बेटी

मेरी एक पुरानी रचना सबको समर्पित करती हूँ ।
जब मेरी बेटी का जन्म हुआ था………

“बेटी ”

तुमसे महका मेरे
जीवन का उपवन
लौट आया मेरे घर में
मेरा ही बचपन ।

किलकारियों से गूंज उठा
मेरा घर और आंगन
भूल गई मैं दुनिया सारी
पाकर ये नया जीवन ।

तेरी हर अदा से
प्रफुल्लित होता मेरा मन
जैसे मना रही हूँ
कोई त्यौहार पावन ।

रखा तूझे छुपाके आंचल में
जैसे तन में छुपा है मन
तूझ पर आंच न आए कोई
हो बरसात या धूप की तपन।

खेल-खेल में तू बड़ी हो गई
हुआ न मुझे इसका भान
काश एकबार लौट आए
तेरा वो प्यारा सा बचपन ।

ज्योत्स्ना की कलम से
मौलिक रचना

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com