लेख– सुशासन स्थापित करने में क्यों पिछड़ रहें बड़े राज्य!

सबके के अपने दावे होते हैं। फ़िर वह केंद्र की सरकार हो, या राज्य की रहनुमाई व्यवस्था। आज के वक्त में कोई सुशासन पुरुष बन बैठा है, तो कोई विकास पुरूष। पर जब कोई ज़मीनी हक़ीक़त सामने आती है। ऐसे में फिर सभी वादों और दावों की कलई खुलनी शुरू हो जाती है। बिहार में सुशासन का पर्याय नीतीश कुमार बन बैठे हैं, तो मध्यप्रदेश में विकास का चेहरा शिवराज सिंह। कोई दलित का मसीहा बनकर सत्ता पा लेता है, तो कोई आएं दिन अपना पाला हिन्दू इतर मुस्लिम हिमायती और कभी मुस्लिम से हिन्दू हिमायती होने का ढोंग इसलिए रचता है, कि शायद इससे सत्ता मिल जाएं। इस बीच अगर हम कह दे, ऐसे में एक महत्त्वपूर्ण विषय छूट जाता है। तो वह होता है, जनकल्याण और सामाजिक सुरक्षा आदि का विषय। बिता हुआ अखिलेश सरकार का उत्तरप्रदेश में कार्यकाल भी कुछ यूँ ही गुजर गया। लेकिन वहां पर बीते वर्ष राजनीतिक झंडा बदल गया। साईकिल की जगह कमल का फूल खिले हुए एक वर्ष से अधिक का समय गुजर गया। पर आज भी वास्तविकता क्या है। शायद वहीं ढाक के तीन पात। यह हम नहीं, बल्कि रिपोर्ट भी कह रहीं है। हालिया रिपोर्ट सामाजिक-आर्थिक विकास के मामलों पर आधारित है। अब जब इस रिपोर्ट में बिहार, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश जैसे राज्य पिछड़े हुए हैं। तो इसे किस रूप में देखा जाए। क्या माने राजनीतिक वादे सिर्फ़ सत्ता-सुख के लिए किए जाते हैं। उनका वास्तविक स्थिति से कोई लेना-देना नहीं होता।

सामाजिक आर्थिक आंकड़ो पर आधारित सार्वजनिक सूचकांक-2018 के मुताबिक शासन-व्यवस्था के मामले में केरल एकबार पुनः पहले पायदान पर है। वहीं नीचे के नम्बरों पर बिहार, मध्यप्रदेश के साथ झारखंड जैसे राज्य हैं। तो ऐसे में यहां पर एक बात स्पष्ट है, कि केरल लगातार पहले नंबर पर क्यों है, क्योंकि वहां की व्यवस्था अवाम को मूलभूत ज़रूरते जैसे शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतरी से इंतजाम कराती है। तो फ़िर ऐसे में सवाल यहीं, कि झारखंड, मध्यप्रदेश और बिहार सरीखे राज्य क्यों अवाम को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं करा पा रहें। ऐसा भी नहीं कि इन राज्यों में स्थाई सरकारें न रही हो, और इन राज्यों के पास प्राकृतिक संसाधनों की भी कमी नहीं। फ़िर भी मध्यप्रदेश में शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति धूमिल है। वहीं हाल बिहार और झारखंड का भी है। मध्यप्रदेश के नौनिहाल कुपोषण के डंक से पीड़ित हैं। तो इन राज्यों में बेरोजगारी का आलम भी अधिक है।

ऐसे में सामाजिक, आर्थिक विकास पर आधारित पब्लिक अफेअर्स इंडैक्स-2018 की रिपोर्ट ने कुछ ऐसे आंकड़े पेश किए हैं। जो चुनाव की तरफ़ बढ़ रहे राज्यों के लिए चर्चा का विषय बन सकते हैं। चुनावी राज्यों में विपक्षी दल इस रिपोर्ट को अपना हथियार बना सकती है। खासकर मध्यप्रदेश में। चूंकि आने वाले वक्त में यहां चुनाव है। इस लिहाज से यह रिपोर्ट मध्यप्रदेश के लिए काफ़ी अहमियत रखती है। इस रिपोर्ट के मुताबिक 18 बड़े राज्यों में मध्यप्रदेश नीचे से तीसरे पायदान पर है। दरअसल पीएआई देश की रियासतों को दो हिस्सों में बांटकर सुशासन की सूची जारी करती है। जिसमें एक हिस्सा 18 बडे राज्यों का होता है, वहीं बाकी के दूसरे हिस्से में ऐसे राज्य होते हैं, जिनकी आबादी 2 करोड़ से कम होती है। तो अगर इस बार गुड गवर्नैंस के मामले में मध्यप्रदेश चार अंकों की गिरावट के साथ 16 वें नंबर पर है, 18 प्रदेशों में। तो अगर सभी राज्यों का आंकड़ा एकसाथ निकाला जाता, तो मध्यप्रदेश सूबे की स्थिति ओर दयनीय हो सकती थी।

ऐसे में प्रश्न तो यहीं क्या सूबे में विकास की उड़ान धीमी पड़ गई है? क्या विकास की सभी बातें सिर्फ़ कागज़ी हो चली हैं? तो यह कहना भी कतई सत्य नहीं होगा। हां पर इतना जरूर कहा जा सकता है, कि कुछ समय से जिस सामाजिक, आर्थिक उत्थान की आवश्यकता सूबे की अवाम को चाहिए। वह नहीं मिल पा रहीं। सूबे की रहनुमाई व्यवस्था चाहकर भी कुपोषण के कलंक से पिंड नहीं छुड़ा पा रही। जो उसके मस्तिष्क पर वर्षों से लगा हुआ है। इसके अलावा सामाजिक सुरक्षा मुहैया करने के मामले में सूबे की व्यवस्था विफ़ल हो रही है। ऐसा इसलिए क्योंकि सूबे में महिलाओं के प्रति अपराध की संख्या में तेज़ी से बढ़ोतरी दर्ज की जा रहीं। इसके अलावा शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में भी सूबा गति तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी नहीं पकड़ पा रहा। तो ऐसे में यह समझना भी ग़लत होगा, कि सूबे की सरकार हाथ पर हाथ रखकर बैठ गई है।

सूबे की सरकार आएं दिन प्रदेश की जनता के हितार्थ में योजनाओं का एलान कर रहीं। पर राजस्व के अभाव और नीतियों के सफ़ल क्रियान्वयन न हो पाने के कारण सूबे को सुशासन के मामले में पिछले वर्ष के मुकाबले चार पायदान का नुकसान झेलना पड़ रहा है। वैसे अगर इस रिपोर्ट का आधार देखा जाए। तो इस रिपोर्ट को तैयार करने के लिए देश के सभी राज्यों के दस अलग-अलग पहलुओं पर अध्ययन किया गया। इस अध्ययन का विषय सामाजिक सुरक्षा, महिलाओं और बच्चों की स्थिति, मूलभूत सुविधाओं की पूर्ति के साथ मानव विकास जैसे मुद्दे शामिल थे। ऐसे में अगर सूबे में तमाम सरकारी प्रयासों के बाद भी शिक्षा, स्वास्थ्य की स्थिति सुधर नहीं रहीं। तो रणनीति में बदलाव तो करना पड़ेगा।

एक आँकड़े के मुताबिक सूबे में पांचवी से आठवीं तक के 80 फ़ीसद बच्चे किताबे तक सही से पढ़ नहीं पाते। पढ़ भी कैसे सकते हैं, सूबे में प्रशिक्षित क्या। सामान्य तरीक़े के शिक्षकों की भी भारी तादाद में कमी है। सरकारी स्कूलों में सुविधाओं के नाम मिड-डे मील और गणवेश के अलावा कुछ विशेष मिल पाता नहीं। स्वास्थ्य की योजनाएं तो बहुत सारी कागज़ी पन्नों पर चल रहीं। पर परिणामदायक नज़र आती नहीं। तभी तो राज्य में शिशु मृत्यु दर 47 है। सरकारी अस्पतालों की हालत कंडम है। 87 फ़ीसद शिशु रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से सूबा जूझ रहा। किसानों की हालत भी तमाम सुविधाएं देने के बाद जस की तस बनी हुई है। इसके अलावा चुनाव के तरफ़ बढ़ रहे राज्य सरकार की मुसीबत औऱ बढ़ाने का काम किया है, सूबे की बिगड़ती क़ानून-व्यवस्था ने। देश का दिल महिलाओं को सामाजिक सुरक्षा देने में भी कुछ समय से नाकाम साबित हो रहा।

दुष्कर्म की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रहीं। रहीं बात रिपोर्ट की। तो इसके कुछ समय पहले नीति आयोग की भी एक रिपोर्ट आई थी। जिसमें यह कहा गया था, कि मानवीय विकास के मामले में माध्यप्रदेश काफ़ी पीछे छूटता जा रहा। तो ऐसे में अगर वर्तमान चल रही सूबे की सरकार को पुनः अपनी सत्ता बचाएं रखनी है, तो अपनी कमियों को बताते हुए जनता के बीच जाना होगा। साथ में अवाम को भरोसा देना होगा, कि अगले कार्यकाल में इन कमियों को दूर किया जाएगा। साथ में अभी जो समय चुनाव से पहले शेष है, उस दौरान लोक-लुभावन वादे से बचते हुए सामाजिक आर्थिक विकास के ठोस क़दम उठाने होंगे। इसके अलावा नीतियों का सफल प्रबंधन करने के साथ केरल राज्य से सीख लेना होगा, कि कैसे वह सुशासन के मामले में शीर्ष पर बना हुआ है। इसके अलावा अक्सर यह देखा जाता है, कि सरकारी नीतियों का धरातल पर नहीं दिखने का एक कारण नौकरशाही तंत्र का तमाम पेंचीदगी फंसाकर ख़ुद को सुविधाजनक स्थिति में रखना होता है। जिससे भी सामाजिक, आर्थिक विकास की गति प्रभावित होती है। तो सूबे की प्रशासनिक संस्कृति में भी बदलाव की दरकार दिख रहीं है। तभी सूबे की सीरत और सूरत बदल सकती है, और शिव का राज पुनः स्थापित हो पाएगा।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896