कैलाश मानसरोवर

मेरा अपना विचार है कि धर्म और आस्था किसी के लिए भी व्यक्तिगत मामला है. कोई धर्म कर्म में विश्वास रखता है, कोई नहीं रखता. कोई मन-ही-मन भगवान का सुमिरण करता है तो कोई ढोल, झाल और मंजीरे के साथ कीर्तन करता है. कोई पद्माशन में बैठकर ध्यान करता है तो कोई विशेष आसन में खड़े होकर तपस्या करता है. कोई मनुष्य मात्र तथा दीन-दुखियों की सेवा करना ही अपना धर्म मानता है. संस्कृत के श्लोक के अनुसार –

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्. परोपकार: पुण्याय पापाय परपीडनम्.. अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं. पहली – परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी – दूसरों को दुःख देना पाप का होता है.

परहित सरिस धरम नहीं भाई, परपीड़ा सम नहीं अघताई – तुलसीदास

आजकल राहुल गाँधी की मानसरोवर कैलाश यात्रा चूंकि चर्चा में है इसलिए मैंने इस सप्ताह का विषय कैलाश मानसरोवर को ही चुना. कैलाश मानसरोवर से सम्बंधित जो जानकारी मुझे अंतर्जाल पर उपलब्ध हुए हैं मैं उन्हें ही यहाँ साझा कर रहा हा हूँ.

मूल आलेख : अनिरुद्ध जोशी ‘शतायु’

”हिमालयात् समारभ्य यावत् इन्दु सरोवरम्. तं देवनिर्मितं देशं हिन्दुस्थान प्रचक्षते॥- अर्थात : हिमालय से प्रारंभ होकर इन्दु सरोवर (हिन्द महासागर) तक यह देव निर्मित देश हिन्दुस्थान कहलाता है.

कैलाश मानसरोवर : कैलाश पर्वत और मानसरोवर को धरती का केंद्र माना जाता है. यह हिमालय के केंद्र में है. मानसरोवर वह पवित्र जगह है, जिसे शिव का धाम माना जाता है. मानसरोवर के पास स्थित कैलाश पर्वत पर भगवान शिव साक्षात विराजमान हैं. यह हिन्दुओं के लिए प्रमुख तीर्थ स्थल है. संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिल कर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर. कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है. चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है अतः कैलाश चीन में आता है. मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है. प्राचीन काल से विभिन्न धर्मों के लिए इस स्थान का विशेष महत्व है. इस स्थान से जुड़े विभिन्न मत और लोककथाएं केवल एक ही सत्य को प्रदर्शित करती हैं, जो है ईश्वर ही सत्य है, सत्य ही शिव है. तिब्बतियों की मान्यता है कि वहां के एक संत कवि ने वर्षों गुफा में रहकर तपस्या की थीं. तिब्बति बोनपाओं के अनुसार कैलाश में जो नौमंजिला स्वस्तिक देखते हैं व डेमचौक और दोरजे फांगमो का निवास है. बौद्ध भगवान बुद्ध तथा मणिपद्मा का निवास मानते हैं.
कैलाश पर स्थित बुद्ध भगवान के अलौकिक रूप ‘डेमचौक’ बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए पूजनीय है. वह बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ की संज्ञा भी देते हैं. बौद्ध धर्मावलंबियों का मानना है कि इस स्थान पर आकर उन्हें निर्वाण की प्राप्ति होती है. जैनियों की मान्यता है कि आदिनाथ ऋषभदेव का यह निर्वाण स्थल ‘अष्टपद’ है. कहते हैं ऋषभदेव ने आठ पग में कैलाश की यात्रा की थी. हिन्दू धर्म के अनुयायियों की मान्यता है कि कैलाश पर्वत मेरू पर्वत है जो ब्राह्मंड की धूरी है और यह भगवान शंकर का प्रमुख निवास स्थान है. यहां देवी सती के शरीर का दांया हाथ गिरा था. इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है. यहां शक्तिपीठ भी है. कुछ लोगों का मानना यह भी है कि गुरु नानक ने भी यहां कुछ दिन रुककर ध्यान किया था. इसलिए सिखों के लिए भी यह पवित्र स्थान है.

कैलाश क्षेत्र : इस क्षेत्र को स्वंभू कहा गया है. वैज्ञानिक मानते हैं कि भारतीय उपमहाद्वीप के चारों और पहले समुद्र होता था. इसके रशिया से टकराने से हिमालय का निर्माण हुआ. यह घटना अनुमानत: 10 करोड़ वर्ष पूर्व घटी थी. इस अलौकिक जगह पर प्रकाश तरंगों और ध्वनि तरंगों का अद्भुत समागम होता है, जो ‘ॐ’ की प्रतिध्वनि करता है. इस पावन स्थल को भारतीय दर्शन के हृदय की उपमा दी जाती है, जिसमें भारतीय सभ्यता की झलक प्रतिबिंबित होती है. कैलाश पर्वत की तलछटी में कल्पवृक्ष लगा हुआ है. कैलाश पर्वत के दक्षिण भाग को नीलम, पूर्व भाग को क्रिस्टल, पश्चिम को रूबी और उत्तर को स्वर्ण रूप में माना जाता है.

एक अन्य पौराणिक मान्यताओं के अनुसार यह जगह कुबेर की नगरी है. यहीं से महाविष्णु के करकमलों से निकलकर गंगा कैलाश पर्वत की चोटी पर गिरती है, जहां प्रभु शिव उन्हें अपनी जटाओं में भर धरती में निर्मल धारा के रूप में प्रवाहित करते हैं. कैलाश पर्वत पर कैलाशपति सदाशिव विराजे हैं जिसके ऊपर स्वर्ग और नीचे मृत्यलोक है, इसकी बाहरी परिधि 52 किमी है. मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है जो पुराणों में ‘क्षीर सागर’ के नाम से वर्णित है. क्षीर सागर कैलाश से 40 किमी की दूरी पर है व इसी में शेष शैय्‌या पर विष्णु व लक्ष्मी विराजित हो पूरे संसार को संचालित कर रहे हैं.

भारत और चीन की नदियों का उद्गभ स्‍थल : कैलाश पर्वत की चार दिशाओं से चार नदियों का उद्गम हुआ है ब्रह्मपुत्र, सिंधू, सतलज व करनाली. इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली है. कैलाश के चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख है जिसमें से नदियों का उद्गम होता है, पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है. हालांकि कैलाश मानसरोवर से जुड़ें हजारों रहस्य पुराणों में भरे पड़े हैं. शिव पुराण, स्कंद पुराण, मत्स्य पुराण आदि में कैलाश खंड नाम से अलग ही अध्याय है जहां कि महिमा का गुणगान किया गया है.

स्वर्ग जैसे इस स्थान पर सिर्फ ध्यानी और योगी लोग ही रह सकते हैं या वह जिसे इस तरह के वातावरण में रहने की आदत है. यहां चारों तरफ कल्पना से भी ऊंचे बर्फीले पहाड़ हैं. जैसे कुछ पहाड़ों की ऊंचाई 3500 मीटर से भी अधिक है. कैलाश पर्वत की ऊंचाई तो 22028 फुट हैं. आपको 75 किलोमीटर पैदल मार्ग चलने और पहाड़ियों पर चढ़ने के लिए तैयार रहना रहना होगा. इसके लिए जरूरी है कि आपका शरीर मजबूत और हर तरह के वातावरण और थकान को सहन करने वाला हो. हालांकि मोदी सरकार ने चीन से बात करके अब नाथुरा दर्रा से यात्रा करने की अनुमति ले ली है, तो अब कार द्वारा भी वहां पहुंचा जा सकेगा. फिर भी 10-15 किलोमीटर तक तो पैदल चलने के लिए तैयार रहें. कार से जाएं या पैदल यह दुनिया का सबसे दुर्गम और खतरनाक स्‍थान है. यहां सही सलामत पहुंचना और वापस आना तो शिव की मर्जी पर ही निर्भर रहता है. फल

आवश्यक सलाह : यहां पर ऑक्सीजन की मात्रा काफी कम हो जाती है, जिससे सिरदर्द, सांस लेने में तकलीफ आदि परेशानियां प्रारंभ हो सकती हैं. इन परेशानियों की वजह शरीर को नए वातावरण का प्रभावित करना है. यहा का तापमान शू्न्य से नीचे -2 सेंटीग्रेड तक हो जाता है. इसलिए यहाँ ऑक्सीजन सिलेंडर भी साथ होना जरूरी है. साथ ही एक सीटी व कपूर की थैली आगे पीछे होने पर सांस भरने पर उपयोग की जाती है.
उत्तराखंड से शुरु होने वाली यात्रा : भगवान शिव के इस पवित्र धाम की यह रोमांचकारी यात्रा भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों द्वारा आयोजित की जाती है. इधर इस सीमा का संचालन भारतीय सीमा तक कुमाऊं मण्डल विकास निगम द्वारा की जाती है, जबकि तिब्बती क्षेत्र में चीन की पर्यटक एजेंसी इस यात्रा की व्यवस्था करती हैं. अंतरराष्‍ट्रीय नेपाल-तिब्बत-चीन से लगे उत्तराखंड के सीमावर्ती पिथौरागढ़ के धारचूला से कैलाश मानसरोवर की तरफ जाने वाले दुर्गम व 75 किलोमीटर पैदल मार्ग के अत्यधिक खतरनाक होने के कारण यह यात्रा बहुत कठिन होती है. लगभग एक माह चलने वाली पवित्रम यात्रा में काफी दुरुह मार्ग भी आते हैं अक्टूबर से अप्रैल तक इस क्षेत्र के सरोवर व पर्वतमालाएं दोनों ही हिमाच्छादित रहते हैं. सरोवरों का पानी जमकर ठोस रूप धारण किए रहता है. जून से इस क्षेत्र के तामपान में थोड़ी वृद्धि शुरू होती है. इसलिए यही समय यात्रा के लिए उपयुक्त मन जाता है. राहुल गाँधी इस यात्रा पर गए और सफलतापूर्वक यात्रा पूरी की यह उनके स्वस्थ शरीर और शिवभक्ति को भी प्रमाणित करता है. अब विरोधी इसे जैसे चाहें जिस रूप में प्रचार करें या दुष्प्रचार करें यह उनका अपना राजनीतिक दृष्टिकोण हो सकता है. राहुल गाँधी का अपना दृष्टिकोण होगा. मेरे जैसा व्यक्ति महान व्यक्तियों पर कोई प्रतिक्रिया दे यह शोभा नहीं देता. मैं तो यही कहूँगा कि अगर शरीर साथ देता है तो एक बार इस यात्रा पर जाना चाहिए और वहां के प्राकृतिक वातावरण में स्वयम को महसूस करना चाहिए. ABP न्यूज़ के विजय विद्रोही इस यात्रा पर जा चुके हैं. वहां पहुंचकर उन्हें ऐसा महसूस हुआ कि उनके अन्दर बिलकुल खाली है… अब उस खालीपन को या तो परमात्मा के बोध से भर दें या फिर वापस लौटकर अपने अन्दर के खालीपन को स्वयम के अहम् से भर दें. सत्यम शिवम् सुन्दरम!  ॐ शांति !

जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर