समाचार

दो दिवसीय साहित्यकार सम्मेलन सम्पन्न

वर्तमान लेखन और वैदिक वाड़.मय विषय पर 1 व 2 सितम्बर 2018 को आर्य समाज व गुरुकुल आर्य नगर, पहाड़गंज, नईदिल्ली स्थित परिसर में हिंदी के साहित्यकारों का भव्य साहित्य सम्मेलन सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में 8 प्रदेशों के साहित्यकारों ने भाग लिया।
सम्मेलन का प्रारम्भ आर्य जगत् के प्रसिद्ध वैदिक विद्वान आर्य लेखक परिषद् के यशस्वी प्रधान आचार्य वेदप्रिय शास्त्री के उद्बोधन हुआ। इस प्रथम सत्र की अध्यक्षता आर्य लेखक व विद्वान पं शिव नारायण उपाध्याय ने की। ढाई घंटे के इस सत्र में वर्तमान लेखन और वैदिक वाड़.मय विषय पर खुल कर चर्चा की गई। वर्तमान लेखन में वेद और वैदिक वाड़.मय की महत्ता और उपयोगिता कितनी है और इसकी प्रासंगिकता कितनी है, इस पर वक्ताओं ने तर्कसंगत ढंग से अपने विचार रखे। इस सत्र का विषय प्रवर्तन प्रसिद्ध वैदिक विद्वान व पूर्व सहायक निदेशक डा. वेद प्रकाश विद्यार्थी जी ने अत्यंत कुशलता पूर्वक किया।
सम्मेलन का दूसरा सत्र चिंतन सत्र था, जिसका विषय – देवनागरी लिपि का राष्ट्रीय एकता में योगदान। इस सत्र की अध्यक्षता राष्ट्रपति के पूर्व सलाहकार और नागरी लिपि परिषद् के अध्यक्ष डा. परमानंद पांचाल ने की। इस सत्र का विषय प्रवर्तन भी डा. वेद प्रकाश विद्यार्थी जी ने किया। वक्ता के रूप में डा. हरीसिंह पाल और आचार्य ओम प्रकाश आर्यजी थे। ज्ञातव्य है आचार्य ओम प्रकाश जी आर्य समाज मयूर विहार के प्रधान हैं। इस सत्र में वक्तओं ने देवनागरी की महत्ता को विस्तार से दर्शाया और सभी लोगों को देवनागरी आपनाने पर विशेष जोर दिया। यह सत्र देढ़ बजे से 4 बजे सायं तक चला।
आज का तीसरा सत्र भी चिंतन सत्र था जिसका विषय था-सामाजिक सरोकार में साहित्यकार एवं पत्रकार का योगदान। इस सत्र में श्री चंद्रशेखर शास्त्री और बाबा बिजयेंद्र ने अयंत तर्कसंगत ढंग से अपने विचार रखे। विचारक बिजयेंद्र ने साहित्यकारों और पत्रकारों के सामाजिक दायित्वों को विस्तार से रेखांकित किया। इस सत्र की अध्यक्षता आचार्य वेदप्रिय शास्त्री ने की।
2 सितम्बर का कार्यक्रम प्रातः 9 बजे से प्रारम्भ हुआ। इस चिंतन सत्र का विषय था-लोक साहित्य का सामाजिक महत्व। मुख्य वक्ता थे साहित्यकार और समाजसेवी अखिलेश आर्येन्दु। वक्ता आर्येन्दु ने लोक साहित्य और वेद साहित्य के बारे में विस्तार से चर्चा की। उन्होंने अपने उद्बोधन में कहा- लेखक के लिए लोक और वेद दोनों की ठीक जानकारी होना जरूरी है। वैदिक वाड़.मय विषय सम्मेलन का इसी लिए रखा गया जिससे लेखक को वेद जैसे सबसे महत्वपूर्ण विषय की जानकारी हो सके। कार्यक्रम की अध्यक्षता आचार्य वेदप्रिय शास्त्री जी ने की। उन्होंने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में लोक और वेद विषय पर विस्तार से अपने विचार रखे।
11 बजे प्रातः से छंद और गजल पर कार्यशाला का आयोजन किया गया था। कार्यशाला में वक्ता के रूप में योगेश समदर्शी मनोज भारत और श्री नित्यानंद तुषार थे। छंद और गजल की बारीकियों की चर्चा पर आधारित यह कार्यशाला कलमकारों के लिए कई तरह से उपयोगी रही।
दोपहर 2 बजे से चिंतन सत्र –लेखक का सामाजिक दायित्व का प्रारम्भ हुआ। इस सत्र में मुख्य वक्ता के रूप में वैदिक विद्वान पं. विद्या प्रसाद मिश्र और श्री रवीन्द्र त्रिपाठी थे। वक्तओं ने वर्तमान लेखकों को अपने सामाजिक दायित्व को गम्भीरता से निभाने का आह्वान किया जिससे समाज को ठीक दिशा मिल सके। कार्यक्रम की अध्यक्षता पं. शिवनारायण उपाध्याय जी ने की।
इसी क्रम में 3-30 बजे से साहित्यकार का समकालीन विवेक विषय पर चिंतन सत्र प्रारम्भ हुआ। इस सत्र में हिंदी के महान समालोचक और कवि डा. परिचय दास का विशेष उद्बोधन रहा। डा. दास ने कहा- आज का साहित्यकार जो कुछ लिख रहा है वह समय को नई दिशा देने के लिए नहीं लिख रहा बल्कि समाज की जरूरत के मुताबिक लिख रहा है। इस लिए साहित्य समाज को सुधारने की जगह समाज के मुताबिक स्वयं को ढाल रहा है।

और सम्मेलन का समापन पुस्तक विमोचन, सम्मान और प्रतीक चिंह वितरण के साथ हुआ। जिसमें आ. अखिलेश आर्येन्दु की पुस्तक प्रगति के मंत्र, मालती मिश्रा का कहानी संग्रहः इंतजार और विजय सेलन की पुस्तक यादों की पुकार। कार्यक्रम के संयोजक अखिलेश आर्येन्दु मालती मिश्रा और योगेश समदर्शी थे। सम्मेलन के अंत में शांति पाठ हुआ। आए हुए सभी साहित्यकारों, महान वक्तओं और सहयोगियों को कार्यक्रम के संयोजकों ने धन्यवाद दिया।
आर्य लेखक परिषद् का यह एक बड़ा आयोजन था, जिसमें बड़ी संख्या में साहित्यकारों और विद्वानों ने भाग लेकर सफल बनाया।

प्रस्तुति- अखिलेश आर्येन्दु