निर्भया

“निर्भया”

फिर आऊंगी बेटी बनकर
मां तेरे आंगन में
पूरे करना सपने वो सारे
अधूरे हैं जो तेरे मन में ।

तेरे घर की शोभा बनूंगी
फैलेगी रोशनी चारों ओर
नई सुबह होगी, हर सुबह
खुशी का होगा न कोई छोर ।

देकर प्यार की थपकी
बाहों के झूले में झुलाना
नींद न आए जब मुझे
लोरी गाकर सुलाना ।

उंगली पकड़ कर तेरी
चलूँगी जब पहला कदम
देख ये दृश्य मनभावन
मिलेगा तूझे आनंद असीम ।

धीरे-धीरे पढ़ाना मुझे
साहस के वो पाठ सारे
आन पड़े विपदा कभी तो
पीछे न हटूं डर के मारे ।

देख कर्म मेरे साहस भरे
नाम दे जग मेरा “निर्भया”
डर को जीत लूं मैं
सबला हूँ मैं, हूँ अभया ।

डटूं वहीं पर्वत बनकर
दहाड़ूं बनकर सिंहनी
साबित कर दूं जग को मैं
नारी हूँ मैं शक्ति रूपिणी ।

देख मुझे करे अनुसरण
विश्व की सम्पूर्ण नारी जाति
न फिर हो कोई “निर्भया कांड”
न दे कोई प्राणों की आहुति ।

झुकें न मानवता का शीष
बहाए न नैन अश्रुधार
नारी जाति सृष्टि की रचयिता
समझे जग इस बात का सार ।

ज्योत्स्ना के कलम से

मौलिक रचना

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com