कहानी – नदी के लुटेरे

जब ज्येष्ठ की धूप उनके जिस्मों के अंदर छुपी महीन जीवनदायनी खून के साथ घुली पानी की बूंदों को सोखनी शुरू कर देती, तो वे बड़े खुश होते, इसलिए नहीं कि शरीर का भार खाली हो रहा है, बल्कि इसलिए कि इस बार का सावन का अंधा घोड़ा उनके लिए कई नेमतें लाएगा। दूसरी ओर गांव के किसान इसी जेठ की गर्मी में अपने शरीरों से सारी ऊर्जा को पसीने की बूंदों के साथ निचोड़ रहे होते।
जब ज्येष्ठ अपनी तपस से मेघ रूपी रथ के पहियों को दौड़ाने के लिए सुनियोजित कर रहा होता, तो वे अपना काला मुंह करके काली इंटें काला मुंह का खेल खेलने का प्रंपच भी करते, ताकि मेघ उनकी प्रार्थना के झांसे में आकर उनके हिस्से के आर-पार इतना मेघ बरसाए कि उस मेघ रूपी दानव के पीछे भागते लश्कर के साथ सब जीवन रूपी काया के मददगार पदार्थ बहते आएं और फिर वे अपनी हिम्मत, मस्ती, स्वार्थ कलापूर्ण मेहनत के दम पर बीस-तीस ऊंचे उठे बाढ़ के पानी से वह सब इकट्ठा कर सकें या लूट सकें जिससे उनके लिए कुछ महीनों का सामान इकट्ठा हो सके और जो उनकी पहचान, उनके अस्तित्व को बचाकर रख सके, जो वो करते आए हैं। वे न तो लुटेरे हैं, न शिकारी, वे सिर्फ कलापूर्ण हुनर के दम पर नदी में बाढ़ के साथ बहने वाले सामान को सही दिशा की ओर मोड़ने वाले हिम्मती मर्द हैं, जिनकी तुच्छ यांत्रिक जीवन की आदतों ने उन्हें रहस्यमयी इन्सान बनाने का जोखिम ले लिया है। यही यांत्रिक संसार उन्हें सब मर्दों से भिन्न दर्जा दे रहा है और उनके अस्तित्व के कणों में नए कण जोड़ रहा है, ताकि वे मानस पटल के सजाए दृश्यों में अपना नाम जोड़ सकें।
वे रहस्यमयी पुरुष समय के अंतराल के बाद अपनी उपस्थिति से गांव के मानसिक ताने-बाने में दखल देते आ रहे हैं। वे किसी विशेष स्थान से आकर स्वर्णिम दिनों की रचना कर अपने ठिकानों को लौट जाते हैं। इस बार फिर से उनका डेरा लगना शुरू हो गया है। जब नदी के किनारे खाली पड़ी जमीन में उनके तंबू लग जाते, तो गांव के लड़के, बुजुर्ग और अन्य तंबुओं के पास कभी-कभार मंडराना शुरू कर देते। औरतें उनके तबुूओं की ओर नहीं जातीं, पर उनकी विशेष कर्मों की चर्चा एक दूसरे से जरूर करतीं। वे कितने मज़ेदार व हसीन मर्द होंगे। वे अपनी स्वार्थी कल्पनाओं को भी अपने मन में सजातीं। गांव के आभाविहीन सिर्फ देहाती किसान मर्दों के पास भी औरतों की विभिन्न विचित्र कल्पनाएं भी होती। वे अपनी मर्दानगी की उन बहादुर व रहस्यमय मर्दों के साथ तुलना में लगे रहते।
कुछ मन ही मन उनकी शिकायत गांव के पंच से करने की आधारविहीन योजनाएं बनाते, लेकिन गांव का पंच उन्हें किस आधार पर नदी से भगाएगा, इस बात पर उन्हें कोई तर्क नहीं सूझता। कुछ अपने मन में उन बहादुर लुटेरों की तरह नदी की बाढ़ में से कीमती सामान निकाल लाने के स्वप्न सजाते। लेकिन नदी की लहरों का वेग और बाढ़ का प्रचण्ड रूप जब हकीकत के आइने में धुंधला सा भी उनको नज़र आता तो उनकी आंखें फिर से बंद हो जातीं और खेतों, अपने कमजोर बच्चों, अपनी थकी हारी रोज के काम निपटाती व सिर पर गोबर उठाए खेतों की ओर दौड़ती पत्नियों व घर में बुजुर्गांे के खांसने की आवाज़ों के साथ ही निम्न स्तर के सपने लेने लग पड़ते।
सावन का अंधा घोड़ा उस नदी के ऊपर फैले आकाश में अपने ऊपर उठाया बादलों में जकड़ा अमोघ जल का भार इधर-उधर फैंकने लगा और नदी का शांत स्वभाव प्रचंड और बर्बर स्वभाव में बदलने लगा। लुटेरों की बड़ी एवं तीक्ष्ण आंखों में चमक बढ़ने लगी। उम्मीद से बड़ी लहरें बाढ़ रूपी दानव की रंगरलियों में अपना आपा खो बैठीं और अपने साथ कई पेड़ और नदी के किनारे कई तरह के कीमती सामान को बहाती हुई लाने लगी। गांव के मर्द अपनी बरसातियों और कई तो अपने बोरी से लिपटे सिरों से नदी की प्रचंड लहरों में गोते लगाते लुटेरों को एकटक कौतूहल से देख रहे थे।
‘एक बड़ा शहतीर बहता हुआ आ रहा है।’ नदी के एक हिस्से के एक मोड़ पर खड़े बाज की दृष्टि से लहरों पर नजरें टिकाए सबसे बड़ी उम्र के लुटेरे ने चिल्लाना शुरू कर दिया, ‘मौड़ खाती नदी शहतीर को किनारे से कुछ फांसले पर बहाती हुई आगे निकलेगी। कुद पड़ो!’ चार तैराकों ने नदी की प्रचंड लहरों में छलांग लगा दी। उनमें से कुछ शहतीर से कई फुट दूर नदी में लुप्त होते दिखाई दिए और फिर गांव के लोगों की सांसें रुक गईं। ‘वे बह गए, उनका काम खत्म हो गया, प्रतापी मर्द अब फिर से यहां नहीं आएंगें।’ गांव का कोई बूढ़ा चिल्लाया, ‘कोई उनकी मदद करो।’ पलक झपकते ही उनमें से दो प्रतापी शहतीर को अपने-अपने मजबूत कंधों में जकडे़ नजर आए और डूबे हुए तैराक फिर अपने काले सिरों के साथ नज़र आए।
गांव के लोग चिल्ला उठे, ‘जय हो!’ मोड़ पर खडे़ बाज की आंखों वाले लुटेरे ने फिर आवाज दी, ‘शहतीरों का झुंड आ रहा है। अपनी बाजुओं में फिर से जोश भर लो, कत्थे की किसी भट्टी की अंतिम यात्रा में शामिल होना है। तैयार रहो।’ एक के बाद एक कत्थे की भट्टी से उजड़े कत्था बनाने वाले खांचे नदी में तैरते नजर आए।
शाम को लुटेरों ने अपने-अपने हिस्से का बंटवारा कर डाला। सुबह लूट के सामान को कम दाम में उड़ाने वाले खरीददारों ने सब साफ कर दिया। नदी की लहरें अब कुछ शांति का पाठ जपने की तैयारी कर रही थीं। सबसे बड़े व दल के मुखिया ने सबसे कम उम्र के लुटेरे के हाथ कुछ कम माल थमाया और उसे आज ही दल छोड़ने को कहा। लुटेरों में फूट की झाड़ियां अकुंरित हो गई। सब लुटेरों के काले सिरों के अंदर छिपे चतुर मस्तिष्कों में अलग-अलग विचार कौंध रहे थे।
उम्रदराज जांबाज ने अपने दल की एकता की दुहाई दी और अपने नियमों के जंजाल को भी समझाना चाहा। आखिर एक नियम ही उनके इस बिखराव का कारण था। नियम सबसे छोटे जांबाज ने तोड़ा था। जवानी के नशे में उसने गांव की एक युवती से गठजोड़ रात के अंधेरों में जोड़ा था और ये बात उम्रदराज जांबाज से नहीं छिपी थी। उसने चेतावनी भी दी थी, ‘हमारा दल गांव की मेहरबानी पर टिका है और हम भविष्य के लिए अपने हिस्से की नदी का क्षेत्र अपने हौसले से इन गांव वालों से उधार में मांगते आए हैं। वे हमें हमेशा पूजनीय समझे, हमारी जांबाजी की तारीफ करें, ना कि वे हमें विश्वासघाती समझें। तुम्हें यह प्रेम प्रपंच छोड़ना होगा, वर्ना तुम्हें दल छोड़कर अभी यहां से जाना होगा। हम यहां सिर्फ नदी का बहता सामान लूटने आते हैं, दिलों में बहते प्रेम की लूट करने के लिए नहीं। गांव के किसी इंसान से न कोई रिश्ता होगा, चाहे वे तुम्हारी बहादुरी के आगे नतमस्तक होकर तुम्हारे लिए अपने दिलों में प्रेम वफा के सपने सजाए।’
राह में भटके दिल के अंदर उठती लहरों में डूबे प्रतापी लुटेरे ने अपना तर्क दिया, ‘मैं उससे वादा कर चुका हूं, मैं बड़ी-बड़ी उफनती प्रचंड लहरों से आज तक नहीं हारा, अब एक युवती की नजरों के सामने खुद को मृत नहीं घोषित कर सकता। वह मेरे प्रति उसकी प्रशंसनीय भक्ति के कारण मेरी दिल की खिड़की के लोहे के कटघरे से बंधना चाहती है।’
‘नहीं! नहीं! हम किसी भी शर्त पर गांव के लोगों के आगे अपनी छवि को बिगाड़ नहीं सकते। तुम अपनी उत्कंठा और युवती की गुप्त प्रेममयी आराधना को छोड़ो,’ दल के मुखिया ने अपने अंदर अपने बनाए नियम को जकड़ कर पकड़ते कहा, ‘अगर यह बंधन फलता फूलता है तो भविष्य के लिए हमारा अस्तित्व मिट जाएगा, पूरा गांव जो हमारी गुप्त आराधना में मग्न रहता है, वह हमें महत्वकांक्षी, स्वार्थी व चरित्रहीन समझेगा।’ सबसे कम उम्र के जाबांज ने अपना तंबू का सामान पीठ पर लादा और नदी के बहाव की उल्टी दिशा की ओर निकल गया।
ऊपर काले बादलों ने फिर से दस्तक देना शुरू कर दी थी। पूरा दल पानी की बहशी बूदों के साथ दुःख और अशांति से भर गया। अपने प्यार को पाने की मूक लालसा के अकस्मात ढेर बन जाने से उसकी आंखों की रोशनी धुंधली और गीली हो रही थी। ऊपर काले आकाश ने फिर एक बार घमण्डी रोशनी को बिजली के रूप में परिवर्तित कर नदी के ऊपर फैंका। इस तेज आवाज से उसका मन दो फाड़ हो गया। एक हिस्से ने कहा- ‘रात के अंधेरों में घिरा गांव बरसात के थपेड़ों से अधमरा सा हो गया है, नवयुवती को अपने संग उड़ाकर वह नदी की उफनती लहरों से पार ले जाएगा।’ दो फाड़ हुए दूसरे मन ने कहा, ‘लुटेरों का स्वाभिमान उसकी इस हरकत के बाद सदा के लिए प्रचंड नदी के वेग में बह जाएगा और उसे कई लुटेरों का दल कभी नहीं पकड़ पाएगा।’ विचित्र कल्पनाओं का जैसा पूरा ब्रह्मांड उसके मस्तिष्क में संतुलन बनाने का नया प्रयोग कर रहा था।
वह नदी के किनारे-किनारे असंख्य झाड़-झंखाड़ों को लांघता बहुत दूर निकला जा रहा था। उसने ख्वाजा पीर से मन ही मन प्रार्थना की, ‘मेरे लिए कोई रास्ता दिखाओ, मैं तुम्हारी नेमतों से अपने अस्तित्व की नींव रखकर आगे बढ़ा हूं।’
नदी का प्रवाह बढ़ता जा रहा था। मटमैले पानी के बीच लहरों से एक रोशनी उभरी, कोई बड़ा सा संदूक नदी के खरपतवारों में जकड़ा लहरों के बीच बहता हुआ आया। चूर-चूर हृदय वाले लंबे चैड़े सबसे छोटे लुटेरे की आंखों में रोशनी का एक बेतरतीब पुंज प्रकट हुआ। रात में नहाती नदी के बीच और इस छोटे लुटेरे के मन के बीच एक गुप्त मंत्रणा हुई।
छोटे लुटेरे ने जैसे अपने मन के दुखों के बड़े झोले को वहीं फैंका जैसे नदी में उसकी प्रेमिका उसे पुकार रही हो। उसने प्रचंड लहरों में छलांग लगा दी। अंधेरे ने उसके साथ धोखा कर दिया वह जितना हाथ पैर मारे, वही संदूक उतना ही आगे बढ़ता जाए। अकेला लुटेरा कभी लुप्त हो जाए तो कभी नदी उसे उछालकर बाहर फैंक दे। संदूक और उसका लुटेरा बीच भंवर घूमते जा रहे थे। वह भंवर प्रेम और अपने दल को धोखा देने के घटनाक्रम से पैदा हुआ भंवर था लेकिन प्रेम के भंवर ने उसे बच निकलने का एक मौका दिया था। यहां अंधेरा और गुस्सैल नदी दोनों ने मिलकर प्रपंच रच डाला था। वह भंवर के चक्रव्यूह में कुछ पल छटपटाता रहा। सारी पारंगता पानी में डूब रही थी, पर हिम्मत वहीं की वहीं जिंदा थी। वह डूबना नहीं चाहती थी। फिर हिम्मती मन ने एक शिशु की तरह जिद्द छोड़ दी और आखिरी सांस ने इस लुटेरे को अलविदा कहकर अंधेरे में पसरा कोई एक रास्ता अपनाकर अपना मुंह मोड़ लिया। उत्कंठा और वीरता का पुजारी इस जहान के ऊर्जामयी कणों द्वारा अवशोषित हो चुका था।
दूसरी ओर का उदास दल अभी भी अपने दल के जाबांज साथी की राह देख रहा था। दल का कोई सदस्य सुबह तड़के नदी के घटते प्रवाह को नापने निकला। ‘नदी में इंसानी लाश तैर रही है, आओ, दौड़ो आओ, ख्वाजा रहम करे, ये लाश हमारे छोटे साथी की लग रही है।’ पूरा दल भागा, कुछ ही पलों में जांबाज लुटेरा नदी के किनारे बारीक पत्थरों के बिझोने पर आराम कर रहा था। पूरे दल की आंखों में आंसुओं की झड़ी लगी हुई थी। सिर्फ एक ही सदस्य ऐसा था, जिसकी आंखों में एक शुष्क रेगिस्तान फैल रहा था, वह दल का मुखिया था। उसकी आंखों में एक अजीब ही तरह की चमक थी, वह चमक उसकी किसी गुप्त जीत की ओर इशारा कर रही थी। यह शायद उसके दल की प्रतिष्ठा इस भयावह हादसे के बाद और अधिक बढ़ने की जीत की चमक थी।
एक और जहां पूरा दल इस असमय हादसे से गहरे शोक में इसकी तह तक जाने को प्रत्यनशील था, वहीं दूसरी ओर दल का मुखिया मन ही मन इस घटना को अपनी दल की परपंरा की जीत में बदलने के लिए प्रबंधन में जुटा था। उसके मन ने यह युक्ति बनाई- दल का एक सबसे छोटा व जाबांज सदस्य रात के अंधेरे में किसी अंजान चीज़ को कोई इंसानी लाश समझकर नदी में अकेला ही परिस्थिति अनुरूप कूदा और वह भंवर में फंसकर बड़ी बहादुरी निभाते हुए, दल की प्रतिष्ठा बचाते हुए अपनी जिंदगी को अर्पित कर बैठा। दल का स्वाभिमान और जांबाजी सदा उसकी अहसानमंद रहेगी। हम अगले वर्ष फिर आएंगे, यही नदी की इच्छा है और यही ख्वाजा पीर की मर्जी। संताप दिवंगत जांबाज आत्मा को भव सागर में मिलने के बीच की मुख्य बाधा है।
संदीप शर्मा

परिचय - संदीप शर्मा

शिक्षा: मास्टर इन बिजनिस मैनेजमैंट, पी.एच.डी. (रिसर्च स्कालर) व्यवसायः शिक्षक, विज्ञान, डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, हमीरपुर (हि.प्र.) में कार्यरत। प्रकाशन: कहानी संग्रह ”अपने हिस्से का आसमान’ प्रकाशित। निवासः हाउस न. 618, वार्ड न. 1, कृष्णा नगर, हमीरपुर। हिमाचल प्रदेश 177001 फोन न 094181-78176 ईमेल sharmasandeep489@gmail.com