सियासी रंग

तुम मुझे मां मानते हो, तो मुझे सियासी रंग में क्यों रंग रहे हो?”

 
”सियासी रंग? अरे क्या तुम नहीं जानती हो, यह तो हमारे देश के झंडे के रंग हैं!”

 
”मैं सब जानती हूं, तुम्में भी और तुम्हारे तिरंगे के रंगों को भी.”

 
”फिर इसे सियासी रंग क्यों कह रही हो? बताओ तो.”

 
”तुम्हारी समझ में तो आएगा नहीं, तुम तो अपनी सगी मां के भी सगे नहीं हो.”

 
”ऐसा क्यों कह रही हो?” मैंने गाय माता से पूछा.

 
”सुनना चाहते हो तो सुनो, मैंने देखा है, जब तक माता-पिता सही-सलामत हैं, तुम्हें खिलाते-पिलाते हैं, तब तक उन्हें नमस्ते करते हो, फिर उन्हें कबाड़खाने जैसी कोठरी में सड़ने के लिए फेंक देते हो. मेरा दूध मेरे बच्चों के लिए होता है, उसे भी निचोड़-निचोड़कर बेचने के लिए ले जाते हो, व्यापारी कहलाकर आयकर और GST देने में जो धांधलेबाजी करते हो, वह भी मुझसे छिपा नहीं है. जहां तक मुझे खिलाने-पिलाने की बात है, सबसे घटिया चारा खिलाते हो और चारा खिलाकर प्लास्टिक की पन्नी भी वहीं फेंक देते हो. मैं अनजाने में उससे उलझ जाती हूं और मेरा पेट प्लास्टिक का कारखाना बन जाता है, पर तुम बेपरवाह रहते हो. मेरी रक्षा के बहाने सांप्रदायिक दंगों में देश को उलझाते हो, ऊपर से तुर्रा यह कि अपने को सच्चा भारतवासी कहते हो.”

 
”तुम्हें कैसे पता?”

 
”कल तुम अपने दोस्त अनवर से यही तो कह रहे थे न! अरे कल तुम्हारे पास गौरी गाय पहुंच जाएगी, कुछ आहट मिली तो माहौल को सियासी रंग से रंगने में क्या देर लगेगी?”

 
अचानक मेरी नींद खुल गई. मुझे अपनी गलती महसूस हो गई थी. मैंने गाय माता को सियासी रंग से मुक्त करने का संकल्प लिया.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।