सामाजिक

सवाल देश के युवाओं के भविष्य का है।

65 फ़ीसद आबादी युवाओं की। युवाओं का ज़िक्र सियासतदां करते भी हैं। फ़िर देश के युवाओं का हाल बेहाल क्यों है। युवाओं की जरूरत आख़िर क्या हो सकती है। इससे अनभिज्ञ तो शायद कोई नहीं। पहली प्राथमिकता बेहतर शिक्षा की। उसके बाद रोजगार की। क्या आज के परिवेश में युवाओं की ये दोनों जरूरतें पूरी हो पा रहीं। तो उत्तर यहीं बिल्कुल नहीं। ऐसे में अगर शिक्षा सामाजिक विकास एवं उन्नति का सबसे महत्वपूर्ण साधन है। बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के अभाव में कुछ भी अर्थपूर्ण हासिल नहीं किया जा सकता। शिक्षा लोगों के जीवन स्तर में सुधार के साथ लोगों के जीवन की गुणवत्ता को बढ़ाने हेतु क्षमताओं का निर्माण कर और बेहतर रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसके अलावा साक्षरता के स्तर में वृद्धि से उच्च उत्पादकता बढ़ती है तथा अवसरों के सृजन से स्वास्थ्य में सुधार, सामाजिक विकास और उचित निष्पपक्षता को प्रोत्साहन देती है। तो ऐसे में अगर देश में शिक्षा की हालत में फफूंदी लगें है, तो देश का सामाजिक और आर्थिक ढांचा बेहतरी के साथ आगे नहीं बढ़ सकता।

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ इंडियन इकॉनामी-2017 की रिपोर्ट कहती है, कि देश में 1.2 करोड़ नए रोजगारों का सृजन हुआ है। लेकिन इस आंकड़े का जमीनी हकीकत से दूर-दूर तक नाता नज़र नहीं आता। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर एक वर्ष में 1.2 करोड़ रोजगारों का सृजन हुआ है। तो फ़िर बेरोजगारी की दर पिछले पांच वर्ष की अपेक्षा आज अपने सर्वोच्च स्तर पर कैसे पहुंच गई?

दूसरी तरफ दक्षिण एशिया की अर्थव्यवस्था पर केंद्रित रोजगार-विहीन विकास रिपोर्ट 2018 में कहा गया है कि भारत में हर साल 81 लाख नए रोजगार सृजित करने की नितांत आवश्यकता है, और इतने रोजगार तभी पैदा होंगे जब देश की विकास दर को 18 फीसद तक बढ़ाया जाए। ऐसे में अगर हाल- फिलहाल में देश की विकास दर 7.7 फीसद है। इसे 18 फीसद तक पहुंचने में लम्बा वक्त लगेगा। वह भी तब जब देश में एक दल की पूर्ण बहुमत वाली सरकार हो। जो आर्थिक क्षेत्र में बगैर किसी दबाव के कड़े फैसले ले और उन्हें ईमानदारी से लागू कर सके। जो समय के अनुरूप होता नज़र आता नहीं। पूर्ण बहुमत की सरकार के अपवाद भी है, कुछ राज्य ऐसे भी है। जहां पर दशक बीत गए एक ही सरकार के सत्ता में रहने के, फ़िर भी न विकास दर काफ़ी बढ़ी, और न बेरोजगारी कम हुई। अलबत्ता बेरोजगारी का आलम भले बढ़ गया। उदाहरण के रूप में मध्यप्रदेश को ले सकते हैं। जहां पर भाजपा का पिछले 15 वर्षों से शासन करते हुए होने को हैं। फ़िर भी बेरोजगारी कम होने के बजाय बढ़ ही रहीं है। प्रदेश के रोजगार कार्यालयों में बीते 2 वर्षों से शिक्षित बेरोजगार युवाओं की संख्या में 3 फ़ीसद की वृद्धि हुई है। 2015 में 15.6 लाख शिक्षित बेरोजगार दर्ज थे। जो 2017 में बढ़कर 23.7 लाखों हो गए।

इन सब के इतर अगर बेरोजगारी से संबंधित राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सर्वे समय समय पर आगाह कराते रहते हैं, कि देश के भीतर करीब दस फ़ीसद लोग पूर्ण या मौसमी बेरोजगार हैं। फ़िर ऐसे में लालफीताशाही की नीतियां कठघरे में खड़ी मालूम पड़ती है। जो सिर्फ़ वादों की दुकान चलाते रहते हैं। युवाओं का ज़िक्र सियासी परिपाटी के लोग हर रैली में करते दिख जाते हैं, लेकिन उनकी मूलभूत आवश्यकताओं पर शायद ध्यान देना कभी वाज़िब नहीं समझा। तभी तो आज न युवाओं के पास बेहतर नौकरी है, और न ही बेहतर शिक्षा। कुछ फ़ीसद तो ऐसे भी हैं, जो होनहार होने के बाद भी अपने हुनर से न अपनी जिंदगी सँवार पाते हैं, और न देश की ख़ातिर कुछ कर पाते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि शिक्षा सिर्फ़ बाज़ार बनकर रहा गया है।

जिस पर जनकल्याण और समावेशी और सर्वसमाज का कल्याण करने का दावा करने वाली सियासी प्रणाली का चाबुक नहीं रहा। शिक्षा का क्षेत्र अब कुछ निजी हाथों की कठपुतली बनती जा रहीं। उदाहरण के रूप में देखें तो एक अध्यापक की बेटी ने दिन-रात मेहनत करके डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा पास की। फ़िर भी वह मेडिकल की पढ़ाई नहीं कर सकती, क्योंकि उसके पिता सामान्य शिक्षक हैं। जो महीने का इतना नहीं कमाते, कि घर चलाने के साथ बेटी को पढ़ा सकें। यह स्थिति अगर एक शिक्षक की है। जो अगर एक सरकारी स्कूल में पढ़ाता है। तो लगभग तीस से चालीस हज़ार कमाता होगा। फ़िर ऐसे में रोज कुँआ खोदकर पानी पीने की स्थिति के परिवार की क्या होगी। इसका सहज आंकलन किया जा सकता है।

देश में बेरोजगारी का आलम यह है, कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन को यह कहना पड़ रहा है कि 2018 में भारत दुनिया का सबसे अधिक बेरोजगारों वाला देश रहने वाला है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की इस रिपोर्ट पर केंद्र सरकार को गंभीरता से विचार करना चाहिए। देश में जिस रफ्तार स्तर से आर्थिक विकास हो रहा है, उस गति से रोजगार का सृजन नहीं हो पा रहा है। जो चिंता का विषय है। ऐसे में अगर देश के भीतर रोजगार दर बढ़ाना है। तो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में भारी निवेश करना होगा। विनिर्माण क्षेत्र को गतिशील करना होगा। निर्यात बढ़ाने होंगे। श्रम कौशल में वृद्धि करनी होगी। साथ ही, तेज गति से बढ़ रही जनसंख्या पर कठोर नियंत्रण स्थापित करना होगा। रोजगारपरक शिक्षा उपलब्ध करानी होगी। युवा वर्ग देश की धड़कन होता है। अगर उसे ही रोजगार के अवसर प्राप्त नहीं होंगे। ऐसे में वह मानसिक और सामाजिक रूप से सशक्त नहीं होगा। फ़िर देश सरपट दौड़ कैसे लगा सकता है।

आज युवाओं की पूछ अगर चुनावी रैलियों तक सीमित हो चली है, औऱ शिक्षा का स्तर इतना लुढ़क गया है। जो न रोजगारपरक बन पा रहा। तो यह विकट स्थिति है, देश और समाज के लिए। आज के दरमियान अगर केंद्र और राज्य सरकारें युवाओं को रोजगार दिलाने का वादा करती है, लेकिन युवाओं को रोजगार मिल नहीं रहा। तो प्रश्न तो बहुतेरे ख़ड़े होते हैं। जिसके जवाब व्यवस्था को ढूढ़ने ही होंगे। अगर देश में तमाम दावों के बीच बेरोजगारी कम हो नहीं रही। तो मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया और स्टार्टअप इंडिया जैसे योजनाओं का कोई विशेष अर्थ नज़र आता नहीं। अगर एक आँकड़े के मुताबिक हर वर्ष तकरीबन 1.20 करोड़ लोग डिग्री लेकर बाज़ार में रोजगार के लिए आते हैं, और नौकरियां बाज़ार में हैं ही नहीं। तो कुछ अलग करने का विचार सरकारें बनाती क्यों नहीं। अगर 2027 तक विश्व में सबसे अधिक श्रम बल भारत के पास होगा, तो रोजगार के मामले में खरा रहनुमाई व्यवस्था को उतरना तो पड़ेगा। ऐसे में क्यों न सरकारें एक अलग युवा मंत्रालय बनाएं। नई शिक्षा नीति को लागू। पूरे विश्व में उत्पादन का एकमात्र स्रोत कृषि है, एक दाना डालने पर सैकड़ों दाना पैदा होता है। तो कृषि के लिए अनुकूल परिवेश क्यों आज़ादी के सत्तर वर्ष बाद भी पैदा नहीं किया जा सका। क्यों नहीं ख़ाली पड़ी जमीनों पर युवाओं को खेती करने लायक माहौल सरकारें दे पाई हैं। जिससे ख़ाली जमीनों का उपयोग भी हो सकेगा, साथ में युवाओं को रोजगार भी। इन सबसे पहले ज़रूरत सबको बेहतर और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलाने पर जोर होना चाहिए। तभी युवा वर्ग आगे बढ़ेगा और देश तरक़्क़ी करेगा।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896