आलेख– अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस और हमारी युवा पीढ़ी

ऐसा माना जाता है, हम बदलेंगे, तो देश बदलेगा। ऐसे में जब हमारा देश बदलेगा, तभी हम इस सम्पूर्ण धरा पर बदलाव के संवाहक बन पाएंगे। हम आज के दौर में बड़ी-बड़ी हवाई बातें करके अपने आप को सांत्वना भले दे लेते हो, कि हम वैश्विक परिदृश्य का नेतृत्व करने की दिशा में बढ़ रहे। पर क्या माने जब देश की युवा पीढ़ी ही नशे में धुत्त हुई जा रही। सोशल मीडिया में अपना सारा समय गंवा रही। रहनुमाओं को फ़िक्र ही नहीं युवा पीढ़ी की। फिर किस हिसाब से हम विश्व का नेतृत्व करने की दिशा में आगे बढ़ रहें। यह सवाल व्यापक हो जाता है। क्या आज की हमारी राजनीति युवाओं के प्रति फिक्रमंद दिखती है? क्या आज की शिक्षा व्यवस्था ऐसे आयामों से रूबरू युवाओं को करा पा रही। जिससे वे विवेकानंद हो जाएं। शायद वैसी गुणवत्ता हमारे सामाजिक और राजनीतिक परिपाटी में ही शेष नहीं बची है। जिस देश का युवा नशे की लत में डूब जाएं, जिस देश का युवा अपराध के अंधकार में रचने-बसने लगें। जिस देश का युवा व्यसनों में संलिप्तता बढ़ा ले। वह ख़ाक किसी देश पर अपना आधिपत्य स्थापित कर सकता है। फिर वह अधिपत्य सामाजिक, सांस्कृतिक कैसा भी हो। संभव नहीं हो सकता। आज की राजनीति का दुर्भाग्य तो देखिए वह बात युवाओ की करेगी। पर उसी युवाओं को पथभ्रष्ट करने के लिए आएं दिन शराब और शबाब के ठेकों को सरकारी सांठ-गाँठ में बांटती फीर रही। तो ऐसे में एक सुनियोजित और सुसंस्कृत समाज का निर्माण कैसे हो सकता है। युवा देश को नई दिशा कैसे दे पाएंगे? यहां पर बात युवाओं की इसलिए चल पड़ी है, क्योंकि हम हर 12 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मानते हैं। तो यहां बात अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं की सामाजिक, राजनीतिक यथा-स्थिति और उनकी अहमियत की परिचर्चा होनी चाहिए थी। पर कहते हैं न अगर पड़ोसी को समझना है। तो पहले अपने घर में झांको। इसी मियाद पर इस लेख में हम बात अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस के महत्व, उसके उद्देश्य की तो करेंगे ही। साथ में राष्ट्रीय युवा दिवस का ज़िक्र करते हुए आज हमारे देश और समाज में युवाओं की क्या दशा और दिशा है। उस पर विचार अभिव्यक्ति करेंगे। साथ में कैसे युवा समाज को सही दिशा पर लाया जाएं। इन सभी बिंदुओं पर सारगर्भित दृष्टिकोण डालने का सफ़ल प्रयास करेंगे। क्या है, आज कि राजनीति में युवाओं का स्थान, क्यों राजनीति युवाओं को प्रश्रय देने से दूरी बनाती है। ये कुछ बिंदु काफ़ी महत्वपूर्ण होने वाले हैं।

1) अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की शुरुआत:-
अगर हम बात किसी देश के आधार की करें, तो युवा ही उस देश के सांस्कृतिक, सामाजिक और आर्थिक विकास के संवाहक होते हैं। अगर हम सदियों से विश्व गुरु और संस्कृति के मायनों में सबसे आगे रहें। तो इसका एक कारण ही मात्र यहीं था, कि हमारी संस्कृति और सभ्यता काफ़ी बलवती रही थी। जिसके बल पर हम अपना औरों से अलग अस्तित्व बनाएं रख पाए। हमारा देश अगर स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, कबीर और अन्य ऐसी सामाजिक विभूतियों से अभिभूत हुआ। जिसने हमारी परंपरा और संस्कृति का डंका सात समंदर पार तक बजवाया। पर आज कहीं न कही कुछ कतिपय कारणों से हमारी युवाओं की पौध अपनी संस्कृति और महान विभूतियों के विचारों से कटती जा रहीं। इतना ही नहीं वह सामाजिक कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों से भी मुँह मोड़ रही। जो आने वाले समय में बड़े सामाजिक विखंडन का कारण बन सकता है। कहते हैं न देश का कर्णधार युवा पीढ़ी होती है, लेकिन जब यही युवा अपने पारिवारिक, सामाजिक और राजनैतिक जिम्मेदारियों से इतर होकर व्यसन और विलासिता के कार्यों में अपना समय नष्ट करता है। तब देश की तरक़्क़ी बाधित होने लगती है।

समाज अपना अस्तित्व खोने लगता है। मर्यादाएं तार-तार होकर छिन्न-भिन्न होने लगती हैं। अगर हम बात अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की करें, तो यह 12 अगस्त को हर वर्ष मनाया जाता है। ऐसे में जिक्र इस बात का भी होना चाहिए, कि संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 को अंतरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया था। मतलब युवाओं की फ़िक्र अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को भी वर्षों पहले से रहीं है, लेकिन हमारे देश में तो युवाओं को सिर्फ़ वोटबैंक और पार्टी कार्यक्रमों में दरी बिछाने और पानी आदि पिलाने तक सीमित मान लिया गया है। इसके साक्ष्य भी हैं। जो आगे एक के बाद एक सामने आएंगे। अगर यहां पर हम बात पहली बार मनाएं गए अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस की करें, तो वह 2000 में मनाया गया था।

2) अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का उद्देश्य:-
आज विश्व का कोई भी युवा हो, अधिकतर को सिर्फ़ भोग-विलासिता में ही जीवन का परम उद्देश्य सफल होता प्रतीत होता है। विश्वभर में अधिकतर युवा बिलासिता और सुख-सुविधा को देखते हुए अपनी सरजमीं को छोड़ने में हिचक नहीं करते। ये सब बातें राष्ट्र के नवनिर्माण में बाधक बनती हैं। जब सुशिक्षित, गुणवान, देशभक्त और कर्तव्यपरायणता से परिपूर्ण युवा देश में होंगें ही नहीं। फिर राष्ट्र और समाज उन्नति कहाँ से कर सकता है। युवा किसी भी राष्ट्र की शक्ति और पूंजी होते हैं और विशेषकर भारत जैसे महान राष्ट्र की उर्जा और रक़म तो युवाओं में सदियों से ही सन्निहित चली आ रही है। ऐसे में अगर युवाओं का भारी संख्या में प्रवासन होता है, युवा अपनी संस्कृति से कट रहें हैं। मद की बूंदों में मदांध हो रहें, शबाब के आगे समाज, अपनापन, भाई चारे की भावना उन्हें दिखना बंद हो गया। तो इससे न केवल उस राष्ट्र की अक्षमता प्रदर्शित होती है जो अपने नौजवानों को पर्याप्त साधन नहीं दे सकता बल्कि इससे देश के विकास का सशक्त आधार भी दरकना शुरू हो जाता है।

उसके बाद उस देश की परंपरा, संस्कृति के साथ उनकी सामाजिक, आर्थिक सभी तरीक़े की विरासतें खतरे में पड़ जाती हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस को मनाने का एकमात्र धेध्य है, कि सरकार युवाओं के मुद्दों और उनकी बातों पर ध्यान आकर्षित करे। साथ में युवाओं के भीतर ऐसे गुण भरे जा सकें, जिससे देश, समाज में पनपती सामाजिक कुरीतियों का दामन युवा समाज कर सके, और अपनी संस्कृति और सभ्यता को सतत बनाएं रखने के साथ उसके सतत प्रवाह का वाज़िब कारण बन सके। आज का भौगोलिक परिवेश देखें, तो नैतिक और सामाजिक मूल्यों का ह्रास ही नहीं हुआ है, बल्कि आज के पारिदृश्य में अगर देखे तो किसी भी देश में भ्रष्टाचार, बुराई, अपराध का सिर चढ़कर बोलबाला बढ़ रहा है। जो वैश्विक परिदृश्य को आतंकवाद और अन्य तरीक़े की समस्याओं से भी ज़्यादा तीव्र गति से विश्व के देशों को खोखला किए जा रहा। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का मकसद यही है, कि युवा पीढ़ी में ऐसे विचार घोला जा सके। जिससे युवा ख़ुद की तरक़्क़ी के साथ अपने देश और समाज को तरक़्क़ी की राह दिखाने में समर्थ हो सके। ये हुई बात वैश्विक स्तर की। अब बात करें अपने भारतवर्ष की। जो संस्कृति, सभ्यता का अमिट धनी देश वर्षों से रहा है। जो गंगा-जमुनी तहजीब का वाहक, जिसकी धरा पर महापुरुष ही नहीं, साक्षात ईश्वर ने मानव रूप में जन्म लिया। जहाँ पर सत्य, अहिंसा का पाठ सदियों से समाज में रचा बसा रहा। वह देश आज अपनी विरासत को शैने-शैने नष्ट कर रहा। तो उसका सबसे बड़ा कारण पथभ्रष्ट होती युवा पीढ़ी है। जो न अपने सामाजिक मूल्यों को सहेज पा रही है। न हमारे देश के मंजे हुए सियासतदां उन युवाओं को बड़ी तादाद में आगे आने दे रहें। जिससे वे समाज को एक नई ऊर्जा के साथ नया मार्ग प्रदान कर सकें।

3) नशे में आकंठ डूबा भारतवर्ष का युवा:-
युवा हमारे देश का भविष्य है, लेकिन नशे की लत उस भविष्य को गर्त की तरफ धकेलती जा रही है। कहते हैं, एक समय था। जब कहा जाता था, कि देश में दूध-दही की नदियां बहती थी। पर आज अगर हम कह दे, कि हमारे समाज में दूध-दही की जगह शराब और शबाब ने ले लिया है। तो यह कतिपय अतिश्योक्ति मालूम नहीं पड़ेगा। आज हमारे समाज में शराब की नदियां बह रही। जिसमें देश का कोई भी कोना हो। वहां की युवा पीढ़ी आकंठ उसमें डूबती जा रही है। शराब की बिक्री में हर दिन बेतहाशा वृद्धि हो रही है। एक आँकड़े के मुताबिक हर वर्ष लगभग 15 फ़ीसद शराब की मांग देश में बढ़ रही। अब तो कोई भी समारोह हो, शराब के बिना महफ़िल युवाओं की अधूरी सी लगती है। हम सिर्फ़ विदेशी संस्कृति के आकर्षण से रौंदे हुए आज प्रतीत नहीं हो रहें, बल्कि उसकी जकड़न में उलझते जा रहें।

हम अंग्रेजी वर्ष की शुरुआत का उत्साह अब शराब की बूंद के साथ मनाने लगें हैं। जिस फ़िल्मी कलाकारों को हमारी युवा पीढ़ी अपना आदर्श मान बैठी है। वहीं शराब की कम्पनियों के ब्रांड एम्बेसडर सिर्फ़ पैसों की खातिर बन बैठे हैं। उनका ही आख़िर कितना दोष दिया जाए। जब हमारी सरकारें ही चलाती शराब बंदी का विभाग हैं। पर वह शराब के ठेकों की परमिट बांटने के अलावा ज्यादा अब समझ आती नहीं। शराब किसी एक व्यक्ति या परिवार को ही प्रभावित नहीं करती, बल्कि समाज और देश को भी प्रभवित करने का काम करती हैं। तभी इसके प्रभाव को महसूस करते हुए देश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने स्वतंत्र भारत को शराब मुक्त रहने की परिकल्पना व्यक्त की थी। पर दुर्भाग्य देखिए लोकतांत्रिक व्यवस्था को। आज कि राजनीति की। वह महात्मा गांधी के सपनों के भारत के निर्माण की बात तो करती है। पर राजस्व की दुहाई देकर आए दिन शराब का ठेका बांटने का कार्य कर रही। इतना ही नहीं गांधी के गुजरात में शराब बंदी के इतने वर्ष बाद भी आज वहां की स्थिति कैसी है। यह कोई बताने का विषय मालूम नहीं पड़ता। सच्चाई से सब वाक़िफ़ हैं।

4) राजनीति के हाशिए पर युवा नौजवान:-
विश्व की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले भारत में चुनाव में हर दल की नजरें युवाओं पर ही रहती है। दलील भी युवाओं की दी जाती है। कोई भी दल हो। सब के नारों का हिस्सा युवा होता है। कोई नारा देता है, युवा जोश। कोई तो युवाओं को आधार बनाकर ही अपनी रैलियों में भाषण देता है। लेकिन आलम यह होता है, न सकल नेतृत्व युवाओं को राजनीति में मिल पाता है, और न उनके हितों के बारे में सत्ता सीन होने वाले रहनुमा कभी सोचते हैं। तभी तो आज देश में युवा चेहरों की पहुँच संसद तक काफ़ी सिकुड़ी हुई है। हम अगर बात देश की विधानसभाओं में युवा चेहरों की करें, तो ऐसे चेहरे सीमित ही हैं। जिनके आँकड़े पिछले वर्ष सम्पन्न हुए गुजरात और हिमाचल प्रदेश के चुनावों से निकाल सकते हैं। इन दोनों राज्यों में सभी दलों ने मिलकर युवा शक्ति के हाथ पर विश्वास सिर्फ़ पांच फीसद ही कर सके। जिसमें से जीते सिर्फ़ और सिर्फ़ एक तिहाई से भी कम उम्मीदवार को मिली। इन दोनों राज्यों में 35 से कम उम्र के कुल 25 उम्मीदवार उतारे गए थे, जिसमें से जीत केवल आठ की हुई। अगर यह स्थिति दो राज्यों की है। जो शिक्षा आदि मामलों में काफ़ी बेहतर स्थिति में हैं, तो अन्य के आंकड़े पेश करने की जरूरत नहीं।
ऐसे में अगर आंकड़ों की बात हो तो हर वर्ष केवल 18-19 वर्ग आयु के ही तीन फीसद मतदाता देश में बढ़ जाते हैैं। राज्यवार इनका औसत भी इसके ही आसपास होता है। जबकि झारखंड, दमन दीव, नगर हवेली जैसे राज्यों में यह बढ़ोत्तरी लगभग दस फीसद के आसपास भी देखी जाती है। ऐसी स्थिति में जब युवाओं को न रोजगार मिलेगा, न बेहतर शिक्षा मिलेगी और न ही राजनीतिक प्रतिनिधित्व तो कैसे वे अपनी क्षमता का उपयोग देश के विकास में लगा सकते हैं। ऐसे में वे पथभ्रष्ट और समाज के लिए खलनायक नहीं बनेंगे, तो जाएंगे कहाँ।
वही अगर देश के संसद की बात करें। तो देश भले युवा होता जा रहा। आज की राजनीति नाज़ भी युवाओं पर करती है। पर सोलहवीं लोकसभा में 543 सांसदों में से 253 सांसद ऐसे हैं, जिनकी उम्र 55 साल से ज़्यादा है। जो प्रतिशत के हिसाब से क़रीब 47 फ़ीसदी के आसपास है, जबकि 15वीं लोकसभा में 55 साल से अधिक उम्र के सांसदों की संख्या 43 प्रतिशत थी। यानि
युवा देश में बुजुर्गों की सियासत बढ़ रही। फिर युवा जाए तो कहां। यह यक्ष प्रश्न उत्पन्न हो जाता है।

5) राष्ट्रीय युवा दिवस:-
युवाओं के प्रेरणास्त्रोत, समाज सुधारक स्वामी विवेकानंद ने युवाओं का आह्वान करते हुए कठोपनिषद का एक मंत्र एक बार कहा था- “उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।” अर्थात उठो, जागो और तब तक मत रुको। जब तक मंजिल न प्राप्त हो। उन्हीं के जन्मदिन के अवसर पर हमारे देश मे राष्ट्रीय युवा दिवस का आयोजन भी प्रति वर्ष 12 जनवरी को किया जाता है। यहाँ हम बात स्वामी विवेकानन्द के व्यक्तित्व की करें। तो उन्होंने भारतीय संस्कृति एवं हिन्दू धर्म के प्रचारक-प्रसारक एवं उन्नायक रहें। विश्वभर में जब भारत को निम्न दृष्टि से देखा जाता था, ऐसे में स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर, 1883 को शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में हिंदू धर्म पर प्रभावी भाषण देकर दुनियाभर में भारतीय आध्यात्म का डंका बजाया था। साथ में उन्होंने हमेशा युवाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया और युवाओं को देश, समाज और संस्कृति को सहेजने के लिए आगे आने के लिए आह्वान किया । इसलिए उनके जन्मदिन को देश में युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है।

पुनश्च:-
ऐसे में जिस दौर में हमारे समाज में युवा हर तरफ से अपने-आप को उपेक्षित महसूस कर रहा। उसे सही दिशा दिखाने और बतलाने का कार्य महापुरुषों के विचार ही कर सकते हैं। तो क्यों न हमारी शिक्षा में नैतिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाए। सिर्फ़ नैतिक शिक्षा की दो-चार पोथी न पढ़ाकर उन्हें समाज और घर-परिवार में भी बचपन से ही महान विभूतियों के गुणों से अवगत कराया जाए। साथ में गुरुकुल पद्धति की तरफ़ एक बार पुनः शिक्षा व्यवस्था का रुख़ मोड़ा जाएं। मैकाले की शिक्षा व्यवस्था देश में अंग्रेजी दिमाग ही पैदा कर सकती है। पर हमें अपने नैतिक मूल्य, और सामाजिक रीति-रिवाजों से रूबरू नहीं करा सकते। हमारी भाषा कितनी समृद्ध और सशक्त है, कि उसमें ईश्वर के लिए कई शब्द मिल जाएंगे। पर अंग्रेजी सिर्फ़ गॉड से काम चला लेती है। तो ऐसे में अगर सच में देश और समाज को तीव्र गति से आगे ले जाना है। तो हमें साल में एकाध दिन युवा दिवस मनाने से किंचित फ़ायदा नहीं होने वाला, क्योंकि आज हमारी बुनियादें अंदर से हिल चुकी हैं। युवा समाज ग़ुमराह हो रहा है। वह सामाजिक कार्यों से दूर हो चुका है। नैतिकता क्या होती है। उसे इसका लगभग भान नहीं रह गया है। वह व्यसन, व्यभिचार में डूबता जा रहा। बेरोजगारी उसे और पंगु बना रही। ऐसे में अब हमें युवा पीढ़ी को धैर्य रखने, व्यवहारों में शुद्ध‍ता रखने, आपस में न लड़ने, पक्षपात न करने और हमेशा संघर्षरत् रहने का संदेश प्रतिदिन अपनाने के लिए विवेकानंद जैसी महान विभूति के गुणों को सदा के लिए अपनाने के लिए प्रेरित करना होगा। युवाओं में सामाजिक कर्तव्यनिष्ठता जगाने के लिए उन्हें पढ़ाई के साथ सामाजिक कार्यों में लगाया जाना चाहिए। समाज, घर-परिवार और देश के प्रति उनकी क्या जिम्मेदारी और कर्त्तव्य होते हैं। उससे उन्हें रूबरू कराना होगा। यह काम एक दिन का नहीं प्रतिदिन का होना चाहिए। साथ में युवाओं को शराब और बुरी आदतों से छुड़ाने की जिम्मेदारी समाज और रहनुमाई व्यवस्था की है। उसे यह भान होना चाहिए। तभी देश और समाज सही पथ पर आगे बढ़ पाएगा, और हम नित्य नए आयाम स्थापित कर पाएंगे।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896