राजनीति

आलेख– राजनीतिक दांव-पेंच में फंसा वैध-अवैध का मसला

वैध और अवैध के बीच मानवीय संवेदना आकर अटकती दिख रही है। एक दृष्टिकोण से मान लिया जाएं, कि 40 लाख लोग असम में अवैध रूप से रह रहे। पर इनके यहां तक पहुँचने का दोषी कौन है। इसकी जिम्मेदारियां लेने को तैयार कौन है, आज के दौर में। फ़ैसला इसका भी होना चाहिए। सरकारें अवसरवादी राजनीति करती आ रहीं हैं, और वर्तमान में भी वही रवैया चल रहा है। अभी असम में तलवारें इस बात को लेकर खींच रही, कि क्या हम अपने ही नागरिकों को शरणार्थी मान लेंगे? ऐसा इसलिए, क्योंकि अगर पूर्व राष्ट्रपति के रिश्तेदार और परिजनों के नाम भी असल में शामिल हैं नहीं। राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में। फिर चूक तो कहीं न कहीं हो रही या जानबूझकर की जा रही। ऐसे में लगता यहीं अभी तक जो 1971 से हुआ और हो रहा है वह मत तंत्र से ज़्यादा प्रेरित दिख रहा। असम सरकार अपने नागरिकता रजिस्टर का अन्तिम प्रारूप जारी कर चुकी है।

छह माह पहले जारी शुरुआती प्रारूप में, असम की आधी आबादी रजिस्टर से बाहर थी। उसके बाद अन्तिम प्रारूप में भी अगर 40 लाख लोग बाहर हैं। इसके अलावा असम की सडक़ों से लेकर देश की संसद तक बहस चल रही है कि अब इन 40 लाख लोगों का क्या होगा? हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस रिपोर्ट के आधार पर किसी भी कार्रवाई पर फिलहाल रोक लगा दी है। अभी यह भी तय नहीं है कि ये सब कौन हैं? कहां से आए हैं? इनमें से कितने बंगाली, बिहारी या देश के किस कोनों से हैं? इसके साथ यह भी नहीं पता कि इनमें से कितने किस धर्म के हैं? लेकिन अफवाहों के बाजार के साथ मततंत्र का सियासी पारा ख़ूब गर्माया हुआ दिख रहा। तो समझ तो यही आ रहा, राजनीति के हैसियतदारों को फ़िक्र इस बात की नहीं, कि इन लोगों की सटीक पहचान हो और असम की स्थानीय अवाम को इन लोगों की वज़ह से आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक हानि न झेलनी पड़े। फिक्र तो 2019 के लिहाज़ से मततंत्र दृष्टिगोचर हो रहा। कुछ भी हो, इन 40 लाख लोगों की बात अगर एक तरफ़ है। तो दूसरी तरफ़ असम के स्थानीय निवासियों की आर्थिक, सामाजिक और संस्कृति का सवाल भी है। आज हम बात अगर असम के नागरिकता रजिस्टर विवाद से अलग करें, तो यह कौन नहीं जानता-समझता कि देश में लाखों नहीं, करोड़ों बांग्लादेशी रह रहे हैं। इसके अलावा अगर आज़ादी के बाद के कद्दावर नेता फखरुद्दीन अली अहमद ने स्वीकार किया था, कि वोट के लिए पूर्वी पाकिस्तान जैसे देशों से मुस्लिमों का लाया गया था। तो आख़िर ये लोग आते कैसे है। आख़िर कोई न कोई जयचंद तो हमारी सुरक्षा व्यवस्था के भीतर भी होता है, जिसके कारण घुसपैठियाएँ देश के भीतर आ पाते हैं। इसके अलावा अगर इन घुसपैठियों का देश में मतदाता-पहचान पत्र भी बन जाता है। फिर कहीं न कहीं अंदुरुनी खोखलापन व्यवस्था में भी घर कर चुका है। फिर वह चाहें जिस कारण पनपा हो।

एक दफा हम मान लेते हैं, कि पूरे 40 लाख लोग असम में अवैध रूप से बांग्लादेशी ही रह रहे। तो सवाल तो बहुतेरे ख़ड़े होंगे। आख़िर इतनी बड़ी तादाद में लोग घुसपैठ करके आ कैसे गए? हमारी सीमाएं जब हर तरफ़ से चाक-चौबंद हैं। फिर इतनी बड़ी संख्या में लोग अगर देश के भीतर आ रहें, फिर आंतरिक स्तर पर खामियां तो है, जरूर। इसके अलावा दूसरा सवाल मानते हैं, कि देश की रहनुमाई व्यवस्था एक झटके में इन्हें बांग्लादेशी घोषित कर देश से जाने को कह सकती है, लेकिन ऐसे में जब बांग्लादेश की सरकार इन नागरिकों को यह कहते हुए पल्ला झाड़ लेगी। ये असम में रहने वाले अवैध नागरिक उनके नहीं। फिर क्या होगा? इन विषयों पर क्या हमारी सरकार संजीदा है। ये सब पड़ताल करना बेहद आवश्यक है, आख़िर मानवता और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार की बात भी तो आड़े आएंगी। जिन्हें आसानी से दरकिनार नहीं किया जा सकता।

1) परत दर परत एनआरसी की कहानी:-

अभी तक असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर के नियम के मुताबिक 40 लोगों को अवैध माना जा रहा। तो यहां पर हम ज़िक्र कर लेते हैं, बीते वक्त में बांग्लादेश के गठन से लेकर अभी तक की राजनीतिक और सामाजिक कहानी पर। असम में अवैध रूप से रह रहे लोगों को निकालने के लिए सरकार ने अपने स्तर पर विश्व का सबसे बड़ा अभियान चला रखा है। इस अभियान की बात करें, तो यह तीन शब्दों पर आधारित है। डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट। इन शब्दों का आशय यह है, कि पहले अवैध रूप से रह रहे लोगों की पहचान की जाएगी फिर उन्हें वापस उनके देश भेजा जाएगा। यहां एक बात का ज़िक्र होना लाजिमी यह है, कि विश्व का कोई भी कोना हो, अगर वहां पर दूसरे लोग रहेंगे। तो उसकी संस्कृति, सामाजिक ताने-बाने और आर्थिक स्थिति पर प्रभाव आवश्यक रूप से पड़ता है। उन्हीं दवाबों को असम के स्थानीय लोग भी वर्षों से भुगत रहें। लेकिन जिस हिसाब से वर्तमान सरकार तीव्र गति से वैध-अवैध का डीएनए टेस्ट करने में लगी है। वह मानवीय और अंतरराष्ट्रीय बुनियादी कायदों के अनुरुप कतई खरा नहीं कहा जा सकता।

यहां हम सिलसिलेवार घटनाक्रम की बात असम में घुसपैठियों को लेकर कर रहें, तो यह अभियान तक़रीबन 37 सालों से चल रहा है। ऐतिहासिक रूप से देखें, तो जब 1971 में बांग्लादेश के स्वतंत्रता संघर्ष के दौरान वहां से लोग पलायन कर भारत भाग आए और यहीं बस गए। उसके बाद से निरंतर घुसपैठियों का प्रवेश जारी रहा। जिसे शायद रोकने की हिमाकत मततंत्र की खातिर रहनुमाई तन्त्र ने भी नहीं किया, और हमारी सुरक्षा तंत्र भी अपनी जिम्मेदरियों को निभाने में शायद कमतर अपने-आप को पाती रही। ऐसा नही ये घुसपैठियाएँ असम में घुस आएं और असम के स्थानीय लोगों ने अपनी अस्मिता और संस्कृति पर उन्हें अधिपत्य स्थापित करने दिया। असम के स्थानीय लोगों और घुसपैठियों में कई बार हिंसक वारदातें भी हुई हैं। पर घुसपैठियाएँ आते रहे, और स्थिति आज इस मुहाने पर आकर खड़ी हो गई है। यहां पर बात अगर करें, कि सबसे पहले घुसपैठियों को बाहर निकालने का आंदोलन किसने किया। तो इसका श्रेय ऑल असम स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद को जाता है, जिन्होंने 1979 में इन घुसपैठियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया। ऐसे में एक भयानक हिंसक आंदोलन लगभग छह वर्षों तक चला। उसके बाद हिंसा को रोकने 1985 में केंद्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच एक समझौता हुआ। उस समझौते में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी और स्टूडेंट यूनियन और असम गण परिषद के नेताओं में मुलाकात हुई।

उसके बाद यह तय हुआ, कि 1951-71 से बीच आए लोगों को नागरिकता दी जाएगी, परन्तु उसके बाद आए लोगों को वापस भेजा जाएगा। लेकिन यह समझौता ज़्यादा दिन तक अमल में नहीं रह पाया। तत्पश्चात असम में सामाजिक और राजनीतिक तनाव बढ़ता चला गया और 2005 में राज्य और केंद्र सरकार में राष्ट्रीय नागरिक के मुद्दे पर पुनः समझौता हुआ। इसके उपरांत यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा। तो इसी बात को भाजपा ने भुनाते हुए 2014 में चुनावी मुद्दा बनाया। अगर सत्ता में आएं, तो बांग्लादेशी घुसपैठियों को देश से बाहर किया जाएगा। जिस तरफ़ वह 2019 चुनाव में फायदा उठाने के लिए तेज़ी से क़दम बढ़ाती दिख रहीं।

2) एनआरसी और राजनीतिक ध्रुवीकरण:-

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर जमकर सियासी पारी खेली जा रहीं। फिर चाहें हो विपक्ष के द्वारा बैटिंग की जा रही हो, या सत्ता पक्ष द्वारा। सत्ता पक्ष एक तरफ़ जहां एनआरसी मुद्दे के बल पर 2019 चुनाव में बढ़त बनाने की सोच रहीं। वही मंशा विपक्ष की भी है, बस वह सरकार की नीतियों का विरोध करके यह बढ़त हासिल करने की सोच रहीं। विपक्ष तो राजनीति कर ही रहीं एनआरसी के मुद्दे पर, लेकिन सत्तापक्ष भी कमतर दिख नहीं रही। तभी तो पार्टी की तरफ़ से दो दिन में दो बयान आते हैं, और दोनों के मायने और अर्थ अलग-अलग होते हैं। 30 जुलाई 2018 को संसद में गृह मंत्री राजनाथ सिंह बलपूर्वक कहते हैं, कि एनआरसी ड्राफ्ट तैयार करने में केंद्र सरकार की कोई भूमिका नहीं है और यह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर किया जा रहा है। तो वहीं उसके अगले दिन ही यानी 31 जुलाई 2018 को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा, कि एनआरसी लाने की हिम्मत उनमें थी। तो वे ला रहें। अब अगर सत्तासीन दल के दो नेता दो तरीक़े की बात पेश कर रहें। फिर कुछ कहने सुनने को तो बचता नहीं। इसके आगे अगर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कहते हैं, कि 2005 में कांग्रेस ने एनआरसी की प्रक्रिया आरंभ की थी। वे लोग इस पर कैसे आपत्ति उठा सकते हैं, और वोट बैंक की राजनीति का आरोप लगा सकते हैं? कांग्रेस में साहस नहीं था कि वह बांग्लादेशी घुसपैठियों को यहां से भगाए। उनके लिए वोट बैंक की राजनीति महत्वपूर्ण है, देश की सुरक्षा महत्वपूर्ण नहीं है। फिर यहां एक प्रश्न यह उठता है, मानते हैं सरकार असम में लगभग 40 लाख लोगों को वहां से खदेड़ कर ही मानेगी, लेकिन कुछ मानवीय धर्म और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनी प्रक्रिया भी तो होती है। उसकी प्रक्रिया क्या होगी। यह भी तो पूरा करना सरकार का कार्य है। अगर उसे नजर-अंदाज करते हुए एकाएक क़दम लोगों को बाहर भेजने का कर लिया गया। फिर तत्कालिक स्थितियां ओर बिगड़ सकती है।

इसके अलावा अगर देश के अन्य हिस्सों से व्यापार आदि करने के लिए गए लोग भी सरकारी जल्दबाजी की वजह से घुसपैठियाएँ साबित किए जा रहें। तो यह कैसा राजधर्म होगा। एक मिनट के लिए मान लिया जाएं, 40 लाख पूरे घुसपैठियाएँ हैं। तो ऐसे में तेलंगाना के भाजपा सांसद राजा सिंह कहते है, कि असम के ये 40 लाख लोग जिनका नाम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में दर्ज नहीं। वे रोहिंग्या या बांग्लादेशी अवैध घुसपैठिए हैं और वे इज्जत से भारत नहीं छोड़ते हैं। तो उन्हें गोली मार दी जाएगी। इसे तो किसी भी दृष्टि से मानवीयता और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार की दृष्टि से न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे में लगता यहीं है। आज की विपक्ष, तो वर्षों से राजनीतिक लाभ इन मुद्दों पर लेता आ रहा, और अब भाजपा भी थोड़ा सा पासा बदलकर सियासी हित साधना चाह रहीं। भाजपा के नेताओं के सार्वजनिक बयान यह स्पष्ट कर देते हैं कि वे भारत को अवैध प्रवासियों से मुक्त तो कराना चाहते हैं लेकिन इसमें सरकार की भूमिका क्या होगी। उसके प्रति वे विभ्रम की स्थिति में है। इतने सारे लोगों को एक साथ देश से बाहर निकालना कोई गुड़िया-गुड्डे का खेल तो नहीं। फिर पहले सरकार को एक स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। जिससे यह स्पष्ट हो, कि 40 लाख में ओर कितने देश के ही नागरिक है। इसके बाद अंतराष्ट्रीय संस्थाओं के दख़ल द्वारा घुसपैठियाएँ को देश निकाला देने की तरफ़ बढ़ना चाहिए, पर वैसा कुछ होता दिख नहीं रहा। इसलिए इस मानवीय मूल्यों के विषय और असम के लोगों की आर्थिक, सामाजिक और संस्कृति के विषय पर ज़्यादा बू तो राजनीतिक हितों के संरक्षण की आ रहीं।

3) राष्ट्र की अवाम पहले, फिर भी मानवीय धर्म का पालन करना ज़रूरी:-

हमारे देश में अगर सुविधावादी राजनीति बंद हो जाएं। तो शायद अधिकांश समस्याएं दूर हो जाएं। पर दुर्भाग्य है लोकतांत्रिक परिपाटी का, कि यहां अधिकांश मुद्दों पर पक्ष-विपक्ष अपने-अपने राजनीतिक हितों के लिए बंटे हुए रहते हैं। समता का भाव किसी भी मुद्दे पर किंचित दिग्दर्शित नहीं होता। हम ज़िक्र करें, तो किसी भी देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पहला एकाधिकार वहां के नागरिकों का होता है। इसकी पुष्टि वैसे हमारा संविधान भी करता है। साथ में हमारे देश में अगर शिक्षा, स्वास्थ्य की सेहत दयनीय है। फिर तो अगर अपने संसाधनों का कोई दूसरा उपभोग करें। तो यह बिल्कुल जायज़ नहीं, लेकिन हमें यहां यह भी सनद रहें हम एक सामाजिक प्राणी हैं। जहां पर मानवीय सम्वेदना भी अपना महत्व रखती हैं। अगर हम मंथन करें, तो मालूमात होता है, कि हमारे देश में प्रवासियों, अप्रवासियों, शरणार्थियों और यहां तक की घुसपैठियों के मानव अधिकारों और मूल अधिकारों को लेकर सियासी रोटी आज से नहीं सेंकी जा रही। यह वर्षों पुरानी बीमारी बनती जा रहीं।

असम में तो घुसपैठ की समस्या ने वहां के समूचे क्षेत्र में आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृति की विकट समस्याएं उत्पन्न कर दी है। अवैध तौर पर बसे लोगों के जीवन की कठिनाइयों व उनके अधिकारों को लेकर संसद से सडक़ तक चिंता भी जताई जा रही है। पर उन लोगों में वैध और अवैध कौन है, यह पता करने की फिक्रमंद राजनीति के हैसियतदार दिख नहीं रहे। न ही देश के 21 करोड़ भुखमरी के शिकार लोगों की फ़िक्र किसी को नज़र आ रही। देश में 40 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। अमूमन हर आधे घंटे में एक किसान अपनी जान देश में दे रहा। देश की ही एक बड़ी आबादी के पास सिर ढकने के लिए छत नहीं। बच्चों की पढ़ाई के लिए बेहतर सरकारी स्कूल नहीं है। इसके इतर हमारे देश का वह संविधान जिसमें ज़िक्र किया गया है, हम भारत के लोग। उसके अनुच्छेद 42 और 43 से स्पष्ट कहा गया है, कि न्यायपूर्ण और उचित वातावरण, बेहतर मजदूरी, अच्छा जीवन स्तर मयस्सर कराने की जिम्मेदारी राज्य की रहनुमाई व्यवस्था की होगी। उस मुद्दे पर वह तो फ़ेल नज़र आती हैं। साथ में असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर पर जो राजनीतिक गोटी फेंकी जा रही।

वह यह साबित कर रही, कि देश के अवाम को भटकाने की राजनीति आने वाले वक्त में भी चलती रहेगी। मानते हैं, असमिया लोगों की अस्मिता, संस्कृति और आर्थिक स्थिति बाहरी लोगों से बिगड़ रहीं। पर यह दवाब तो सिर्फ़ असम झेल नहीं रहा। ऐसा दवाब महाराष्ट्र भी झेल रहा, पश्चिम बंगाल भी झेल रहा। गुजरात भी झेल रहा। भले ही इन राज्यों में देश के लोग ही पहुँच रहे हो, तथापि हक तो स्थानीय लोगों का ही छीन रहे। ऐसे में कहते यही बनता है। भले ही वे लोग देश के विभिन्न कोनों से गए क्यों न हो, या विदेशी घुसपैठियाएँ। स्थानीय लोगों के हित तो हर जगह प्रभावित हो रहें। तो ऐसे में ज़रूरत तो यह है, कि देश के ऐसे सभी हिस्से चिन्हित हो। जहां पर ऐसे लोग रहते हैं। वरना सिर्फ़ असम की बात ही होगी। तो वह राजनीति प्रेरित ही लगेगी, क्योंकि अगर वहां पर घुसपैठियाएँ आएं। तो उस दौर की राजनीतिक व्यवस्था और सेना के कुछ तथाकथित जयचन्दों की वजह से वह सम्भव हो पाया। इसका सीधा मतलब तब राजनीति ने दूसरे तरीक़े से फ़ायदा लिया, और आज जब सत्ता में कोई ओर दल है। फिर अन्य तरीक़े से फ़ायदा लेने की जुगत हो रही। जिस बड़ी संख्या में असम में घुसपैठियाएँ होने की बात की जा रहीं। उन्हें देश से खदेड़ने की प्रक्रिया कुछ आसान नहीं रहने वाली। उसके लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफ़ी झमेले पड़ने वाले। तो पहले उसको क्यों रहनुमाई व्यवस्था दूर नहीं करती। अगर उसे सच में स्थानीय लोगों की फ़िक्र हो रहीं।

4) कुछ यूं था, असम समझौता:-

बांग्लादेशी घुसपैठियाएँ देश के भीतर तमाम तरीक़े की समस्याओं की जड़ बनते है। साथ में यहां रहकर दूसरे वर्गों में शादी-ब्याह भी करते है। जो हमारे सामाजिक व्यवस्था के लिए खतरनाक स्थितियां है। इसके इतर ये घुसपैठियाएँ अनेकोनेक अपराध में भी संलिप्त होते हैं। जो हमारी सामाजिक व्यवस्था के साथ संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित करते हैं। ऐसे में इनकी पहचान और इनसे आज़ादी मिलना स्थानीय अवाम के लिए बेहद जरुरी है, पर अगर सिर्फ़ राजनीति की दुकान सभी को चलानी है। फिर कुछ नहीं सार्थक होने वाला। असम में असमिया बनाम बाहरी का सँघर्ष काफ़ी पुराना रहा है। 1950 के दशक में असम में बाहरियों का आगमन राजनैतिक मुद्दा बनने लगा था। शुरुआत में ऐसा नहीं था, कि असम में सिर्फ़ बांग्लादेश के घुसपैठियाएँ ही घुस आएं हो।

वहां पर देश के अन्य हिस्सों से चाय के बागानों में काम करने के लिए लोग भी पहुँचे। इसके बाद विभाजन के बाद जब पूर्वी पाकिस्तान का गठन हुआ, तो वहां से काफ़ी संख्या में बंगला भाषी आएं। वहीं से बाहरी बनाम स्थानीय की चिन्गारी को हवा मिलना शुरू हुआ। इसके बाद जब 1971 में जो आज का बांग्लादेश है, उस दौरान पूर्वी पाकिस्तान था, वहां पर पाकिस्तानी सेना ने बंगाली मुसलमान पर हिंसक कार्रवाई शुरू कर दी। जिस कारण 10 लाख लोगों ने असम में शरण ली। जब बांग्लादेश का गठन हुआ, तो ज्यादातर तो लौट गए, और अनुमानित लगभग एक लाख की संख्या असम में ही रह गई। इसके साथ शैने-शैने घुसपैठियाएँ भी प्रवेश करने लगे। तो ऐसे में असम के स्थानीय लोगों को सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा का भान होने लगा। जिसके फलस्वरूप वहां पर 1978 में शक्तिशाली आंदोलन की शुरुआत हुई, जिसका नेतृत्व वहां के युवाओ ने किया। इन सभी के मद्देनजर 1983 का विधानसभा चुनाव भी प्रभावित हुआ, राज्य की बड़ी आबादी ने चुनाव का बहिष्कार किया और 1984 के आम चुनाव में इन्हीं सब कारणों से 14 संसदीय सीट पर चुनाव नहीं हो सका। इन सब स्थितियों को देखते हुए अगस्त 1985 में केन्द्र की तत्कालीन राजीव गांधी सरकार और आंदोलनकारियों के बीच असम समझौता हुआ। जिस आधार पर यह निर्धारित हुआ, कि 1951 से 61 के बीच असम आने वाले को पूर्ण नागरिक का दर्जा दिया जाएगा। 1961 से 1971 के बीच आएं लोगों को अन्य अधिकार दिए गए, पर मत का अधिकार नहीं दिया गया। इसके अलावा 1971 के बाद आएं लोगों के लिए असम में कोई जगह नहीं, ऐसा समझौता हुआ। लेकिन तमाम विसंगतियों के कारण असम की अस्मिता से खिलवाड़ अभी और आज भी हो रहा, और राजनीति के हैसियतदार अपनी दुकान ही सिर्फ़ चला रहे, जो दुःखद स्थिति निर्मित कर रही।

5) पुनश्चः:-

ऐसे में अन्ततः यह कह सकते हैं, कि घुसपैठियों का मुद्दा अगर स्थानीयता को प्रभावित कर रहा। तो यह मानवता से जुड़ा विषय भी है, जिस पर सिर्फ़ सियासतदां सियासी खेल न खेलें। मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए। लोकतंत्र में राजनीति का आदर्श उद्देश्य अगर लोकहित या जनकल्याण होता है। फिर राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी बनती है, कि वे अवाम को लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में प्रशिक्षित और जागरूक करें। पर अमूमन आज के दौर में सभी राजनीतिक दल सिर्फ़ स्वहित में लगें हैं, फिर उसके लिए चाहें उनके सिद्धांत ही हास्यास्पद क्यों न लगने लगें। एक उदाहरण पेश करते हैं, 2005 के दरमियान पश्चिम बंगाल में आज के दौर में जो मुख्यमंत्री हैं। उन्होंने संसद में बांग्लादेशी घुसपैठियाएँ को लेकर जोर-शोर से बात रखी थी, लेकिन जब आज वे सत्ता में हैं। तो उनके हित बदल गए हैं, तो भाषा भी बदल गई है। आज उन्हें बांग्लादेशी घुसपैठियों में अपना मततंत्र दिख रहा। तभी तो उनके सुर से निकल रहा, कि एनआरसी के मुद्दे से गृह युद्ध छिड़ सकता है। आख़िर ऐसी दुरंगी बातें कब तक होती रहेगी, लोकतंत्र में। यह बंद होना चाहिए। तो यहां पर यहीं कि जो काजल की रेखा सभी दलों में आने वाले चुनाव को लेकर खींच रही। वह दूर होनी चाहिए। हिन्दू, मुस्लिम कोई भी घुसपैठिया हो, उसे एक मानक के आधार पर बाहर का रास्ता दिखाया जाएं। जिसके पहले अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का समुचित सहयोग भी जरूरी है, वरना बांग्लादेश के मना करने पर की घुसपैठियाएँ उनके देश के लोग नहीं। उस स्थिति में देश के भीतर भयावह स्थिति निर्मित हो जाएंगी। इसके अलावा अगर इन्हें बांग्लादेश न स्वीकार करें, तो शरणार्थी घोषित कर दिया जाए। इसके अलावा आगे से कोई देश की सीमा में प्रवेश न कर सकें, ऐसी राजनीतिक मंशा विकसित की जाएं। आज घुसपैठियाएँ की समस्या विकराल रूप ली है, तो उसमें उस दौर की राजनीति का हित और शिथिलता अहम कारण रही है। साथ में जो देश के नागरिक हैं, उन्हें अपनी नागरिकता साबित करने का पूरा हक़ मिलना चाहिए। साथ ही साथ यह पूरा कार्य केंद्र सरकार और असम सरकार के नेतृत्व में पारदर्शिता और निष्पक्षता के साथ होना चाहिए, न कि राजनीतिक लाभ के लिए हड़बड़ी में। साथ में कार्यवाही तो उन दलों या सियासतदानों पर भी होना चाहिए, जो घुसपैठियों का आईडी कार्ड आदि बनवाने का कार्य भी करते आएं हैं। ऐसे में एनआरसी एक विस्तृत प्रक्रिया रहने वाली है। तो पहले इस बात पर जोर हो, कि अब पड़ोसी देशों से लोग घुसपैठ न कर पाएं।

महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896