मुझे सब छोड़ देंगे

[‘बेटी की चाहत’के बाद की कहानी]

तान्या बहुत कुशलता से स्टीयरिंग व्हील के निचले भाग में उँगलियाँ रख, गाड़ी चला रही थी। जबकि स्टीयरिंग के ऊपरी हिस्से पर रखी बाएं हाथ की उँगलियाँ गाड़ी में बज रहे गीत पर थिरक रही थीं। मैंने उसके नाखूनों पर लगे चमकदार नेलपेंट को देखा और फिर अपने नेलपेंट को देखा जो तेजी से छूट रही थी। फिर मैंने रियरव्यू मिरर में वैशाली को देखा। उसकी ठोड़ी और नन्ही-नन्ही उँगलियाँ कार की खुली खिड़की से चिपकी हुई थीं जबकि उसकी उदास आँखें बाहर खेतों को देख रही थीं। मुझे पता है कि वह तान्या के फैसले से खुश नहीं हैं लेकिन मैंने उसे कभी ऐसा नहीं देखा कि वह अपनी माँ को खुलके बता सके कि उसकी पसंद और नापसंद क्या है। बाहर देखते हुए उसके चेहरे पर कुछ-कुछ ऐसे ही भाव उकेरे हुए थे जैसे उस दिन थे जिस दिन मैं उससे पहली बार मिली थी।

वह दिन था वैशाली के स्कूल का पहला दिन। मैं अपनी क्लास के छोटे-छोटे बच्चों को गुणा-भाग के गुर सिखा रही थी कि तभी मैंने इस नन्ही परी को आया के साथ अपनी क्लास के दरवाजे पर देखा। “मैडम जी! आपकी नई स्टूडेंट – वैशाली। प्रिंसिपल सर ने मुझे आपकी क्लास में छोड़कर आने के लिए कहा।”
मैंने झुककर पांच इंच की मुस्कुराहट फेंकते हुए कहा “हैलो वैशाली”। उसने आधी मिलीमीटर की मुस्कुराहट दी मगर मुंह नहीं खोला। मैंने उसे तीसरी पंक्ति में एक बेंच पर बैठा दिया और अपनी क्लास जारी रखते हुए यह दिखाने लगी कि कैसे कई बार जोड़ लगाने से गुणा निकल कर आता है। इस दौरान वैशाली के गुलाबी गालों पर आँसू ढरकते रहे। मैं उसे अपनी बाहों में उठाकर क्लास से बाहर चली आई।
“क्या हुआ? आपको डर लग रहा है क्या?”
उसने रोना शुरू कर दिया।
“रोते नहीं बेटा। मैं आपको चॉकलेट दूँगी। आप चॉकलेट लोगे?”
उसने अपना सिर ना में हिला दिया।
“ठीक है। लेकिन वैशाली एक अच्छी लड़की है और अच्छे बच्चे रोते नहीं।”
पहली बार उसने अपना मुंह खोला और मुझे उसकी प्यारी आवाज सुनने का मौका मिला।
“नहीं मैं एक बुरी लड़की हूं और वे भी मुझे छोड़ देंगी।”
मैंने उसके आँसू पोंछे।
“कौन तुम्हें छोड़ देगा?”
“मम्मा।”
“और किस-किसने आपको छोड़ दिया है?”
“पापा”
वह फूट-फूटकर रोने लगी और उसने मुझे कसकर गले लगा लिया। मैंने खुद से कहा ‘ओह! बेचारी बिन बाप की बच्ची। भगवान, इसे ताकत दे।’ और फिर उसी आया को बुलाया।
“इसके साथ कोई आया है?”
“हाँ मैडम,उसकी मां अभी भी प्रिंसिपल के चैंबर में है।”
बेल बजी और मैंने क्लास में जाकर अपनी बुक्स उठा लीं। वैशाली अभी भी मेरे दाहिने हाथ में थी और मैं प्रिंसिपल के चैंबर की ओर बढ़ गई। मैं प्रिंसिपल के चेंबर में किसी सफेद साड़ी में लिपटी महिला की उम्मीद कर रही थी। ऐसा न भी होता तो कम से कम लंबे समय से दुख में डूबे हुए चेहरे की उम्मीद कर रही थी।
मगर वैशाली ने तो चटक रंगीन पलाज़ो और कुर्ती में गाढ़े श्रृंगार वाली महिला की ओर इशारा किया जो प्रिंसिपल के चैंबर से बाहर आ रही थी। जब मैं करीब पहुँची तो मैंने पाया कि उसके गले में नगजड़ित मंगलसूत्र लटक रहा था और उसकी लटों के भीतर से सिंदूर झाँक रहा था।
“हैलो मैम (उसने हाथ बढ़ाया) मैं तान्या, वैशाली की माँ हूं।”
मैंने हाथ मिलाया।
“हैलो! मुझे लगता है ये थोड़ा परेशान है।”
“क्या हुआ वैष्णू? तुम एक अच्छी लड़की होना बेटा। आपने अपने पिछले स्कूल में पहले ही कई क्लासेस मिस कर दी हैं। है कि नहीं?”
अपनी गीली आँखें झपकाते हुए वैशाली ने हाँ में सिर हिलाया।
तान्या ने फिर कहा “अच्छी लड़कियाँ अपने मम्मा को परेशान नहीं करती। अब आप एक अच्छी लड़की बनोगे और अपनी क्लास में जाओगे?”
उसने उत्तर में सिर हिलाया। मैंने उसे नीचे उतार दिया।
माथे पर प्रश्नों की रेखाएँ लाते हुए मैंने पूछा “भला….साल के बीचोंबीच एडमिशन?”
“हम्म … हां ….कुछ समस्याएं आईं और मुझे शहर बदलना पड़ा….”
“ओह … मैं समझती हूँ मैडम। लेकिन …. मेरा मानना है इस नन्ही उम्र में वैशाली का इस नए वातावरण में सँभल पाना थोड़ा मुश्किल होगा।”
“ओह नहीं … बिल्कुल नहीं। वह एक अच्छी लड़की है।”
तान्या ने मुस्कुराते हुए वैशाली की ओर देखा। मगर वैशाली का चेहरा सादा-सपाट था। आँखों में हल्का डर भी था।
“मुझे खेद है। उसने आपकी क्लास को परेशान किया। आप शायद क्लास ले रही थीं?”
“अरे कोई बात नहीं। अभी मुझे एक और क्लास लेने जाना है। हम जल्द मिलेंगे।”
” हां, हां, क्यों नहीं।“
**********
मैं बरामदे से गुज़र रही थी जब मैंने वैशाली और स्प्रूहा को टिफिन खाते देखा। वैशाली को स्कूल ज्वाइन किए एक हफ्ता हो गया है और मुझे खुशी है कि उसने एक दोस्त भी बना ली है। जाने क्यूँ मैं अपने आपको उनकी बातें सुनने से रोक न पाई।
“वैशाली … मालूम है … तुम्हारी तरह मेरे मम्मा-पापा भी बहुत लड़ते थे। वे एक दूसरे को बुरी-बुरी बातें बोलते थे … बहुत बुरी बातें … और पता है क्या … जब वे एक-दूसरे से बात नहीं कर रहे थे तो अपनी बात मुझसे कहलवाते थे। मुझे बहुत बुरा लगता था। मुझे लगता था कि वे मुझे फिर से कभी प्यार नहीं करेंगे।”
अपनी बात कहकर स्प्रूहा तो अपनी चपाती रॉल खाने में मगन हो गई मगर वैशाली जो अब तक अपने पीले टिफिन के एक खाने मे रखे फ्राइड आलू-मटर में अपनी उंगली घुमाए जा रही थी अब अचानक स्तब्ध दिखने लगी। मैंने उसे अब तक किसी भी चीज़ में दिलचस्पी लेते नहीं देखा। वो स्प्रूहा के करीब खिसक आई।
“कैसे … तुमने फिर सबकुछ ठीक कैसे किया? मुझे बताओ ना?”
“नहीं … मैंने कुछ भी नहीं किया। हम सब एक कौन-सोलर के पास गए थे। वो बहुत अच्छी थी। उसने मेरे साथ बहुत अच्छी-अच्छी बातें की। उसने मम्मा-पापा से भी बात की, और हम सब साथ रहने लगे। उसके बाद सब कुछ बदल गया। वे मेरे साथ अच्छे हो गए और एक-दूसरे के साथ अच्छे हो गए हैं और मुझसे भी प्यार करने लगे।”
शायद वह मैरिज काउंसलर कहना चाहती थी। स्प्रुहा तलाकशुदा माता-पिता की बच्ची है। लगभग सभी लोग जानते हैं और इसलिए हर कोई उससे सहानुभूति रखता है।
“क्या तुम्हारे पापा तुम्हारे पास वापस आ गए?”
“नहीं … वह एक और आंटी के साथ रहते हैं। लेकिन कम से कम वह मम्मा को भला-बुरा नहीं कहते और वे लड़ाई नहीं करते … और वे दोनों मुझे प्यार करते हैं … हम एक साथ बाहर जाते हैं।”
“हम्म …. पापा के ऑफिस से आने के बाद मैं उनके जूते ले जाकर रैक पर रखती थी। हम्म….पता नहीं अब कौन रखता होगा?”
वह मटर-आलू के खेल में वापस लग गई जैसे जाने और कई प्रश्नों के उत्तर उसी में खोज रही हो। उनका ध्यान मुझपर नहीं गया क्योंकि उनका चेहरा खेल के मैदान की तरफ था और मैं उनके पीठ के पीछे दालान से गुज़र रही थी।
*****
मैंने रियर व्यू मिरर से नज़रें हटा लीं। मैं दो महीने से वैशाली की क्लास टीचर हूँ। मुझे याद नहीं है कि कब और कैसे वैशाली मेरे करीब आ गई।
गाड़ी मेरे फार्महाउस के गेट पर आकर रूक गई। मैं अपने फार्महाउस से ही रोज़ स्कूल आया-जाया करती हूँ। मुझे अपना यह घर बहुत पसंद है। यह शहर की हलचल से दूर है और मुझे हर सुबह-शाम खेतों से होते हुए चालीस-पचास मिनट का खुशनुमा ड्राइव करने का मौका मिलता है।
डाइनिंग रूम में कॉफी पीते हुए तान्या ने मुझसे मदद लेने के लिए खेद जताया।
“आपको परेशान करने के लिए माफी चाहती हूँ। लेकिन जैसा कि आप देख सकती हैं, आप को छोड़कर इस दुनिया में कोई नहीं है जिसके भरोसे मैं वैशू को एक हफ्ते के लिए छोड़ सकूँ।”
“अरे कोई बात नहीं तान्या। हर समय हर चीज के लिए माफी माँगने की ज़रूरत नहीं है। वैशाली की कोई भी मदद कर पाने में मुझे बहुत खुशी होगी।”
“ओह! मैं वास्तव में आपकी आभारी हूँ। अगर यह असाइनमेंट मेरे लिए महत्वपूर्ण नहीं होता, तो मैं आपको कभी परेशान नहीं करती। जैसा कि आप जानती हैं कि मैंने लंबे समय के बाद काम करना शुरू किया है। मुझे इस समय काम की सख्त ज़रूरत है, मेरे लिए न सही, कम से कम वैशू के परवरिश के लिए। मेरे रेडियो मैनेजर ने मुझे यह प्रोजेक्ट सौंपा है और मैं उन्हें निराश नहीं करना चाहती।”
“मैं समझ सकती हूँ तान्या। मैं बस ये सोच रही थी कि आपके माता-पिता आपकी मदद करने के लिए क्यों नहीं आ सकते हैं।”
“क्या कहूँ…वे इस तलाक के खिलाफ हैं वे सोचते हैं कि आकाश एकदम भोला-भाला है और मुझे ही एक आज्ञाकारी पत्नी की तरह होना चाहिए और मुझसे शादी करने के लिए आकाश का आभारी होना चाहिए। और वैसे भी यह एक प्रेम विवाह था, बहुत कुछ उनकी इच्छा के खिलाफ। उन्होंने इसे किसी तरह स्वीकार कर भी लिया, लेकिन वे कभी भी तलाक की इस बदनामी को स्वीकार नहीं करेंगे। आप यह सब बातें भूल जाइए, मैं भी कोशिश कर रही हूँ। यह सिर्फ कुछ हफ्तों का मामला है, फिर यह सब खत्म हो जाएगा।”
“वैशाली के बारे में क्या? वह इसका सामना कैसे करेगी?”
जहां उसकी माँ बैठी थी, वैशाली उस सोफे के कोने से चिपकी हुई चारों ओर की जगह देख रही थी । हमारी बातचीत में अपना नाम सुनकर वह चौंक गई। तान्या ने उसकी ठोड़ी हिलाते हुए कहा “यह एक बहादुर लड़की है। अपनी माँ की तरह। है ना बेटू?”
नन्ही सी काया उत्तर में सिर हिलाकर चुप हो गई।
**********
खिड़की के शीशों से ठंडी हवा टकरा-टकराकर अंदर आने की अनुमति माँग रही थी जबकि चारू चंद्र की चंचल किरणें बिना अनुमति के ही अंदर घुसकर कमरे को रोशन कर रही थीं। ऐसे दृश्य मुझे बचपन की याद दिलाते हैं जब हवा की ये टकराहट मुझे इतना डरा देती थी कि मैं अपनी माँ से कसकर चिपक जाती थी और तबतक चिपकी रहती थी जबतक सो नहीं जाती।
यह वही बिस्तर, वही कमरा है मगर आज मेरी जगह वैशाली ने ली है, जो मेरा कंधा इतना कसकर पकड़कर सोई है कि मैं बाथरूम जाने के लिए भी अपने आप को उससे छुड़ा नहीं पा रही। वह अचानक एक जोरदार कंपकंपाहट के साथ उठी और जोर-ज़ोर से रोने लगी। मैंने उसके दोनों हाथ अपने दोनों हाथों में लेकर पूछा – “क्या हुआ बच्चे? तुम रो क्यों रही हो?”
“उन्होंने भी मुझे छोड़ दिया और अब तुम भी मुझे बाहर फेंक दोगी?”
“नहीं ..नहीं … मैं ऐसा कभी नहीं करूँगी।”
“नहीं … आप करोगी।”
“मैं ऐसा क्यों करूँगी? आप जैसी अच्छी बच्ची के साथ?”
“मैंने आपके बिस्तर पर सू-सू कर दिया। मैं एक बुरी लड़की हूँ। मुझसे सू-सू रोकी नहीं गई। जैसे पापा ने मुझे छोड़ दिया, जैसे दादी ने मुझे छोड़ दिया, मम्मा ने मुझे छोड़ दिया, आप भी मुझे छोड़ दोगी।”
मैंने उसे अपनी बाहों में ले लिया। वह रोती रही और मेरी नाइटी गीली करती रही।
“नहीं … नहीं … कोई भी तुम्हें नहीं छोड़ेगा। मम्मा कुछ काम के लिए गई हैं। वे आपके पास वापस आ जाएंगी। कोई भी तुम्हें कभी भी नहीं छोड़ेगा। देखो, मैं तुम्हारे साथ हूं।”
उसके सुबुकने की आवाज़ कम हो रही थी।
“लेकिन मैं एक बहुत …. बहुत बुरी लड़की हूँ। आप एक दिन मुझे छोड़ दोगी।”
“किसने कहा कि तुम एक बुरी लड़की हो? आप दुनिया की सबसे अच्छी लड़की हो।”
“दादी ने।”
“क्या?”
“हाँ। दादी ने कहा कि मैं बहुत …. बहुत बुरी लड़की हूँ और मेरी वजह से मम्मा और पापा लड़ते हैं। वे मेरे आने से पहले खुश थे,सब कुछ खुश-खुश था।”
“नहीं मेरे बच्चे! यह सच नहीं है। बच्चों की वजह से मम्मा-पापा प्यार करते हैं,लड़ते नहीं हैं।”
“लेकिन पापा ने मम्मा को और मुझे छोड़ दिया … मेरे कारण।”
“नहीं उनकी अपनी दूसरी वजह से छोड़ा है,आप इसकी वजह नहीं हो सकते।”
“मैं हूँ। दादी ने कहा कि मैं हूँ। मैं घर के लिए एक बुरा साया हूँ, क्योंकि मैं एक लड़की हूँ।”
‘बुलशिट’ मैंने खुद से कहा और उसे अपने से चिपका लिया। वह टूटे शब्दों में जैसे कहीं मेरे भीतर से कह रही थी।
“वे …. ये भी ….ये भी ….कह रही थीं कि … मेरा ….मेरा …. मेरा भाई ….मेरी वजह से मर गया।”
वह फिर ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी और मैं उसके बाल सहलाने के अलावा कुछ न कर सकी। जबकि वह रोती रही।
“… मैं हर किसी के लिए अशुभ हूँ, जो भी मेरे पास है, सबके लिए अशुभ हूँ …”
उफ ये क्या गंदे विचार उसके मन में घर कर चुके हैं? ओह, क्या किया जाए? वह सिर्फ एक बच्ची है। मैं उसे कैसे समझा सकती हूं? उसने उन चीजों को समझ लिया है जो उसकी उम्र के लिए नहीं हैं। अब मैं उसे वो चीज़ें कैसे समझाऊँ जो वो समझ ही नहीं सकती?
वह रोती रही और मैं उसे तबतक सहलाती रही जबतक उसका रोना कम नहीं हो गया। एक बार जब वह चुप और शांत हो गई, तो मैंने उसे अपने से अलग किया और उसकी ठोड़ी उठाकर उन चीजों को समझाने की कोशिश की जो केवल बड़े लोग ही समझ सकते हैं। क्योंकि फिर, मेरे पास कोई चारा ही नहीं था, उसे अपनी उम्र से आगे ले जाने के अलावा।
“वैशाली सुनो! दूसरों की वजह से कोई नहीं मरता है और किसी के लड़की होने की वजह से तो बिल्कुल नहीं मरता। समझी न तुम।”
वह सुन रही थी जबकि उसकी आँखें मुझ पर लगी रहीं।
“बच्चों … और तुम्हारे जैसे सुंदर बच्चों की वजह से मम्मा-पापा पास आते हैं और अलग नहीं होते। अगर मम्मा-पापा अलग हो रहे हैं, तो इसका मतलब यह है कि वे किसी दूसरे को किसी दूसरी वजह से पसंद नहीं कर रहे हैं। जैसे ..हम्म … ”
मुझे कुछ उदाहरण नहीं सूझ रहा था।
“… जैसे ….हाँ जैसे आप कुछ समय के लिए अपनी नई बार्बी को प्यार करते हैं और फिर कुछ समय बाद आप इसे उतना पसंद नहीं करते जितना आप इसे तब पसंद करते थे जब वो नई थी। क्या समझ रही हो?”
वैशाली ने नीचे देखा, शायद समझने के प्रयास में और फिर मेरी आँखों में आँखें डालकर हामी भरी। मुझे खुशी हुई कि मैं उसे कुछ-कुछ समझा पा रही थी।
“… तो अब आप बताओ कि क्या आप अपनी गुड़िया या टेडी को किसी और कि वजह से पसंद और किसी और की वजह से पसंद करना बंद कर देते हो?”
उसने तुरंत सिर हिलाकर जवाब दिया।
“अच्छा … ठीक इसी तरह मम्मी-पापा भी किसी दूसरी की वजह से एक-दूसरे को पसंद करना बंद नहीं करते… देखो अब आप दुनिया की सबसे अच्छी लड़की हो,इसे हमेशा याद रखना।”
पहली बार मैंने उसके होंठों के कोनों को खिंचते देखा और फिर हल्की शर्माहट के साथ उसने अपना चेहरा मेरे बाएं हाथ पर टिका दिया।
“क्या पापा कभी मेरे पास वापस आएंगे? आपने कहा कि बच्चे …. मेरे जैसे बच्चे मम्मी-पापा को पास लाते हैं, जैसे स्प्रुहा ने किया?”
मैंने उसे सहलाया।
“हाँ।”
“कैसे?”
“उन दोनों को प्यार करके।”
“लेकिन मम्मा तो पापा के बारे में बुरी बातें कहती हैं और पापा भी मम्मी के बारे में कहते हैं।”
“आप उन दोनों से कहना कि आप दोनों को प्यार करते हो।”
वह एक “हम्म ..” के साथ चुप हो गई और मैंने बेडरूम के दरवाजे के बाहर अंधेरे में देखना शुरू किया, जहां खाने की मेज है मगर जो अँधेरे में मुझे नज़र नहीं आ रही। लेकिन उस खाने की मेज की यादें अभी भी मेरी यादों में ताज़ा हैं।
मैं अपनी यादों में देख पा रही हूँ कि उस नीची टेबल के एक किनारे मैं,मेरे दाहिने किनारे पर मेरा छोटा भाई और बाएं किनारे पर सबसे छोटी बहन बैठे हैं जबकि माँ सामने बैठी हैं। सभी रात के खाने के बाद अपनी-अपनी आइस-क्रीम पर झुके हुए थे। मुझे आइस-क्रीम का कोई खास शौक नहीं था,इसके अलावा मेरा पेट भी भरा हुआ था।
पिताजी को पीछे छोड़कर, माँ हम सबको इस फार्महाउस पर घुमाने लाई थीं। मुझे आइसक्रीम की बजाय सबके साथ बैठने में मज़ा आ रहा था और मैं आइसक्रीम से ज्यादा सबके साथ का लुत्फ उठा रही थी। काश मैं समय को वापस मोड़ सकती और इस पल को कैद कर सकती क्योंकि ठीक इस पल के बाद मेरी ज़िंदगी हमेशा के लिए बदल गई।
माँ ने तभी पिताजी से अलग होने की बात छेड़ दी। मैं तेरह की थी और मैं समझ सकती थी कि इसका क्या मतलब है। मुझे नहीं पता कि मेरे सात साल के भाई और पांच साल की बहन इसे कितना समझ सके।
लेकिन जैसे इतना कहर ढाना काफी नहीं था,उन्होंने आगे भी कहा।
“पिताजी तुम में से एक को अपने साथ रखना चाहते हैं।”
तुरंत मेरी बहन मां के कंधे से झूल गई और कहा “मैं आपको नहीं छोड़ सकती।” और अगले ही पल मेरा भाई भी माँ से चिपक गया “मैं भी नहीं।”
मैं स्तब्ध थी। हर कोई मुझे ठंडी आँखों से देख रहा था,जैसे कि मैं कोई अपराधी थी या परिवार के बाहर निकाल दी गई कोई चीज़ थी। मुझे उनसे अलग करती हुईं,पराएपन से भरी वे आँखें मुझे आज भी कंपा देती हैं।
मगर इस समय मैं अपनी गीली बाँह के कारण काँप उठी जो वैशाली के मुँह से निकले लार की वजह से गीली हो चुकी थी। मैंने उसका सिर लिया और धीरे से उसे जगाए बिना तकिए पर रखा, जबकि मैं उसकी बाईं ओर के गील बिस्तर पर ही सो गई।
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हमारी कॉफी टेबल पर ठंडी हो रही थी और हममें से किसी को उसे पीने का ध्यान नहीं था तान्या अपने झुके हुए सिर के साथ एक अपराधी की तरह बैठी थी और फिर भी मैं एक क्रूर शिकारी की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ रही थी।
“देखो तान्या! मुझे पता नहीं कि आकाश के साथ आपकी ज़िंदगी कितनी बुरी होगी लेकिन यह अलगाव वैशाली को तबाह न कर दे। वह खुद को व्यक्त करने से डर रही है, वह कुछ भी करने से डरती है, उसका आत्मविश्वास डाँवाडोल हो चुका है। वह ऐसा महसूस करती है कि जो कुछ भी वो करती है वह गलत हो जाता है और अगर कुछ गलत हो जाता है,तो आप भी उसे पापा और दादी की तरह छोड़ दोगी। मैंने आपसे पहले आग्रह किया था और इस बार प्रार्थना कर रही हूँ कि प्लीज़, प्लीज़ एक काउंसलर के पास जाओ।”
मेरी ओर देखने की बजाय दूसरी ओर चेहरा कर वह फुसफुसाई।
“मैं आकाश के पास नहीं जा सकती और वैशू का बहाना लेकर कोई फेवर नहीं माँग सकती हूँ। वो समझेगा कि मैं वैशू का बहाना कर उसके करीब जाने की कोशिश कर रही हूँ।”
“ओह! तो फिर मुझे देखो तान्या। मुझे अच्छी तरह से देखो।”
उसने अपनी आँखें मेरी ओर कर दीं और उसकी आँखों में गहराई से देखते हुए मैंने अपनी बात की।
“मैं …. मैं एक तलाकशुदा माता-पिता की बच्ची हूँ। मुझे देखो तान्या। अलगाव की क्रूरता से बचने के लिए मैंने किसी आदमी को अपनी ज़िन्दगी में आने ही नहीं दिया। मेरे पिता ने दूसरी शादी कर ली और जब मैं कॉलेज में ही थी,तभी यह बड़ी संपत्ति छोड़ गए। यदि स्कूल में बच्चों के लिए नहीं जीना हो तो मेरे जीवन में कुछ भी नहीं है … यह पूरी तरह से खाली है।”
मैं सामने थोड़ा और झुकी, मानो उसकी आँखों में और आगे घुसना चाहती हूँ।
“… अब वैशाली की कल्पना करो, आपकी अपनी वैशू के भविष्य की। मेरे माता-पिता का तलाक बहुत आराम से हुआ था। वे तुम दोनों की तरह लड़ते नहीं थे।”
मैं अपनी मुद्रा में वापस लौटते हुए सीट पर आराम से बैठ गई और हथेलियाँ फैला कर कहा।
“… अब आपके ऊपर है। आप पहले भी काउंसलर से मिलने की मेरी सलाह यह कहकर ठुकरा चुकी हैं कि आप इस भावनात्मक उथल-पुथल को सहन करने के लिए मानसिक रूप से मज़बूत हैं और एक बोल्ड लेडी हैं। आप इसे फिर से ठुकरा सकती हैं।”
मैं उठ गई और अपने फार्महाउस से वैशाली को भेजने के लिए जगाने अंदर चली गई।
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पिछले हफ्ते पीटीए मीटिंग हुई और मैंने वैशाली को एक खूबसूरत आदमी की बाहों में खिलखिलाते हुए पाया। बेशक,यह उनके ही शारीरिक गुण थे जो वैशाली को बहुत सुंदर बनाते हैं।
तभी तान्या आई और मैंने उसे एक तरफ ले जाकर उसके खिल रहे चेहरे का कारण पूछा।
“बहुत-बहुत धन्यवाद। यह सब आप के कारण हुआ। जब आकाश ने आपके और वैशू के बीच उस रात हुई बातचीत के बारे में सुना तो वो काउंसलर के सामने ही आँसूओं में डूब गए। मैंने कभी नहीं सोचा था कि वे कभी भी अपनी गोद ली हुई बेटी के साथ इतने खुश रह सकेंगे, खासकर तब जब उनकी मां बच्चा गोद लेने के सख़्त खिलाफ थीं, वह भी एक लड़की।”
“गोद ली हुई????”
“ हाँ मेरे बेटे विशाल को एक बहन की चाहत थी। लेकिन विशाल की मृत्यु के बाद,जो बालकनी से फिसल गया था, और जिसके लिए आकाश ने मुझे जिम्मेदार ठहराया, मैंने कभी नहीं सोचा था कि हम फिर से कभी एक हो पाएंगे। लेकिन आपका धन्यवाद कि यह सब हो सका।”
मैंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
“कोई बात नहीं। भूल जाओ सब और शीघ्र ही एक और के लिए मिठाई खिलाओ।”
“ओह नहीं.. अब यह संभव नहीं है। मेरे दोनों ट्यूब हटा दिए गए हैं लेकिन यह अच्छा है, वरना मेरे परिवार में ऐसी सुंदर परी नहीं आती। एक बार फिर से धन्यवाद।”
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मैं अपने फार्महाउस के ड्राइंग रूम में बैठी कॉफी पी रही हूँ और खिड़की से बाहर देखती हूँ कि स्प्रूहा उछ्लती-कूदती अपने माता-पिता के साथ इस ओर आ रही है। शायद वे भी अपने जीवन के उथल-पुथल में आई शांति के लिए धन्यवाद देना चाहते हैं।
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परिचय - नीतू सिंह

नाम नीतू सिंह ‘रेणुका’ जन्मतिथि 30 जून 1984 साहित्यिक उपलब्धि विश्व हिन्दी सचिवालय, मारिशस द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय हिन्दी कविता प्रतियोगिता 2011 में प्रथम पुरस्कार। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेख, कहानी, कविता इत्यादि का प्रकाशन। प्रकाशित रचनाएं ‘मेरा गगन’ नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष -2013) ‘समुद्र की रेत’ नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2016), 'मन का मनका फेर' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2017) एवं 'क्योंकि मैं औरत हूँ?' नामक काव्य संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2018) तथा 'सात दिन की माँ तथा अन्य कहानियाँ' नामक कहानी संग्रह (प्रकाशन वर्ष - 2018) प्रकाशित। रूचि लिखना और पढ़ना ई-मेल n30061984@gmail.com