व्यंग्य – अंधायुग

आँखें, भगवान का वरदान है। अंधापन, अभिशाप। अक्ल भी भगवान की देन मानी जाती है। जो किसी को कम तो किसी को ज़्यादा मिलती है। इसमें आरक्षण का फाॅर्मूला नहीं बैठता। जो इसका उपयोग करता है, उसकी बढ़ती है। इसमें प्रतिभा काम आती है। जो सबके पास नहीं होती। अंधा आदमी अकलवर हो सकता है। अकलवर आदमी अंधा। लेकिन अकल का अंधा होना बुरी बात है। अकलवालों के अंधे होने के दुष्परिणाम ये देश महाभारत से ‘इस भारत’ तक देख चुका है। तब देश एक अंधे की सत्ता-पिपासा से बर्बाद हुआ था। आज अनेक अकलवर अंधों की सत्ता-लोलुपता देश को घुन की तरह खोखला कर रही है। देश अब पढ़ा-लिखा हो गया है। जितने विषय, उतने ही प्रकार के पढ़े-लिखे। यानि उतने ही प्रकार की घुन! जिसको जहाँ से मौका मिल रहा वहीं से चाट रहा है। अकलवर घुनें हैं!!
अकल और आँखों की तरह भक्ति सभी को नहीं मिलती। एक ज़माना था जब देश में उच्च और श्रेष्ठ क्वालिटी के भक्त होते थे-भगवान के। उनकी भक्ति जनकल्याण के लिए होती थी-नि:स्वार्थ। आज भी होते हैं-भक्त। लेकिन स्वार्थी! खुर्राट!! अवसरवादी!!!चापलूस!!!!और धोखेबाज!!!!! जैसे बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, उसी तरह बड़े भक्त, छोटे भक्तों को निगल जाते हैं। इसलिए मुझे भक्तों से बड़ा डर लगता है। आजकल दूसरे प्रकार के भी भक्त होते हैं। जिनका संबंध भगवान से नहीं, इंसान से होता है। सभ्य समाज इन्हें अंधभक्त की पदवी से सम्मानित करता है। ठेठ भाषा में इन्हें चम्मच’ कहा जाता है। इसे सुनकर भक्त बुरा मान जाता है। स्वाभिमान को ठेस जो पहुँचती है। हमारे देश में भक्तों का सम्मान होता है। देखिए ना-सूरदास जी। वे अंधे भी थे और भक्त भी, पर अंध भक्त नहीं, कि पप्पू के भक्तों की तरह। हर बात पर वाह-वाह कर दी। राधा और गोपियों के माध्यम से राजा कृष्ण को फटकारने की हिम्मत भी रखते थे। –
“हरि हैं राजनीति पढि आए ।
तें क्यौं अनीति करें आपुन ,जे और अनीति छुड़ाए
राज धरम तो यहै है सूर, जो प्रजा न जाहिं सताए।”
ये अंधायुग है-अकल के अंधों का। चंद अंधे, हाथी की पूँछ पकड़कर वैतरणी पार करने गिरोह बना रहे हैं। करोड़ो गाएँ अकल के अंधों की फैंकी हुई पाॅलिथीन चर रही है। गाय काटने के काम आती है या राजनीति के। जैसी जिसकी श्रद्धा। सरदार छलाँग मारकर हाथी की पूँछ पकड़ेगा। फिर सारे अंधे एकमेएक की टाँग पकड़कर घाट तक पहुँच जाएँगे। पर क्या करें, सरदार मिल नहीं रहा।
अकल के केवल अंधे नहीं होते। अकल के पुतले भी होते हैं। आज़ादी के बाद देश में मानवों और महामानव के पुतलों की संख्या में काफी मात्रा में बढ़ोत्तरी हुई। किंतु मानवता में कमी आई।मर्यादा का अतिक्रमण हुआ या अतिक्रमण की मर्यादा ध्वस्त हुई, पता नहीं!? जब-जब अंधे आँखवालों के कंधों पर सवारी कर उसका मार्गदर्शन करते हैं, ऐसा होता है। मैंने कहा ना, ये अंधायुग हे। आँखवालों को सावधान रहना चाहिए। क्यों? क्योंकि-
“अंधे करते बात यहाँ पर, चश्मदीद गवाही की
झूठों के मुख बात सुनी है, हमने यहाँ सचाई की।”
समझ नहीं आता इस देश का क्या होगा? ये युग अंधा जो है।

शरद सुनेरी