लेख– जनसरोकारों पर बात हो सिर्फ़ सियासतदानों की तरफ़ से!

देश की रीढ़ कृषि और भविष्य निर्माण करने वाली शिक्षा व्यवस्था दोनों की स्थिति नाजुक है। एक तरफ देश का किसान बेबश और लाचार हैं, तो दूसरी ओर शिक्षा व्यवस्था का भी बेडा गर्त है। ऐसे में देश तरक्की की तरफ़ कैसे राजनीति की पाठशाला के मुताबिक बढ़ रहा, यह समझ से बाहर है। देश की प्रगति के निर्धारक कहीं न कहीं किसान और युवा पीढ़ी ही होती है। इन दोनों की हालत आज के दौर में बद से बद्दतर होती जा रही। देश का अन्नदाता जो दूसरों का पेट सदियों से भरता आया है, अगर उसके परिवार-जनों को दो वक्त की रोटियाॅ नहीं मिल पा रही। फिर कैसे रहनुमाई तंत्र सामाजिक-आर्थिक प्रगति और उन्नति की ढ़पली देश पीट रहा। यह अपने-आप में एक अनसुलझी गुत्थी समझ आती है। आज जब जन सरोकार से ज़ुड़े मसलों की गूंज सियासी गलियारों में होनी चाहिए, तब राजनीति धर्म और जाति की हो रही। जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात है।

राजनीति और धर्म दोनों अलग-अलग विषय है। फिर भी आज दोनों का सियासतदानों ने सम्मोहन सिर्फ इसलिए करवा दिया है, क्योंकि सत्ता पिपासा की तीव्रता राजनीति के ठेकेदारों में बढती जा रही है। आजादी के लगभग सात दशक बाद भी देश में ऐसे युवाओं की फौज पनप नहीं पा रही। जो देश और समाज को नई दिशा और दशा प्रशस्त करा सकें। तो इसके लिए कहीं न कहीं उत्तरदाई हमारे रहनुमा भी हैं, लेकिन इन सब की तरफ़ झांकने का समय कहाँ सियासत के नुमाइंदों को। उन्हें तो जाति-धर्म की उर्वरता ही इतनी बेहतरीन मतों की पैदावार दे जाती है, कि बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे विषयों पर बात करना ही बेईमानी लगता है। आज के दौर में धर्म को राजनीति से जोड़कर देखा जाने लगा है, यह कतई कहीं से कहीं तक सही नहीं है। धर्म संविधान में जिक्र किया गया है, कि व्यक्ति का स्वतंत्र मसला है, लेकिन आज की राजनीति ने उस पर आक्षेप कर दिया है।

आज देश की स्थिति पतली है। भ्रष्टाचार के मामले में हम विश्वपटल पर शीर्षस्थ पर है। शिक्षा-स्वास्थ्य की शिथिल होती हालत से कोई अनभिज्ञ नहीं। ऐसा क्यों है, क्या कभी हमारे नुमाइंदे इस पर मनन और चिंतन करते हैं। शायद कभी उनको इस पर चिंतन-मनन की गुंजाइश नजर नहीं आई। इसके पीछे एक मनौवैज्ञानिक धारणा भी है। जिस मुद्वे में रस देश-समाज लेता है। उसी पर मंथन किया जाता है, और जनमत का निर्माण होता है। हम खबरिया चैनलों पर होने वाली धर्म-जाति की बहस में इतना मशगूल हो चुके है। जिसके इतर न देश-समाज की उन्नति का विचार दृष्टिगत हो रहा। न ही किसी भी तरह से सियासतदानों को धर्म-जाति की बेडियां तोड़ने के लिए उकसा पा रहें है। तो इसमें कहीं न कहीं जिम्मेदार हम और हमारा समाज है। हम जिक्र अपने अधिकार की कर लेंगें, लेकिन संवैधानिक कर्त्तव्यों का निर्वहन और समाज में रहने के नाते सामूहिक उत्तरदायित्व की भावना का लोप आखिर कब तक चलता रहेगा। हम उम्मीद रहनुमाई व्यवस्था से देश-समाज में अमूल-चूल परिवर्तन की करते है। क्या कभी हमने भी अपनी जिम्मेदारियों से समाज और देश में बदलाव के वाहक बनने की फितरत पाली। उत्तर नकारात्मक ही मिलेगा।

आज देश में हम समस्याओं का अंबार गिना सकते है। क्या हमने अपने स्तर से उसे दूर करने का प्रयास किया। क्या हमने अपने प्रतिनिधियों से यह पूछने की हिमाकत दिखा पाई, कि उक्त समस्या का निराकरण क्यों नहीं हो रहा? शायद नहीं, हम आज के दौर में यह कह दें कि अनुगामी बनकर रह गए है। इसके अलावा हम सिर्फ़ स्व की सोच के गुलाम हो गए हैं। तो शायद यह उक्ति भी कम पड सकती है। आज हम मूकदर्शक की स्थिति में पहुंच चुके है। ऐसे में जब हमें अपने सामाजिक उत्तरदायित्व का भान नहीं रहेगा। तो राजनीति के तिकडमबाज क्यों देश और समाज को सुधारने का फित्तूर पालेंगें? उनसे सवाल पूछने वाला भी कोई हो। तब तो उन्हें एहसास होगा, कि उनसे भी सवाल पांच वर्ष बाद कोई पूछेगा। जब स्थिति यह निर्मित होगी। अपने-आप स्थिति देश-समाज की बदलनी शुरू होगी।

किस-किस समस्या का जिक्र करें, जिससे आज के आधुनिक होते भारत को मुक्त हो जाना चाहिए। फिर वह चाहें असमानता के स्तर की हो, कुछ स्तर पर व्याप्त वैमनस्यता हो, मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति हो। इन सभी विषयों पर देश आज भी किसी न किसी स्तर पर लचर अवस्था में, लेकिन क्या आज भी हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था उन समस्याओं से देश को दूर करने का सकल प्रयास कर रही। शायद ऐसा कहना जल्दबाजी होगा। जो स्थिति तत्कालीन समय में दिख रही। वैसे में प्रथम दृष्टया यही कह सकतें हैं, कि किसी भी दल के पास सभी को साथ ले चलने की न नीति है और न ही सर्वसमाज को एकसमान क्षैतिज अवस्था में पहुंचाने का माद्दा। आज जैसा आभामंडल देश में बना हुआ है। क्या हम-आप और राजनीति इससे अंजान है। बिल्कुल नही। उत्तरप्रदेश की रहनुमाई व्यवस्था यह कहती है। उनके पास नौकरियों की भरमार है, लेकिन योग्य और कार्यशील युवाशक्ति नही। अगर ऐसी स्थिति बन भी रही है। तो क्या कभी राजनीतिक व्यवस्था ने यह तह में जाकर पता करने की कोशिश की। ऐसी स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है। ऐसे में लगता कुछ यूं है। हम आज़ादी के जश्न तले दबे तो परतंत्रता में ही हैं। न महापुरुषों के विचारों का ज़िक्र करने वाले सत्ताधीश महापुरुषों के विचारों और मतों पर चल पा रहें हैं, और कहीं न कहीं अवाम भी अपने फर्ज को समझ नहीं पा रही है।

तभी तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के सात दशकों का दस्तूर रहा है। मुख्य धारा से छिटका हुआ तबक़ा रोटी और दवा की आवाज़ लगा रहा, लेकिन सियासत के लम्पट खिलाड़ी मंदिर-मस्जिद और गुरुद्वारा जाकर अपने मतों का बंदोबस्त करने में लगें हुए हैं। उन्हें यह मालूम है, मत अवाम के हाथों में है। फिर भी अगर सियासतदां आएं दिन मंदिर-मस्जिद की दौड़ ही लगाते रहते हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार हम लोग ही है। हम धर्म और जाति के नाम पर क्योंकि सदियों से बंटते चले आ रहें हैं। अब हमें इससे उभरना होगा, साथ में जनप्रतिनिधियों का पांच सालों के दौरान क्या रहा रिपोर्ट कार्ड। यह पूछने की प्रवृत्ति अवाम के अंदर होनी चाहिए। तभी कुछ आशा की बयार बहती हुई दिख सकती है, वरना राजनीति के नुमाइंदे लफ़्फ़ाज़ी में ही देश चलाते रहेंगे और जो खाई समाज में पनपती जा रही। वह कतई दूर नहीं हो पाएगी।

परिचय - महेश तिवारी

मैं पेशे से एक स्वतंत्र लेखक हूँ मेरे लेख देश के प्रतिष्ठित अखबारों में छपते रहते हैं। लेखन- समसामयिक विषयों के साथ अन्य सामाजिक सरोकार से जुड़े मुद्दों पर संपर्क सूत्र--9457560896