स्वच्छ भारत अभियान!!

भारत एक सफाई पसंद देश है। यह बात प्रमाणित करते-करते हमें चार साल हो रहे हैं। कोई कचरा उठा रहा है, तो उठाकर कचरा कर रहा है। कोई जगह देख कर थूँकता है। कोई थूँक कर जगह देखता है। सही जगह थूँका या नहीं। सिगरेट पीनेवाले पर्यावरण के प्रति ईमानदारी दर्शाते हुए, ऑक्सीजन साथ लेकर चलना चाहते हैं लेकिन क्या करें? सिलेंडर उपलब्ध नहीं। उनकी पर्यावरण स्वच्छ रखने की अभिलाषा का अंत टीबी के कारण अंतिम हिचकी से हो जाता है। पाॅलिथीन के प्रयोग पर कठोर कदम उठाए गए लेकिन लोगों के अनेक कदमों की जंज़ीर ने कठोर कदमों को आगे नहीं बढ़ने दिया।
भारत को स्वच्छ रखने के लिए आयोजित निबंध-स्पर्धा और चित्रकला प्रतियोगिता के कागज़ गाएँ खा गईं और जहाँ-तहाँ गोबर करके चौराहों पर भारत को स्वच्छ करने के लिए राज्यसभा की बैठक करती रहती हैं। सभापति साँड़ आकर सदन की कार्यवाही में अशोभनीय प्रदर्शन न करे तो ये सत्र अनंतकाल तक स्थगित न हो। डाॅगी भी भारत को स्वच्छ रखना चाहते हैं लेकिन डाॅगी-मालिक घर को साफ रखना चाहते हैं, भारत को नहीं। सुबह-सुबह धरती का अभिषेक करवाने भ्रमण पर निकल पड़ते हैं। कुत्ते अपना-अपना काम करते हैं। सारे देशवासी सफाई करने पर आमादा है। कुछ हज़ारों डकार गए , कुछ करोड़ों निगल गए ,तो कुछ अरबों चाट गए थे। अब तो बैंकों को ही साफ करने का फैशन चल पड़ा है। एक से भला मे मेरा क्या होगा? स्वच्छ भारत अभियान स्वतंत्रता मिलते ही आरंभ हो चुका था। यहाँ प्रधान मंत्री नाहक अपनी पीठ ठोंकने में लगे हैं कि हभ बापू को एक सौ पचासवें जन्मदिन पर स्वच्छ भारत देंगे। बापू की दत्तक औलादों ने ये अभियान तो उनके स्वर्गारोहण के साथ ही शुरु कर दिया था- रघुपति राघव राजाराम। देश-सफाई अपना काम।।
स्वच्छ भारत अभियान जारी है। अखबारों में, टीवी में, चित्रों में, फाइलों में। नेता जी इतने सुंदर तो दुल्हे के जोड़े में नहीं दिखे, जितने हाथ में झाड़ू पकड़ी हुई तस्वीर में। कचरे की टोकनी सिर पर संभाले हुए मेडम तो बाॅलिवुड की तन्वंगियों के पर कतर रहीं हैं। स्वच्छ-भारत कार्यक्रम के समारोह की संध्या की पार्टी के बाद परदे के पीछे पड़ी विदेशी दारू की खाली बोतलों की हुई कमाई से देशभक्तों देशी पी कर देश का कर्ज़ उतारा। स्वच्छ भारत के लिए आयोजित की गई वाद-विवाद स्पर्धा के अवसर पर आयोजित अल्पाहार की प्लेटें दूसरे दिन तक मक्खियों के नाश्ते के काम आती रहीं। बरसात में सराबोर कीचड़ के गड्ढों ने साबुन और वाशिंग पाउडर के मालिकों को मालामाल कर दिया। हैजा, मलेरिया, डेंगू की बीमारियों ने डाॅक्टरों के अच्छे दिन लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भारत स्वच्छ होता रहा। सब खुश हैं।
एक स्वच्छता अभियान देश में क्यों नहीं चलाया जाता? जब रिश्वतखोरी की सड़ांध से हवा दुर्गंधित है। जब आतंकवादियों और नक्सलवादियों की गोलियों से हुए शहीदों की खून से भारत की छाती दलदल बन रही है। जब अवसरवादी नेताओं के कचरे से मोहल्लों के डस्टबीन बिलबिला रहे हैं। जब भारत माता की बेटियों को कोख में श्मशान और कब्रस्तान का सुख प्रदान किया जा रहा है। इस गंदगी से भारत कभी स्वच्छ होगा? धर्म-निरपेक्ष भारत में इंसान पैदा कब होगा या नहीं। स्वर्गीय नीरज जी कहते-कहते सिधार गए-
चलो एक मजहब ऐसा भी चलाया जाए
जहाँ इंसान को इंसान बनाया जाए
आग लगी है यहाँ गंगा और झेलम में
कोई बता दे कि कहाँ जाकर नहाया जाए?

शरद सुनेरी