत में खो गई.
एक समय था जब घर के पास मोबाइल चाइनीज़ रेस्टोरेंट होने के नुकसानों का विश्लेषण कर परेशान होती रहती थी, लेकिन आज स्नेहा उसी मोबाइल चाइनीज़ रेस्टोरेंट की बेहद शुक्रगुजार थी. उसी के कारण तो उसकी शोध की प्यास पूरी हो सकी थी. 
एक दिन सैर करते हुए उसकी मुलाकात मोबाइल चाइनीज़ रेस्टोरेंट के पास एक आंटी जी से हो गई थी. वहां से आती दुर्गंध से परेशान स्नेहा ने घर के पास इस मोबाइल चाइनीज़ रेस्टोरेंट के होने के नुकसानों का विश्लेषण किया. आंटी जी भी पड़ोस में रहती थीं, स्वभावतः वह भी सहमत हो गईं और बात आई गई हो गई. 
कुछ दिनों बाद वे दोनों पुन: उसी जगह सैर पर मिलीं. आंटी जी ने स्नेहा से पूछा-
”आपने कभी रिसर्च करने के बारे में नहीं सोचा?”
”वह मैं बाद में बताऊंगी, पहले आप बताइए आपने मुझसे यह सवाल क्यों किया?” स्नेहा आश्चर्यचकित थी.
”उस दिन आपने मोबाइल चाइनीज़ रेस्टोरेंट होने के नुकसानों के बारे में जिस तरतीब से अपनी बात रखी थी, मुझे लग रहा है कि आप विश्लेषण-कला में माहिर हैं.”
”आपकी बात काफी हद तक सही है. मैंने पी.एच.डी शुरु की है, पर बेटी होने के बाद मैं अपने को इतना व्यस्त पाती हूं, कि मेरी पढ़ाई की प्यास ही खत्म हो गई है.”
”वैसे हम कभी भी किसी को यह नहीं कहते कि अपनी प्यास बढ़ाओ, लेकिन आपके लिए मेरी यही सलाह होगी, कि अपनी पढ़ाई की प्यास बढ़ाओ, आपमें भरपूर काबिलियत है.” आंटी जी ने कहा था.
आज का शुभ समाचार उसी प्यास बढ़ाने का परिणाम है. उसने फिर से मोबाइल चाइनीज़ रेस्टोरेंट के प्रति अपना आभार व्यक्त किया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।