बुजुर्गों की पेंशन में विसंगतियां

हमारे देश में बुजुर्गों के योगदान को समाज और सरकार द्वारा स्वीकार किया गया हैं. समाज के हर क्षेत्र में सृजनात्मक क्षमता को बढ़ाने के लिए इनका इस्तेमाल होते आ रहा हैं. संयुक्त राष्ट्र की विश्व जनसंख्या रिपोर्ट बताती है कि भारत में 60 वर्ष से अधिक उम्र पार कर चुके नागरिकों की संख्या काफ़ी तेज़ी से बढ़ रही हैं  और साथ ही इनकी आर्थिक-सामाजिक परेशानियां भी लगातार तेज़ी से बढ़ रही है. पिछले एक दशक में बुजुर्गों की संख्या में लगभग 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई हैं. 71 फीसदी वरिष्ठ नागरिक ग्रामीण क्षेत्रों में और 29 फीसदी शहरी क्षेत्रों में है. सरकार की अनेक सामाजिक सुरक्षा योजनाएं है लेकिन इनका लाभ कुछ ही बुजुर्ग ले पा रहे हैं. सबसे विकट स्थिति है देश में असंगठित क्षेत्रों से सेवानिवृत हुए वरिष्ठ नागरिकों की. हमारे देश की कुल श्रम शक्ति का 90 फीसदी हिस्सा असंगठित क्षेत्र से हैं. असंगठित क्षेत्र के सेवानिवृत कर्मचारियों को पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा का लाभ उनके नियोक्ताओं से नहीं मिलता हैं. हमारे देश में लगभग 86 फीसदी बुजुर्ग मानवाधिकारों से अनजान हैं. बुजुर्गों की समस्या की जड़ तक जाने का कोई भी प्रयास तक नहीं करता हैं. इन वरिष्ठ नागरिकों ने राष्ट्र निर्माण में अहम भूमिका निभाई हैं. देश का इनके ऊपर कर्ज़ हैं. इनमें से अधिकांश वरिष्ठ नागरिक कई सामाजिक एवं सेवा संस्थानों से जुड़े हुए है जहाँ ये अपनी निशुल्क सेवाएँ देते हैं. कई वरिष्ठ नागरिक नई पीढ़ी का निशुल्क मार्गदर्शन करते हैं.

भारत सरकार की वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण से संबंधित रिपोर्ट में कहा गया है कि वरिष्ठ नागरिक ह्रदय रोग व अन्य कई गंभीर बीमारियों से पीड़ित है. वर्तमान समय में बढ़ती हुई महंगाई का प्रभाव एवं विभिन्न छोटी बचत योजनाओं, पब्लिक प्रोविडेंट फंड (पीपीएफ), कर्मचारी भविष्य निधि (पीएफ), किसान विकास पत्र (केवीपी), सीनियर सिटीज़न सेविंग्स स्कीम (एससीएसएस) में सरकार द्वारा ब्याज दर घटाने के कारण ये बुजुर्ग बड़ी आर्थिक परेशानी में पड़ गये हैं. बहुत सारे वरिष्ठ नागरिकों को मामूली पेंशन मिल रही है. हमारे देश में रिटायर्ड विधायकों और सांसदों को जीवनभर पेंशन मिलती है और साथ में सारी शाही सुविधाएं भी मिलती हैं जबकि इनमें से लगभग 80 फीसदी रिटायर्ड विधायक और सांसद करोड़पति हैं. विधायको और सांसदों को आर्थिक सुविधाओं में बढ़ोतरी का बिल संसद में पूर्ण बहुमत और ध्वनिमत से पारित हो जाता हैं. वर्तमान में सामाजिक सुरक्षा पेंशन के तहत विधवाओं को 200 रूपये प्रतिमाह और विकलांगों व वृद्धों को 300 रूपये प्रतिमाह पेंशन मिलती है. सरकार 15 अगस्त को इस सामाजिक सुरक्षा पेंशन की राशि को बढ़ाकर 500 रूपये प्रतिमाह करने की घोषणा करने वाली है. वर्तमान दौर में बढ़ती हुई महँगाई के जमाने में सामाजिक सुरक्षा पेंशन की इतनी कम पेंशन राशि का क्याँ औचित्य हैं? हमारे देश में सांसदों का वेतन जीडीपी के आधार पर तय होता है. समाज के कमजोर वर्ग के लोगों को मिलने वाली सामाजिक सुरक्षा पेंशन राशि का इतनी कम होना दुखद और शर्मनाक हैं.

देश में वृद्धों, विधवाओं और विकलांगों के लिए चल रही सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना में कई गड़बड़ियां है. पेंशन का समय पर नहीं मिलना, वृद्धावस्था में अंगुलियों के निशान का मिलान नहीं मिलने से पेंशन नहीं मिल पाती है. पेंशन के लिए आधार अनिवार्य है इससे काफ़ी संख्या में बुजुर्ग पेंशन से वंचित हो जाते है. सरकार ने केंद्र सरकार के सेवा निवृत कर्मचारियों को आधार की अनिवार्यता समाप्त की हैं. बुजुर्गों के कल्याण के लिए `प्रधानमंत्री व्यय वंदन पेंशन योजना`  अमीर बुजुर्गों के लिए है जिसमें एक हज़ार रूपये मासिक पेंशन प्राप्त करने के लिए एक मुश्त डेढ़ लाख रूपये जमा कराने है.

सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार वेतन व पेंशन निर्धारण को अलग-अलग नहीं किया जा सकता है परंतु बैंकों में कार्यरत कर्मचारियों के वेतन निर्धारण त्रिपक्षीय समझौते के तहत होते रहते है लेकिन उसका लाभ बैंक के पेंशनर्स को नहीं दिया गया है. जबकि केंद्र सरकार और राज्य सरकार के पेंशनर्स को कर्मचारियों के वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने पर पेंशन में बढ़ोतरी का लाभ दिया जा रहा हैं. आर्मी और रिजर्व बैंक के पेंशनर्स को भी यह लाभ मिल रहा है. सिर्फ़ बैंक के पेंशनर्स को यह लाभ नहीं मिल रहा हैं. बैंकों के पेंशनर्स की पेंशन का निर्धारण नवंबर, 1989 से लंबित है. भारतीय रिजर्व बैंक और केंद्रीय कर्मचारियों की परिवार पेंशन को वेतन की 30 फीसदी तक बढ़ा दिया गया है लेकिन बैंक के सेवानिवृत पेंशनर्स की परिवार पेंशन वेतन की अधिकतम 15 फीसदी है. बैंकों के कर्मचारियों का महंगाई भत्ता उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) के आधार पर त्रैमासिक निर्धारित होता है जबकि बैंक पेंशनर्स को इसका लाभ अर्धवार्षिक मिलता हैं.

लोकतंत्र में शासन की सारी व्यवस्था जनता के सामूहिक हित को ध्यान में रखकर की जाती हैं. लोकतंत्र में सरकार को लोक-कल्याणकारी सरकार कहा जाता हैं जो की सामाजिक और आर्थिक समानता सुनिश्चित करती हैं. विधेयक का संसद में प्रस्तुतिकरण के पश्चात उस पर सार्थक बहस होकर उसमें जनता के हित में आवश्यक सुधार होने चाहिए, लेकिन सांसद अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं करते हैं. संसद में विधेयक बिना चर्चा के ही ध्वनिमत से पारित हो जाते हैं. यदि विपक्षी सांसद शोरगुल करते हुए संसद का बहिष्कार भी कर दे तब भी सत्ता पक्ष के सांसदों ने तो हर बिल पर सार्थक चर्चा करनी चाहिए, उसके बाद ही बिल पारित होने चाहिए. क्योंकि संसद में चर्चा करना स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं. सांसद सत्ता पक्ष के हो या विपक्ष के उन्हें अपनी ज़िम्मेदारी का अहसास होना चाहिए. संसद में जनहित के मुद्दों पर चर्चा नहीं होना बड़ा दुखद और शर्मनाक हैं. संसद में बहस के दौरान ही सरकार की नीतियों की समीक्षा होती है. सांसदों को समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाना अनिवार्य किया जाना चाहिए. स्वस्थ लोकतंत्र के लिए संसद में रचनात्मक बहस होना आवश्यक हैं. औद्योगीकरण और बुनियादी ढाँचे को मजबूत करना, मेक इन इंडिया, बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटीज़ तक ही सरकार की सोच नहीं होनी चाहिए बल्कि हमारे देश के बुजुर्गों के चेहरे पर मुस्कुराहट लाकर ही सरकार को विकास के पथ पर देश को आगे ले जाना चाहिए. देश में प्रजातांत्रिक संविधान के तहत हम सभी की प्रतिबद्धता है कि देश के बुजुर्ग नागरिकों को भी गुणवत्तापूर्ण जीवन जीने की व्यवस्था हो.

—  दीपक गिरकर

परिचय - दीपक गिरकर

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