हुक्के की अर्थी

रात को सपने में मुझे एक हुक्के की हुंकार सुनाई दी. वह कह रहा था- ”हुक्के की अर्थी निकल रही है, सुना तुमने!” मैं समझ नहीं पाई माजरा क्या है! वह तो नेट खोलने पर बात का पता चला.

12 अगस्त को अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस मनाया जा रहा था. हमेशा की तरह इस दिन भी युवाओं के लिए कुछ-न-कुछ विशेष संदेश देना ही है, यह सोचकर भोपाल की एक एजुकेशनल सोसाइटी ने एक विशेष मुहिम चलाने का आयोजन किया. यों तो हुक्का पुराने जमाने का नवाबी शौक माना जाता रहा है, पर आजकल भोपाल के युवाजन न जाने क्यों इसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं. सो उन्हें जागरुक तो करना ही होगा. इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय युवा दिवस से अच्छा भला कौन-सा अवसर हो सकता है. फेसबुक पर बड़ा-सा इश्तहार वैसे ही निकल गया, जैसे आम आदमी की अर्थी उठने का निकलता है.

एक हुक्के को माला पहनाकर लिखा गया- ”आज के जागरुक युवाओं, यह महज एक हुक्के की ही नहीं, जल्दी ही आपकी अर्थी भी हो सकती है. आपको पता ही होगा, कि हुक्के के प्रयोग से कितने नुकसान होते हैं. आप समय रहते सुधर जाएं, अन्यथा आप भी अपने स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर बैठेंगे. दोपहर बाद तीन बजे हुक्के की अर्थी निकालकर उसको अंतिम विदाई दी जाएगी, कृपया आप सब हुक्के को श्रद्धांजलि देने के लिए एकत्रित हों.”

वैसे किसी पोस्ट को इतने लाइक्स मिलें-न-मिलें इस पोस्ट को बहुत-से लाइक्स मिले. एक महाशय ने प्रतिक्रिया में लिखा- ”हुक्के की लत में लिप्त युवाओं को पकड़कर इस जुलूस में शामिल किया जाए, अन्यथा उन्हें नुकसान का पता लग नहीं पायेगा.”

एजुकेशनल सोसाइटी के इस अनोखे प्रयास का अत्यंत सकारात्मक प्रभाव दिखा. हुक्के के अनेक युवा रसिया इस जुलूस में सम्मिलित हुए और उन्होंने हुक्के की लत को छोड़ने का न सिर्फ वादा किया, बल्कि अपने-अपने हुक्के तोड़ भी दिए.

भोपाल के कलेक्टर ने एजुकेशनल सोसाइटी के इस प्रयास की भूरि-भूरि प्रशंसा की. हुक्के की अर्थी ने केवल युवाओं को ही नहीं, बहुत-से लोगों को स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ न करने की उपयोगी सीख दे दी थी.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।