देखा

वे कहते हैं
ज़ख्मों के बाज़ार में मुस्कुराहटों को रोते देखा,
आसमां के गुलज़ार में सितारों को रोते देखा,
जब कहीं न चल सकी चाल उजियारों की,
अंधियारों के आज़ार में उजियारों को रोते देखा.
फिर भी यह अंत तो नहीं है,
वक्त तो अपनी चाल बदलता ही रहता है,
आज जो कहते हैं,
ज़ख्मों के बाज़ार में मुस्कुराहटों को रोते देखा,
कल वो ही कहते मिलेंगे,
मरहम के गुलिस्तां में ज़ख्मों को चैन से सोते देखा.
अभी हाल ही में, 
भाप बनते-बनते अविश्वास के काले बादलों को, 
अविश्वास प्रस्ताव के रूप में हौले-हौले बनते देखा,
फिर विश्वास की झीनी धार के बल पर, 
अविश्वास के काले बादलों को,
विश्वास के साथ धम्म से गिरते-बरसते देखा.
गठबंधन के बंधन को धीरे-धीरे बंधते देखा, 
गठबंधन के आंसुओं को ही संसद में 
विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर पानी फेरते देखा.
गठबंधन के आंसुओं को ही संसद में 
विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर पानी फेरते देखा.
गठबंधन के आंसुओं को ही संसद में 
विपक्ष के अविश्वास प्रस्ताव पर पानी फेरते देखा.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।