चैतन्यानंद सरस्वती प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर

चैतन्यानंद सरस्वती प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर की जन्मतिथि पर विशेष

चैतन्यानंद सरस्वती प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर

जीवन में गुरू की अपनी एक विशेष जगह हैं. बिना गुरू के कभी ज्ञान प्राप्त नहीं होता हैं. भगवान दत्तात्रेय जो कि स्वयं भगवान विष्णु के अवतार थे फिर भी उन्होंने अपने जीवन में 24 गुरू बनाए. चैतन्यानंद सरस्वती श्री प.पू. नाना महाराज का जन्म श्री क्षेत्र तराना (जिला उज्जैन, मध्यप्रदेश) में 13 अगस्त, 1896 नागपंचमी गुरूवार के दिन हुआ. आपका नाम मार्तंड रखा गया था. सदगुरू श्री नाना महाराज भगवान दत्तात्रेय के 16 वें अवतार थे. सदगुरू श्री नाना महाराज के भक्त हमारे पूरे देश में तो मौजूद हैं बल्कि विदेशों में भी काफ़ी भक्त हैं. दत्तात्रेय के अवतार के रूप में उनकी घर-घर पूजा होती हैं.  सदगुरू श्री नाना महाराज,  प.पू. वासुदेवानन्द सरस्वती टेम्बे महाराज के पाँच सर्वोत्तम शिष्यों में से एक शिष्य थे. प.पू श्री नाना महाराज का 97 वर्षों का संपूर्ण जीवन चैतन्य से भरा हुआ था. श्री नाना महाराज की पुण्यतिथि को 25 वर्ष हो चुके है लेकिन देश-विदेश में रहने वाले उनके भक्तों को उनकी उपस्थिति का अहसास आज भी होता हैं. उनके भक्तों को अपने दैनिक जीवन में कई अनुभव हुए हैं. अपने जीवन में ज्ञान और मुक्ति की प्राप्ति होने के कारण ही नाना महाराज को `चैतन्यानंद सरस्वती` के पद से नवाजा गया. वे एक महान योगी थे. वे संयम, त्याग एवं वैराग्य की प्रतिमूर्ति थे. वे सादगी, संतोष और संयम की जीवंत मूर्ति थे. वे निर्लिप्त एवं निर्मोही संत थे. उन्होंने इस भवसागर पर विजय प्राप्त कर ली थी, जिसे पार करना महान् दुष्कर तथा कठिन हैं. शांति उनका आभूषण था तथा वे ज्ञान की साक्षात प्रतिमा थे. गृहस्थाश्रमी होते हुए भी गाणगापूर (कर्नाटक) में उनका दो बार यतिपूजन हुआ यह साक्षात श्री दत्तात्रेय की ओर से उनका सम्मान था.

दया, क्षमा और शांति आपके रोम रोम में भरी हुई थी. कर्म, उपासना, ज्ञान, भक्ति और वैराग्य आपके पंच प्राण थे. मन से प्रभु का नाम स्मरण के साथ परमार्थ करना ही नाना के जीवन का ध्येय था. जिन भक्तों ने नाना के आदेश का पालन कर जीवन जिया ऐसे लाखों लोगों ने जीने की कला सीखी और आज वे उच्च पदों पर विराजमान हैं. सदगुरू श्री नाना महाराज के पास जो भी आया, उन्होंने उसे तृप्ति, संतुष्टि की दौलत दी. मन की उथल-पुथल, दु:ख, क्लेश श्री नाना महाराज का स्पर्श पाकर ही भाग जाते थे. उनकी अद्‍भुत वाणी संजीवनी का काम करती थी. भक्तों के लिए नाना सदैव शक्ति का स्त्रोत हैं. श्री नाना महाराज जैसे संत बारंबार जन्म नहीं लेते. आप भजनानंदी थे.

उनका व्यक्तित्व बहुआयामी हैं. उनकी सोच एवं उनका ज्ञान असीम हैं. उनका तप और उनकी साधना तो हमारे जैसे साधारण लोगों की कल्पनाशक्ति के बाहर हैं. उनका संपूर्ण जीवन त्याग और तपस्या से ओतप्रोत रहा. उनका समस्त जीवन आत्मप्रकाश से समृद्ध था. आत्मज्ञान की प्राप्ति में वे श्रद्धा को बहुत महत्व देते थे. निसंदेह श्री नाना महाराज आदर्श सन्यासी और परम विरक्त थे. जैसे पैठण में श्री एकनाथ महाराज की शोभा है उसी तरह इंदौर में श्री नाना महाराज की शोभा हैं. प.पू. नाना महाराज कहते थे कि तुम एक कदम आगे चलो, मैं तुम्हें दस कदम आगे ले चलूँगा. उन्होंने संस्कारों की पाठशाला आज से 95 वर्ष पूर्व प्रारम्भ की थी वह आज भी उसी तरह से चल रही है. उन्होंने आज से 30 वर्ष पूर्व ही महिलाओं को वेद-विद्या और मंत्र-पुष्पांजली सिखाकर उन्हें पुरूषों के बराबर ही धार्मिक क्षेत्र में योग्य बना दिया था. वे कहते थे `जब भी तुम मुझे याद करोगे, मुझे अपने समीप पाओगे.`

प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर एक मेनेजमेंट गुरू भी थे. वे मेनेज़मेंट के सिद्धांत सामान्य व सरल भाषा में समझाते थे. उनके अनुसार सफलता के मंत्र है – विश्वास और संकल्प. उनका कहना था कि जो आपने पढ़ा है उसे बार-बार पढ़ने से उसके अंदर के नये-नये अर्थ समझ में आते हैं, वे एक ही ग्रंथ को गहराई से पढ़ने  एवं उस पर मनन और चिंतन करने पर ज़ोर देते थे. वे सिर्फ़ अध्यात्मिक गुरू ही नहीं थे बल्कि इससे कई अधिक थे. प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर का कहना था कि मानसिक तनाव में काम करने वाले व्यक्ति को एक साधारण सा काम बहुत बड़ा व कठिन लगता है लेकिन यदि वह व्यक्ति प्राथमिकता के आधार पर महत्वपूर्ण काम को पहले कर ले तो उसके बचे हुए अन्य काम आसानी से हो जाएँगे. कुछ लोग दूसरों से काफ़ी अपेक्षाएं रखते है और फिर अपेक्षा पूरी नहीं होने पर निराश हो जाते हैं. अत: दूसरों से ज़्यादा अपेक्षा नहीं रखनी चाहिए. कुछ लोगों को लगता है क़ि हर जगह पर हमें ही पहले पहुँचना है चाहे वह लक्ष्य कितना भी कठिन क्यों न हो. कुछ लोगों में प्रतियोगिता की भावना होती है उन्हें हर कार्य एक शर्त के समान ही लगता हैं. हर कार्य में सहकार की भावना होनी चाहिए. इसलिए दूसरों को भी जगह देकर उनकों भी कार्य में सहभागीदार बनाना चाहिए. हर व्यक्ति को कोई न कोई शौक होना चाहिए. शौक ऐसा होना चाहिए कि मनुष्य उसमें रम जाए और अपने सब दु:ख-दर्द भूल जाए. वे हर प्रकार के तनाव को दूर करने के लिए यज्ञ को महत्व देते थे. उन्होंने अपने जीवनकाल में कुल 32 यज्ञ किए जिनमें वे यज्ञ के मुख्य आचार्य थे. विष्णु याग, दत्त याग, गणेश याग जैसे कठिन यज्ञ भी उनके हाथों से आसानी से संपन्न हुए.

मानसिक सुख सिर्फ़ समाधान और संतों के वचनों से ही मिल सकता हैं.  प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर के संपूर्ण चरित्र `श्री मार्तंड महिमा` का पाठ करने से भक्तों को मानसिक शांति और तनाव से मुक्ति मिली हैं. मानसिक सुख सामूहिक प्रार्थना से ही मिलता हैं. इसलिए श्री नाना महाराज के भक्तों ने प.पू. श्री बाबा महाराज तराणेकर के नेतृत्व में त्रिपदी सामूहिक प्रार्थना की विशिष्ट पद्धति अपनाई हैं. इस सामूहिक प्रार्थना से कई भक्तों को लाभ पहुँचा हैं. इसी कारण परिवार में भक्तों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही हैं. श्री नाना महाराज ने मात्र 11 वर्ष की उम्र में 49 दिनों तक `श्री गुरू चरित्र` का पाठ किया और इतनी अधिक कठोर तप-साधना की कि सद्गुरू शिरोमणि श्री वासुदेवानंद सरस्वती टेम्बे महाराज उनको दर्शन देने और आशीर्वाद देने के लिए विवश हो गये. वास्तव में एक सच्चे योगी एवं साधक के लिए कुछ भी असंभव नहीं होता, वे अपनी साधना के बल पर ध्यान-समाधि के द्वारा भगवान का साक्षात करने में समर्थ हो जाते हैं. श्री नाना महाराज को सभी भगवान के साक्षात दर्शन हुए. उनका कहना था `तारे मेरे कर्म तो प्रभु का क्याँ उपकार?` उन्होंने कर्म को ही प्रधानता दी हैं. उस समय के सभी संतों से श्री नाना महाराज बड़े प्रेम से मिला करते थे. श्री नाना महाराज ज्योतिषशास्त्र और संगीत में भी पारंगत थे. पं. कुमार गंधर्व, पं. प्रभाकर कारेकर, पं. सी. आर. व्यास, पं. अजीत करकड़े, सौ. आशाताई खाडिलकर ऐसे दिग्गज कलाकार नाना के सामने अपनी कला का प्रदर्शन करते थे और नाना से मार्गदर्शन लेते थे. `अन्नशान्ति सर्वशांति` उनका मंत्र है जिसका अर्थ है कि जब भी भक्तगण एकत्रित होकर प्रार्थना करें या कोई कार्यक्रम करें तब भंडारे का आयोजन अवश्य करें. लोकसभा स्पीकर श्रीमती सुमित्रा महाजन और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी को श्री नाना महाराज से ही समाजसेवा और धर्मार्थ की प्रेरणा मिली थी. आपने उत्तर भारत और पूरे महाराष्ट्र में दत्त संप्रदाय और अपने गुरू की शिक्षाओं का आजीवन प्रचार-प्रसार किया. 10 अप्रेल, 1993 को वे अपने भक्तों और स्नेहितों को दु:ख सागर में डुबोकर इस लोक से महाप्रयाण कर गये. उनका समाधि स्थल `चैतन्यपीठ` है जो की नागपुर (महाराष्ट्र) में हैं. श्री नाना महाराज के पोते श्री बाबा महाराज तराणेकर उनका कार्य कर रहे हैं. प.पू. श्री नाना महाराज तराणेकर ने त्रिपदी परिवार की स्थापना की थी. त्रिपदी परिवार देश-विदेश में दत्त संप्रदाय और श्री नाना महाराज की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार में लगा हुआ हैं. संपूर्ण देश व विदेशों में त्रिपदी परिवार की 350 से अधिक शाखाएं कार्यरत हैं. इनमें अलग-अलग समाज उपयोगी कार्य चल रहे हैं.

 

 

दीपक गिरकर

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दिनांक : 13.08.2018

 

 

परिचय - दीपक गिरकर

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