कविता

वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं

वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं,
सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं;
संस्थिति प्रलय लय उनके भाव से बहती हैं,
आनन्द की अजस्र धारा के वे प्रणेता हैं !
अहंकार उनके जागतिक खेत की फ़सल है,
उसका बीज बो खाद दे बढ़ाना उनका काम है;
उसी को देखते परखते व समय पर काटते हैं,
वही उनके भोजन भजन व व्यापार की बस्तु है !
विश्व में सभी उनके अपने ही संजोये सपने हैं,
उन्हीं के वात्सल्य रस प्रवाह से विहँसे सिहरे हैं;
उन्हीं का अनन्त आशीष पा सृष्टि में बिखरे हैं,
अस्तित्व हीन होते हुए भी मोह माया में अटके हैं !
जितने अधिक अपरिपक्व हैं उतने ही अकड़े हैं,
सिकुड़े अध-खुले अन-खिले संकुचित चेतन हैं;
स्वयं को कर्त्ता निदेशक नियंत्रक समझते हैं,
आत्म-सारथी गोपाल का खेल कहाँ समझे हैं !
वे चाहते हैं कि हर कोई उन्हें समझे उनका कार्य करे,
पर स्वयं को समझने में ही जीव की उम्र बीत जाती है;
‘मधु’ के बताने पर भी बात कहाँ समझ आती है,
प्रभु जगत से लड़ते २ भी कभी उनसे प्रीति हो जाती है !

गोपाल बघेल ‘मधु’