लघुकथा

रिश्तों की डोर

आज रीता को समझ ही नहीं आ रहा था, कि सबको अपना मुंह कैसे दिखाए. अफसोस की शिकन उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी. वह सोच रही थी.
”मैं रोज पाठ करती हूं और उसमें अक्सर आता है कि पैसा हाथ का मैल है, माया आनी-जानी है, संसार में सब खाली हाथ आए हैं और खाली हाथ ही जाना है, मनुष्य संसार में आता है तो उसके पास कोई जेब नहीं होती और जब संसार से जाता है तो कफन में भी कोई जेब नहीं होती, मौत के फरिश्ते के पास कोई रिश्वत नहीं चलती, समय पड़ने पर जरूरतमंद की मदद करना इंसानियत है आदि-आदि, फिर मनीषा तो उसकी सगी और इकलौती ननद है, जरूरत के समय उसकी मदद करने पर उसका क्या जाता था!” 
”मेरे सास-ससुर ने उसकी मदद करके क्या गुनाह किया था! उसको 35 हजार रुपए महीने का किराया देना पड़ता था. एक अच्छा घर उनको पसंद आ गया था. उसे खरीदने के लिए 3 लाख रुपयों की कमी पूरी करने के लिए सास-ससुर ने अपनी पेंशन से मदद कर दी थी, पर मैंने क्या किया?”
”रोज पाठ करने वाली हूं, फिर भी इतनी प्यार-दुलार वाली सास से झगड़ा मोल ले लिया. सास ने कहा भी था- ”देख रीता, हमारा एक ही बेटा है और एक ही बेटी. पहली बात तो उसके पास जैसे ही पैसा आ जाएगा, वह वापिस कर देगी, नहीं तो समझेंगे जीते-जी बेटी को दान कर दिया. चिंता क्यों करती हो? हमें अच्छी चिकनी-चुपड़ी खाने को भगवान दे रहा है न! कम-से-कम मनीषा को किराए से तो निजात मिल गई न!”
आज वो ही ननद सपरिवार आकर सबके सामने 3 लाख भी दे गई और मार्केट रेट पर सूद भी. ममी-पापा ने सूद लेने से कितना इनकार किया था, पर ननदोई जी ने साफ शब्दों में कहा- ”पापा जी, इस पैसे पर पहला हक भैया-भाभी का है, आप लोगों ने जरूरत के समय हमारी सहायता कर दी, वह ही क्या कम है!”
रीता रसोईघर में चाय बनाते-बनाते अपने आंसू नहीं रोक पाई थी, बाहर आकर कुछ कह भी नहीं पाई थी. 
अब रिश्तों की डोर को मजबूती से थामे रखने का संकल्प लेकर वह सहज हो गई और सास-ससुर से माफी मांगने चल पड़ी.

*लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं। लीला तिवानी 57, बैंक अपार्टमेंट्स, प्लॉट नं. 22, सैक्टर- 4 द्वारका, नई दिल्ली पिन कोड- 110078 मोबाइल- +91 98681 25244

2 thoughts on “रिश्तों की डोर

  • गुरमेल सिंह भमरा लंदन

    लीला बहन , दुःख की बात यही है की रिश्तों में दरारें पढना छोटी सोच के कारण ही होता है लेकिन कुछ लोग हैं जो अपनी भूल को सवीकार करके फिर से डोर को कस के बाँध लेते हैं .

  • लीला तिवानी

    रिश्तों की डोर एक ही झटके से टूटने वाली नहीं, बल्कि बहुत मजबूत होती है. थोड़े-से धैर्य से इसको टूटने से बचाया जा सकता है.

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