राजनीति

द्रोण और द्रुपद

हाल ही में हमने देखा। राहुल गांधी संसद में उठे। पी एम के पास गये। उठो उठो कहा। जब तक पी एम समझ पाते , गले लग गये। अलग हो गये। शान से चलने लगे। पी एम ने बुलाया। आये। उनसे हाथ मिलाया। पीठ थपथपाई। कुछ कहा और राहुल चले आये अपनी संसदीय सीट पर। वहां से अपने कुछ साथियों को उन्होंने आंख मारी। कैमरे में कैद हो गये। हल्ला हुआ। बहसें चलीं। कांग्रेस ने कहा कि हम सभी से प्रेम करते हैं। बीजेपी ने कहा – ये कोई तरीका नहीं है। ये असंसदीय है। यह था भी कुछ अजीब। कोई भी किसी के पास अचानक जाये और उसे उठो उठो कहे और जब तक पांच सात सैकेंड में वह समझे तब तक गले लग ले और चला आये और फिर आंख झपकाये। समझ नहंी आता। फिर पोस्टर वार हो जाये। नफरत को भगवा रंग में रंग दिया जाये। प्यार को हरे रंग में। और साथ में बीएसपी को लुभाने को नीला रंग। हरे रंग में तो सारा विपक्ष आ जाता है और नीेले के साथ बीएसपी भी।
इस सबके पीछे मैं सोच रहा था कि यह हुआ क्या ? क्या यह वही है जो हम देख रहे हैं। इतिहास में गया तो दो कथायें मिलीं। पहली कृष्ण सुदामा की और दूसरी द्रुपद और द्रोणाचार्य की। कृष्ण सामान्य जीवन जिये गुरूकुल में सुदामा के साथ। हालांकि ईश्वर भी हैं। लेकिन लौकिक दृष्टि से वे सामान्य परिवार के ही थे। यशोदा के लाडले। ग्वाले। दूसरा प्रकरण द्रुपद और द्रोणाचार्य का है जहां द्रोण एक सामान्य परिवार के हैं और द्रुपद राजपरिवार के। कृष्ण और सुदामा की मित्रता मित्रता थी जहां कभी कोई भेदभाव नहीं था। दूसरी तरफ द्रुपद राजपरिवार के थे और द्रोण साधारण। ये दोनो भी छात्र जीवन के मित्र रहे। कहानी से सभी परिचित हैं कि जब द्रोण बड़े होने पर एक बार द्रुपद से मिलने जाते हैं और अपनी मित्रता की बात उनसे करते है तो द्रुपद कहते हैं कि मित्रता बराबर वालों में होती है। यही कष्ट था जिसने द्रोण को मजबूर किया कि वे पांडवों के जरिये अपने अपमान का बदला लें और उन्होंने बदला लिया।
पी एम मोदी का जीवन साधारण रहा है और उनका अपना परिवार भी एक साधारण जीवन जी रहा है। वहीं राहुल गांधी एक राज परिवार सरीखे परिवार से आते हैं जिन्होंने कभी गरीबी नहीं देखी। क्या राहुल गांधी द्रुपद नहीं हैं जो पी एम की तरफ गये तो सही मगर उनकी बाॅडी लैंग्वेज वह नहीं थी जो एक व्यक्ति की उस स्थिति में होती है जब वह किसी दूसरे से गले मिलने के लिए जाते वक्त होती है। क्या आपने कोई ऐसी तस्वीर कभी देखी है जहां पर राहुल गांधी किसी बुजुर्ग के पैर छूते देखे गये हों किसी के? और ऐसी तस्वीरें आपने जरूर देखी होंगी जिनमें कई बुजुर्ग राहुल गांधी के पैर छू रहे होंगे। बुजुर्ग पुरूष और महिलायें। साथ ही आपने यह भी कई बार देखा होगा कि पी एम मोदी कई बार कई बुजुर्गों के पैर छूते रहे हैं। ऐसी तस्वीरें आम हैं। यह क्या है ? यह एक सामान्य मनुष्य और विशेष मनुष्य का मामला है। राहुल गांधी विशेष हैं इसलिए, क्योंकि वे राजपरिवार से हैं। राजपरिवार से का मतलब कि उनसे यहां इस तरह से व्यवहार होता है जैसे देश के राजपरिवार का वे हिस्सा हों भले ही देश में राजव्यवस्था न हो। तो क्या एक राजकुमार प्रजा के गले आसानी से लगेगा ? क्या ऐसा संभव है ? नहीं। राहुल गांधी की निगाह में पी एम मोदी एक चाय वाले से कम नहीं हैं और ज्यादा भी नहीं। यह हाल पूरी पार्टी का है इसीलिए वह पी एम से लड़ने तक की स्थिति में नहीं है क्योंकि प्रतिद्वन्द्वी को हराने से पहले उसे स्वीकारना पड़ता है। इसीलिए उन्होंने उनकी तरफ जाते वक्त अपने हाथ फैलाने का कोई संकेत नहीं दिया। यदि वे थोड़ा गले लगने के अंदाज में हाथ फैलाये हुए जाते या वहां पर ही हाथ फैलाते या कह देते कि गले लगने आया हूं तो कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता। मगर यह कहना उन्हें अपना अपमान लगा और उन्होंने कहा – उठो, उठो , यानि अरे चाय वाले उठो। उनकी निगाह में वे एक चाय वाले को उठा रहे थे जो जाने क्यों पी एम की सीट पर बैठ गया जबकि पी एम की कुर्सी तो राहुल गांधी की थी राजपरिवार की थी। मगर पी एम की चतुरता ने उनकी इस हरकत को और बौना कर दिया। और इसके बाद जो हुआ उसके बाद किसी को कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ी। अपने साथियों को आंख मारने का अंदाज ही ऐसा था जैसे वे किसी का बेवकूफ बनाकर आये हैं। क्या ऐसे व्यक्ति को हम पी एम बनता देखेंगे ? वह दिन लोकतंत्र के लिए काला दिन होगा क्योंकि इतना इलीट भाव जिनके मन में भरा हो वे भारत की गरीबी को कभी खत्म नहीं करेंगे न करना चाहेंगे। वे सामन्तवादी व्यवस्था का हिस्सा बने रहकर सब कुछ अपने हिसाब से चलाना चाहेंगे। यह सब इसलिए लिखना पड़ रहा है क्योंकि पी एम मोदी को गरियाने वाले मणिशंकर स्वयं दिल्ली के एक प्रतिष्ठित काॅलेज सेंट स्टीफेंस के छात्र रहे हैं। शशि थरूर भी इसी काॅलेज का हिस्सा हैं। यहां दोष काॅलेज का नहीं है। कहना यह है कि इनमें एक श्रेष्ठता का भाव इस तरह कूट कूटकर भरा है जो अन्य लोगों को हिकारत से देखता है और स्वीकारने से कतराता है। मणिशंकर अय्यर ने तो इसी श्रेष्ठ भाव के चलते अजय माकन को एक शब्द डिकाॅटाॅमस पर घेर लिया था। यह श्रेष्ठ भाव ही राहुल को समझाता है कि वे इलीट हैं। राहुल गांधी प्रथम वर्ष के ग्रेजुएशन के बाद सेंट स्टीफेंस काॅलेज को छोड़कर विदेश चले गये थे। यानि उनमें यह श्रेष्ठता का भाव ज्यादा होना स्वाभाविक है।
उल्लिखित प्रकरण पर तीन साल पहले के अनुपम खेर के भाषण की याद ताजा हो आती है जिसमें उन्होंने तमाम अमीरों को लपेट लिया था। इसलिए जो लोग कांग्रेस के उस पोस्टर से प्रभावित हैं जिसमें उसने खुद को प्यार करने वाली पार्टी कहकर प्रचार किया है उन्हें यह समझना जरूरी है कि नफरत को भगवा रंग से लिखकर हरे रंग से प्यार लिखकर बी एस पी के साथ चुनाव लड़ने की राजनीति से वे अपने अंदर के उस श्रेष्ठ भाव को नहीं छिपा सकते। यह भाव व्यक्ति का होता है। काॅलेज की अपनी प्रतिष्ठा होती है और उस पर गर्व होना भी लाजिमी है मगर उस पर और उस विदेशी विश्वविद्यालय पर इतना गर्व कि आप यह भी भूल जायें कि लोकतंत्र में मान मर्यादा की लकीरें भी होती हैं जिनको पार न किया जाये तो ही बेहतर है। द्रुपद बनकर राहुल का जनता के बीच जाना कितना लाभकारी होगा यह तो आने वाला समय ही बतायेगा मगर आम आदमी की भाषा समझने के लिए उसमें घुले मिले बिना जाना व्यक्ति को नेता बनने से रोकता है और इसी वजह से राहुल आज भी जननेता नहीं बन पाये हैं। काश उनकी मां उन्हें यह सिखा पातीं कि बड़ा कैसे हुआ जाता है मगर ऐसा हो नहीं पा रहा है। वो मजबूरी जानती होंगी। विवाह ही कर देतीं तो राहुल के बच्चे ही कदाचित उन्हें बड़ा कर देते। क्योंकि कहते हैं , मां बाप जिन बच्चों को बड़ा नहीं कर पाते उन्हें उनके अपने बच्चे बड़ा कर देते हैं क्योंकि बच्चे जब पापा के गले लगने आयेंगे तो हाथों को फैलाकर ही आयेंगे और गले लग जायेंगे। तब न राजनीति होगी और न कोई अर्थहीन कुटिलता। तब होगा सिर्फ एक भाव वह भी गले लगने व लगाने का। तब शायद राहुल को भी अच्छा लगेगा कि बच्चे हाथ फैलाकर गले लगने आ रहे हैं और खुशी से आ रहे हैं। काश राहुल यह समझ पाते या उनके चाटुकार उन्हें समझा पाते।

डाॅ द्विजेन्द्र शर्मा

डॉ. द्विजेन्द्र वल्लभ शर्मा
आचार्य - संस्कृत साहित्य , सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय , वाराणसी 1993 बी एड - लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ , नयी दिल्ली 1994, एम ए - संस्कृत दर्शन , सेंट स्टीफेंस कॉलेज , नयी दिल्ली - 1996 एम फिल् - संस्कृत साहित्य , दिल्ली विश्व विद्यालय , दिल्ली - 1999 पी एच डी - संस्कृत साहित्य , दिल्ली विश्व विद्यालय , दिल्ली - 2007 यू जी सी नेट - 1994 जॉब - टी जी टी संस्कृत स्थायी - राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय , केशवपुरम् , दिल्ली 21-07-1998 से 7 -1 - 2007 तक उसके बाद पारिवारिक कारणों से इस्तीफा वापस घर आकर - पुनः - एल टी संस्कृत , म्युनिसिपल इंटर कॉलेज , ज्वालापुर , हरिद्वार में 08-01-2007 से निरंतर कार्यरत पता- हरिपुर कलां , मोतीचूर , वाया - रायवाला , देहरादून