कविता – नारी और भाग्य

मन आशा की मूरत जिसका
आज निराशा छाई कैसे |

दिल में इतना प्यार संजोए
फ़िर ये नफ़रत पाई कैसे |

पल- पल होती रही उपेक्षित
सहती है रूसवाई कैसे |

नारी मन की यह पावनता
है इतनी गहराई कैसे |

है निश्छल मन की अनुरागी
करता तू निठुराई कैसे |

करती सौ सौ जनम निछावर
तू इतना हरजाई कैसे |

दुखित हृदय मन टूटा दरपन
मिटी आज परछाई कैसे |

यह दुनियाँ है एक समुन्दर
नइया पार लगाई कैसे |

लोप हुआ है ग्यान जगत का
ये दुनिया बौराई कैसे |

जग को जीवन देने वाली
खुद इतनी बेचारी कैसे |

नारी जग मे अगर मिटेगी
महकेगी अँगनाई कैसे |

गीत न गूँजेगे फ़िर घर में
बाजेगी शहनाई कैसे |

— मंजूषा श्रीवास्तव
लखनऊ (यू. पी)

परिचय - मंजूषा श्रीवास्तव

शिक्षा : एम. ए (हिन्दी) बी .एड पति : श्री लवलेश कुमार श्रीवास्तव साहित्यिक उपलब्धि : उड़ान (साझा संग्रह), संदल सुगंध (साझा काव्य संग्रह ), गज़ल गंगा (साझा संग्रह ) रेवान्त (त्रैमासिक पत्रिका) नवभारत टाइम्स , स्वतंत्र भारत , नवजीवन इत्यादि समाचार पत्रों में रचनाओं प्रकाशित पता : 12/75 इंदिरा नगर , लखनऊ (यू. पी ) पिन कोड - 226016