लघुकथा

दृढ़ निश्चय

                                                        हिंदी पखवाड़े पर विशेष 

 

हिंदी पखवाड़े का अवसर है. याद हिंदी की आनी चाहिए, पर न जाने क्यों गांधीजी के तीन बंदर याद आ रहे हैं. आएं भी क्यों न! सामने दिख जो रहे हैं. कितनी अच्छी सीख देते हैं ये हमें! बुरा मत बोलो, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो. पर ये क्या! आज इन बंदरों का बदला हुआ रूप क्यों दिखाई दे रहा है? अरे, ये तो खुद भी चिंतित दिखाई दे रहे हैं! बोलो भई क्या हुआ?
”क्या हुआ?” एक बंदर ने कहा, ”मेरा मुंहं तो इसलिए बंद था, ताकि मैं संदेश दे सकूं, कि ”बुरा मत बोलो”. ये अंग्रेजीदां बच्चे इसका मतलब निकाल रहे हैं, ”हिंदी मत बोलो”.
उसके चुप होते ही दूसरे बंदर ने अपनी व्यथा को उकेरा, ”मेरी आंखें इसलिए बंद थीं, ताकि मैं बुरा न देखने का संदेश दे सकूं. अब पता है इसका क्या अर्थ निकाला जा रहा है- ”देश की आजादी के सात दशकों के बाद भी अंग्रेजी का अंधाधुंध प्रयोग होते हुए भी उसे अनदेखा कर दूं. भला यह भी कोई बात हुई!”
तीसरे बंदर की उदासी से लग रहा था, उसका अंतर्मन रो रहा था. मैंने कहा- ”तुम भी कुछ बोलो, तुम्हारे तो कान बंद नहीं हैं, फिर भी तुम उदास क्यों हो?”

”मेरे कान तो इसलिए बंद थे कि मैं बुरा न सुनने का संदेश दे सकूं. पर मुझे सुनना क्या पड़ रहा है!-

 

”Sex का गुणगान करो भी, सुनो भी, पर अनसुना कर दो.”
”Scandal करो, देश से भाग जाओ, किसी की सुनो-मानो मत, कुछ समय बाद मामला रफा-दफा हो जाएगा.” 
”Consumer की व्यथा मत सुनो, वह तो बेचारा भोला-भाला है, हां चुनाव के समय थोड़ी-सी महंगाई कम करने और 1-2 फी सदी महंगाई भत्ता बढ़ाने का चारा डाल देना और चुनाव जीत जाना.” 
”आप देख रहे हैं, कि आज मेरे कान बंद नहीं हैं, फिर भी मुझे अपनी मनमर्जी की बात नहीं, जमाने की मनमर्जी की बात सुनने को विवश किया जा रहा है.”

”तो तुम सब ने जमाने की बात मान ली है?” मैंने पूछा.
”बिलकुल नहीं,” तीनों बंदर एक साथ बोले, ”हम तो आपकी तरह हिंदी और देश के उत्थान में लगे रहेंगे.” यह दृढ़ निश्चय करते ही उनके चेहरे की मुस्कान वापिस आ गई थी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

One thought on “दृढ़ निश्चय

  • लीला तिवानी

    आजादी के सात दशक बाद भी आज 14 सितम्बर को देश-विदेश में हिंदी दिवस धूमधाम से मनाया जाता है, लेकिन हिंदी का उपयोग बहुत कम किया जा रहा है. सब जगह अंग्रेजी का बोलबाला है. इसे तरह अपनी सभ्यता-संस्कृति को तिलांजलि दी जा रही है. आइए हिंदी का प्रचार-प्रसार-विकास करने का दृढ़ निश्चय करें, फिर मुस्कान हमारी है.

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