कविता

गीत

भूला बिसरा गीत हूँ मैं , जब चाहा गुनगुना लिया । खुदा की कोई भूल हूँ मैं , जब चाहा आजमा लिया । साहिल का पत्थर हूँ मैं, जब चाहा पार लगा लिया । रास्ते की कोई धूल हूँ मैं , जब चाहा सिर से लगा लिया । अनचाहा सा इकरार हूँ मैं , जब […]

गीत/नवगीत

इंतजार

जबसे गए हो तुम पिया , न खत भेजा न पूछी बात । जबसे मिले हो तुम पिया , न चैन रहा न दिल है साथ । कैसी हो तुम कब आओगी नैनो में तुम कब छाओगी । जबसे गए हो तुम पिया , पूछा भी नही तुम कैसी हो । मन वीणा की साँस […]

कविता

इबादत

इबादत ही तो है जिंदगी , कर्म करो फल की इच्छा मत करो । अहसान ही तो है जिंदगी ऊपरवाले की नाचते रहो उफ्फ मत करो । चलते रहो अनजान रास्तों पर , मंजिल की तलाश में तौबा मत करो । अजूबा है जिंदगी और मौत , महसूस करो अनुभव से सीखते रहो । नाहक […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

आध्यात्मिकता रहित भौतिक सुखों से युक्त जीवन अधूरा व हानिकारक है

ओ३म् मनुष्य मननशील प्राणी है। मनुष्य अन्नादि से बना भौतिक शरीर मात्र नहीं है अपितु इसमें एक अनादि, नित्य, अविनाशी, अमर, अल्पज्ञ, जन्म-मरण धर्मा, शुभाशुभ कर्मों का कर्ता व भोक्ता जीवात्मा भी है जो इस शरीर का स्वामी है। आश्चर्य है कि अधिकांश शिक्षित व भौतिक विज्ञानी भी अपनी आत्मा के स्वरूप व इसके गुण-कर्म-स्वभावों […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

धर्म के ज्ञान के कारण बढ़ रहे हैं अपराध

धर्म के विषय में गीता में एक श्लोक है : स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः अर्थात अपने धर्म के लिए मरना भी श्रेष्ठ है ।दूसरे धर्म के लिए मरना भयानक यानी की पीड़ा पहुंचाने वाला है। हिंदू धर्म में कहा गया है, की अपने धर्म के लिए अगर जान भी देनी पड़े तो व्यक्ति को संकोच […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

श्राद्ध और ब्राह्मण भोज

श्राद्ध और ब्राह्मण भोज आज कल एक नई फैशन और नई सोच समाज में तेजी से बढ़ रही है ।जहां शिक्षित वर्ग इसका अनुसरण करते नजर आ रहे हैं, वहीं पुरातन वादी सोच के व्यक्ति इसका विरोध भी कर रहे हैं। क्या आप सभी में से किसी ने कभी सोचा है कि हम साथ पक्ष […]

कविता

कविता….

कविता किसी विधालय, महाविधालय में सिखाई-पढ़ाई नहीं जाती जब एक इंसान लेता है जन्म पैदा होता है तभी एक कवि- मन जैसे-जैसे बढ़ता है इंसान कविता भी कोपलित होती है पल्लवित होती है पुष्पित होती है हाँ ! पहचानने में लगता है समय संवारने में देना होता है वक्त अंतस से झूझना होता है बड़ी […]

कविता

महाभारत

बस कुछ दिन की बात बची है, दुनियाभर मे हाहाकार मची है । सजे-धजे सब हथियार पड़े है , ले-लेकर सब कुछ साथ खड़े है । दो-दो हाथ में अब देरी क्या है, मेरे से तगड़ी,अब तेरी क्या है। बस नरक बहुत ही जल्द बनेगी, आपस में लड़-लड़कर कटेगी । सब हथियार धार दार बने […]

कविता

अस्तित्व

“अस्तित्व” मैं अपने आप को तलाशती रही और तुम कहते रहे – तुम हो मेरे अपने । मैं सहज सब स्वीकारती रही जो तुमने कहा । तुमने मुझे विश्वास दिलाया- तुम मेरी दुनिया हो, मेरी पहचान हो, तुममें तलाशती रही अपना अस्तित्व । कभी मैंने जाना ही नहीं तुमसे अलग कोई पहचान है मेरी । […]

कविता

धुंध छंट गई

समय बदलता ही रहता है मौसम भी बदलता ही रहता है कानून भी बदलते रहते हैं उसूल भी बदलते रहते हैं समय और मौसम की धुंध को सहन करना आसान है पर बदलते उसूलों और नियमों को  स्वीकार करना बहुत ही कठिन है. यह जानते हुए भी कि धुंध का अस्तित्व थोड़े समय का है […]