लघुकथा

संवेदनशून्यता

लगभग दो महीने से मणिका ब्राउन और ग्रीन प्यालों में चाय बना रही है. दोनों प्यालों में वह बराबर दूध डालती, चीनी डालती और 1-1 टी बैग डालती. दोनों प्यालों को एक साथ 1 मिनट के लिए माइक्रोवेव करती फिर दोनों प्यालों में बराबर पनी डालती, लेकिन नतीजा अलग-अलग निकलता. ब्राउन प्याले वाली चाय तेज कड़क दिखती, ग्रीन वाली कम कड़क. आज उसने राज जानने की ठान ली थी. उसने हमेशा की तरह दोनों प्यालों को रगड़-रगड़कर मांजा और फिर ध्यान से देखा. ग्रीन प्याले का अंदर का हिस्सा एकदम सफेद झख था, जब कि ब्राउन प्याले के अंदर के हिस्से में ब्राउनिश झलक थी. बस यही ब्राउनिश झलक चाय के रंग में अंतर दिखा रही थी. वह प्याले रखकर काम में लग गई, पर यह झलक वाली बात उसके मन से नहीं निकल सकी. वह न जाने कहां खो गई!
दो महीने से दिन में चार बार इन प्यालों में चाय बना रही हूं, पर पूरी तरह दृश्टव्य होते हुए भी इनके अंतर को न जान सकी, फिर अपने अंतस को, जो सर्वथा आंखों से ओझल है कैसे जान सकती है? असल में तो उसने कभी कोशिश ही नहीं की. वह बड़ी शिद्दत से गणेशोत्सव मनाती है. उसने कई जगह लिखा-कहा-सुना है-

”कोशिश कर रहा हूं कि कोई मुझसे न रूठे,
जिंदगी में अपनों का साथ न छूटे,
रिश्ता कोई भी हो उसे ऐसे निभाऊं,
कि उस रिश्ते की डोर जिंदगी भर न टूटे.”
और
”अपने आप में संशोधन करने का काम, 
हमें स्वयं करना होगा.”
तथा
”दूसरों की मदद करते हुए,
यदि दिल में खुशी हो, 
तो वह सेवा है,
बाकी सब दिखावा है.” 
पर क्या वह इनमें से एक पर भी अमल कर पाई है? और-तो-और उसदिन उसने समाचार पढ़ा-
”4 टांगों और दो पेनिस वाला बच्चा पैदा हुआ.” उसने ऐसे ही अजब समाचार की तरह उसे पढ़ लिया और बहू को सुना भी दिया. बहू का चेहरा संवेदना से सराबोर हो गया और मां और नवजात बच्चे के ऑप्रेशन की बात सोचकर वह आकुलता से बोली- ”बेचारे को पता नहीं कितने ऑप्रेशन्स से गुजरना होगा!” एक तरफ संवेदनशीलता की चरम सीमा थी, दूसरी तरफ संवेदनशून्यता की पराकाष्ठा. उफ्फ! यही है मेरे अंतस की झलक!”
मणिका ने तुरंत सूरज की साक्षी में अपने घर के स्विमिंग पूल में अपनी संवेदनशून्यता का विसर्जन करने का संकल्प लिया, जिसके लिए न तो किसी गाजे-बाजे की जरूरत थी, न भीड़ भड़क्के की.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।

3 thoughts on “संवेदनशून्यता

  1. प्रिय ब्लॉगर रविंदर भाई जी, आपने बिलकुल दुरुस्त फरमाया है. लोग राह चलते किसी की दुर्घटना देखकर ऐसे आगे बढ़ जाते है जैसे कोई बड़ी बात नहीं । यही घटना यदि उसके किसी सगे सम्बन्धी की हो तो हाय तौबा करने लगते है । कोई सेल्फी लेने लगता है कोई टिपण्णी करता है, मदद के लिए कोई इक्का दुक्का संवेदनशील व्यक्ति आगे आता है । आज इंसानियत मर गयी है, इंसान मरा हुआ है शरीर ज़िंदा है । अपनी संवेदनशून्यता का विसर्जन ही असली विसर्जन है. ब्लॉग का संज्ञान लेने, इतने त्वरित, सार्थक व हार्दिक कामेंट के लिए हृदय से शुक्रिया और धन्यवाद.

  2. संवेदनशीलता इंसानियत का प्रतीक है और संवेदनशून्यता यानी इंसानियत से कोसों दूर. संवेदनशीलता से ही सेवा, सद्भावना, स्नेह आदि सद्गुणों का प्रादुर्भाव होता है. प्रभु को निष्काम, निःस्वार्थ सेवा वाली सीरत और असली मुस्कुराहट वाली सूरत पसंद है, जो संवेदनशीलता से प्राप्य है, संवेदनशून्यता से नहीं. अतः विसर्जन करना है, तो श्री गणेश का नहीं, अपनी संवेदनशून्यता का करें, वह भी शुद्ध मन से, दिखावे के साथ नहीं.

    1. आदरणीय दीदी,
      आपने सही कहा है, लोग राह चलते किसी की दुर्घटना देखकर ऐसे आगे बढ़ जाते है जैसे
      कोई बड़ी बात नहीं । यही घटना यदि उसके किसी सगे सम्बन्धी की हो तो है तौबा करने लगते है । कोई सेल्फी लेने लगता है कोई टिपण्णी करता है, मदद के लिए कोई इक्का दुक्का संवेदनशील व्यक्ति आगे आता है । आज इंसानियत मर गयी है, इंसान मरा हुआ है शरीर ज़िंदा है ।

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