पनघट

*पनघट*
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घूम रहा है समय का पहिया, सब कुछ बदला जाए रे,
घर पर सबके नल लगा कोई पनघट अब ना आए रे।
बचपन और जवानी पहले पनघट चल कर आती थी,
प्रेम डगरिया पनघट वाली अब तो मिटती जाए रे।।

कमर पे अपने गगरी रखकर भाभी मटक के चलती थी,
भाभी के संग गाँव की चाची मुहँ बिचका के चलती थी।
बचपन वाला प्रेम भी पनघट पर जवां हो जाता था,
ओछी हरकत वालों की यहाँ खूब कुटाई चलती थी।।

जिस पनघट को भूल गए वो पनघट तो अलबेला था,
इस पनघट के रस्ते पर तो कई मिलन अलबेला था।
मिले कई के दिल यहाँ तो कइयों की हड्डी टूटी,
खट्टी मीठी यादों वाला यह पनघट तो अलबेला था।।

यारों के संग मिलते थे वह भी पनघट जब आती थी,
घड़ा उठाये एक छोटा सा वह हमसे नैन मिलाती थी।
पता चले ना यारों को हम छुप-छुपकर देखा करते थे,
अभी यौवन आना बाकी था पर मन मेरा बहकती थी।।

बचपन वाला प्यार हमारा पनघट पर मिल जाता था,
होंठ सिले थे पर नैनों से बात सभी कह जाता था।
वह पगली नैन मिलाकर पनघट पर शरमाती थी,
आँखों ही आँखों में मेरा चैन वहीं लुट जाता था।।

उसके आने से पहले हम रस्ते पर आ जाते थे,
वह सखियों, संग यारों हम रस्ते पर आ जाते थे।
वो पायल छनकती छम-छम हौले-हौले चलती थी,
हम भी छोटे पग धरते पनघट तक आ जाते थे।।

।। प्रदीप कुमार तिवारी।।
करौंदी कला, सुलतानपुर
7537807761

परिचय - प्रदीप कुमार तिवारी

नाम - प्रदीप कुमार तिवारी। पिता का नाम - श्री दिनेश कुमार तिवारी। माता का नाम - श्रीमती आशा देवी। शिक्षा - संस्कृत से एम ए। जन्म स्थान - दलापुर, इलाहाबाद, उत्तर-प्रदेश। मूल निवासी - करौंदी कला, शुकुलपुर, कादीपुर, सुलतानपुर, उत्तर-प्रदेश। इलाहाबाद मे जन्म हुआ, प्रारम्भिक जीवन नानी के साथ बीता, दसवीं से अपने घर करौंदी कला आ गया, पण्डित श्रीपति मिश्रा महाविद्यालय से स्नातक और संत तुलसीदास महाविद्यालय बरवारीपुर से स्नत्कोतर की शिक्षा प्राप्त की, बचपन से ही साहित्य के प्रति विशेष लगव रहा है। समाज के सभी पहलू पर लिखने की बराबर कोशिस की है। पर देश प्रेम मेरा प्रिय विषय है मैं बेधड़क अपने विचार व्यक्त करता हूं- *शब्द संचयन मेरा पीड़ादायक होगा, पर सुनो सत्य का ही परिचायक होगा।।* और भ्रष्टाचार पर भी अपने विचार साझा करता हूं- *मैं शब्दों से अंगार उड़ाने निकला हूं, जन जन में एहसास जगाने निकला हूं। लूटने वालों को हम उठा-उठा कर पटकें, कर सकते सब ऐसा विश्वास जगाने निकला हूं।।*