आपाधापी

“आपाधापी “

जीवन के  आपाधापी में
सोचा नहीं दो पल बैठकर ,
शुरू हुआ सफर कहाँ से
है इसका अंत   किधर  ।

चलते-चलते डगर पर
मिले फूलों के संग कांटें भी
कहीं छूटें हंसी के फव्वारे
निकली कहीँ दिल से आंहें भी।

तूफानी हवा बुझाना चाही
दिल में जलती उम्मीद की लौ को
हारकर दिशा बदली उसने
देख बनते लौ से मशाल को ।

कभी डगमगाए कदम मेरे
कहीं थककर चूर हुआ बदन
रस्ता लम्बा,मंजिल दूर थी
साथ चलती रही मन की लगन ।

निरन्तरता ही  है  जीवन
चलते रहना है उम्रभर
रूक जाना है मृत्यु सम
चलते रहो सदा अपनी डगर।

         ज्योत्स्ना पाॅल-मौलिक रचना

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com