हौसला

“हौसला ”

मैंने हमेशा समन्दर का
एक कतरा
समझा है ख़ुद को,
फ़िक्र नहीं क्या
एहमियत दी समुन्दर ने
उस बुंद को ।
कहते हैं कतरे-कतरे से
बनता है सागर और
बुंद-बुंद से भरती है गागर,
मुझे एक चराग़ समझने की
ग़लती न करना आंधियों
ये तो हौसलों की लौ है
जो रोशन रहेगी सदियों ।

ज्योत्स्ना की कलम से

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com