रावण को लेकर घमासान

पंजाब से खबर मिली है। वहां के कुछ लोग जो आने आपको वाल्मीकि कहते है ने रावण पूजा करना आरम्भ किया हैं। ये लोग अपने आपको अब द्रविड़ और अनार्य कहना पसंद करते है। इन्होने अपने नाम के आगे दैत्य, दानव, अछूत और राक्षस जैसे उपनाम भी लगाना आरम्भ किया हैं। ये लोग अपने आपको हिन्दू नहीं अपितु आदि धर्म समाज के रूप में सम्बोधित करेंगे। ये कोई हिन्दू धर्म से सम्बंधित कर्मकांड नहीं करेंगे। पूरे पंजाब में रावण सेना की गतिविधियां बढ़ाई जाएँगी। ऐसा इनका विचार है।

एक तथ्य इस खबर से स्पष्ट है। यह कृत्य करने वाले तो केवल कठपुतलियां हैं। इसके पीछे कोई NGO वाला, अम्बेडकरवादी, साम्यवादी, नक्सली या ईसाई दिमाग सक्रिय हैं। जो इन लोगों के भोलेपन का फायदा उठाकर अपनी दुकानदारी चमकाना अथवा विधान सभा चुनाव में किसी बड़े दल का टिकट प्राप्त करना चाहता है। असल में पंजाब के वाल्मीकि समाज में गरीबी, अशिक्षा, अन्धविश्वास,नशा आदि प्रचलित हैं। इनकी स्थिति का फायदा उठाकर इन्हें ईसाई बनाने के लिए अम्बेडकरवाद का लबादा लपेट कर ईसाई मिशनरी बड़े पैमाने पर लगी हुई हैं। यह कार्य सीधे न करके अनेक बार पिछले दरवाजे से भी किया जाता है। इस रणनीति के तहत इन्हें पहले चरण में इन्हें हिन्दू धर्म से सम्बंधित मान्यताओं से दूर किया जाता है। दूसरे चरण में इनका प्रतिरोध समाप्त होने और हिन्दुओं से अलग होने पर आसानी ईसाईकरण कर दिया जाता हैं। विडंबना यह है हिन्दू/सिख समाज के तथाकथित धर्मगुरुओं/ठेकेदारों को इन उभरती हुई समस्याओं के समाधान में कोई रूचि नहीं हैं। उनके लिए मठ/मंदिर।/गुरुद्वारा आदि बनाना और आराम से रहना जीवन का उद्देश्य हैं।

पंजाब में दलित समाज ऋषि वाल्मीकि और गुरु रविदास को अपना गुरु मानता है। ऋषि वाल्मीकि रामायण के रचियता और श्री राम के गुरु थे। उन्ही के द्वारा रचित वाल्मीकि रामायण में राम मर्यादापुरुषोत्तम और सर्वगुण संपन्न है। जबकि उन्हीं की रामायण में रावण एक दुराचारी, अत्याचारी, विवाहिता स्त्री सीता का अपहरणकर्ता हैं। गुरु रविदास भी अपने दोहों में श्री राम की स्तुति करते हैं। कमाल यह है कि इन्हीं दोनों को अपना आध्यात्मिक गुरु मानने वाले इन्हीं के उपदेशों की अवहेलना कर अपना उल्लू सीधा करने के लिए सत्य को सिरे से नकार रहे हैं।

अब रावण का भी इतिहास पढ़िए। रावण कोई द्रविड़ देश का अनार्य राजा नहीं था। लंकापति रावण सारस्वत ब्राह्मण पुलस्त्य ऋषि का पौत्र और विश्रवा का पुत्र था। वह वेदों की शिक्षा को भूलकर गलत रास्ते पर चल पड़ा था। जिसकी सजा श्री रामचंद्र जी ने उसे दी। फिर किस आधार पर रावण को कुछ नवबौद्ध, अम्बेडकरवादी अपना पूर्वज बताते हैं? कोई आधार नहीं। केवल कोरी कल्पना मात्र है।

दक्षिण भारत कोई द्रविड़ देश जैसा कोई भिन्न प्रदेश नहीं था। यह श्री राम के पूर्वज राजा इक्ष्वाकु का क्षेत्र था। वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड का प्रमाण देखिये। श्री राम बाली से कहते है।

इक्ष्वाकूणामीयं भूमि स:शैल वन कानना। मृग पक्षी मनुष्याणां निग्रहानु ग्रहेष्वपि।।

श्री राम कह रहे है कि वन पर्वतों सहित यह भूमि इक्ष्वाकु राजाओं की अर्थात हमारी है। अत: यहां के वन्य पशु, पक्षियों और मनुष्यों को दंड देने का उन पर अनुग्रह करने में हम समर्थ है।

बाली, सुग्रीव से लेकर रावण भी आर्य थे। इसका प्रमाण पढ़िए-

आज्ञापयतदा राजा सुग्रीव: प्लवगेश्वर:। औध्वर्य देहीकमार्यस्य क्रियतामानुकूलत:।।

अर्थात यहां सुग्रीव बाली के अंतिम संस्कार के लिए आदेश दे रहा है। कहता है इस आर्य का अंतिम संस्कार आर्योचित रीती से किया जाये।

रावण राम के साथ युद्ध में घायल हो गया तो उसका सारथी उसे युद्धक्षेत्र से बाहर ले गया। होश आने पर रावण उसे दुत्कारते हुए कहता है की

त्वयाद्य: हि ममानार्य चिरकाल मुपार्जितम। यशोवीर्य च तेजश्च प्रत्ययश्च विनाशिता:।।

अर्थात हे अनार्य! तूने चिरकाल से उपार्जित मेरे यश, वीर्य, तेज और स्वाभिमान को नष्ट कर दिया। यहाँ रावण क्रोध से भरकर अनार्य शब्द का प्रयोग कर रहा है। इससे यही सिद्ध हुआ कि वह अपने आपको श्रेष्ठ अर्थात आर्य मानता था।

जबकि सत्य यह है कि रावण अपने कर्मों से आर्य कुल में उत्पन्न होने के पश्चात भी अनार्य हो चूका था। रावण एक विलासी बन चूका था। अनेक देश – विदेश की सुन्दरियां उसके महल में थीं। हनुमान अर्धरात्रि के समय माता सीता को खोजने के लिए महल के उन कमरों में घूमें जहाँ रावण की अनेक स्त्रियां सोई हुई थी। नशा कर सोई हुई स्त्रियों के उथले वस्त्र देखकर हनुमान जी कहते है।

कामं दृष्टा मया सर्वा विवस्त्रा रावणस्त्रियः ।
न तु मे मनसा किञ्चद् वैकृत्यमुपपद्यते ।।

अर्थात – मैंने रावण की प्रसुप्तावस्था में शिथिलावस्त्रा स्त्रियों को देखा है, किन्तु इससे मेरे मन में किञ्चन्मात्र भी विकार उत्पन्न नहीं हुआ। जब सब कमरों में घूमकर विशेष-विशेष लक्षणों से उन्होंने यह निश्चिय किया कि इनमें से सीता माता कोई नहीं हो सकती। ऐसा निश्चय हनुमान जी ने इसलिए किया क्यूंकि वह जानते थे की माता सीता चरित्रवान स्त्री है। न की रावण और उसकी स्त्रियों के समान भोगवादी है। अंत में सीता उन्हें अशोक वाटिका में निरीह अवस्था में मिली।

अगर आपका पूर्वज शराबी, व्यभिचारी, भोग-विलासी, अपहरणकर्ता, कामी, चरित्रहीन, अत्याचारी हो तो आप उसके गुण-गान करेंगे अथवा उस निंदा करेंगे? स्पष्ट है उसकी निंदा करेंगे। बस हम यही तो कर रहे है। यही सदियों से दशहरे पर होता आया है। रावण का पुतला जलाने का भी यही सन्देश है कि पापी का सर्वदा नाश होना चाहिए।

एक ओर वात्सलय के सागर, सदाचारी, आज्ञाकारी, पत्नीव्रता, शूरवीर, मर्यादापुरुषोत्तम श्री राम है। दूसरी ओर शराबी, व्यभिचारी, भोग-विलासी, अपहरणकर्ता, कामी, चरित्रहीन, अत्याचारी रावण है। किसकी जय होनी चाहिए। किसकी निंदा होनी चाहिए। इतना तो साधारण बुद्धि वाले भी समझ जाते है। आप क्यों नहीं समझना चाहते? इसलिए यह घमासान बंद कीजिये और पक्षपात छोड़कर सत्य को स्वीकार कीजिये।

सलंग्न चित्र- पंजाब में रावण की पूजा करते कुछ भ्रमित हिन्दू

 डॉ विवेक आर्य