विवशता

लघु कथा….

” विवशता ”

विमला अस्पताल से घर आ गई थी। बहुत दुखी और उदास थी। जांघ में प्लास्टर चढ़ा हुआ था। घर की सीढ़ी से गिरकर जांघ की हड्डी टूट गई थी। एक हफ्ते के बाद घर में आकर थोड़ा सा आराम तो मिला परंतु मन में कुछ बातें चुभ रही थी। पलंग पर लेटे लेटे सुनीता को आवाज देती रहती है…..”सुनीता एक गिलास पानी दे दे… सुनीता दवा दे दे…” आदि आदि।
पड़ोस की अंबिका आई थी उसे देखने के लिए, जो उसकी अच्छी सहेली है। उससे मन की बातें कर लेती है। उसे उदास और रोते हुए देख कर अंबिका ने पूछा…”क्या बात है विमला, क्यों रो रही है? अब तो घर आ गई हो। सुनीता अच्छे से देखभाल नहीं कर रही है क्या?”
“हां अंबिका…सुनीता नहीं होती तो मेरा क्या होता? कौन संभालता मुझे और कौन इन्हें दो वक्त की रोटी देता…”, अपने पति की ओर इशारा था उसका। “और वह ड्राइवर मंगल, उसने तो अस्पताल आना जाना, घर का सामान लाना, सब्जी भाजी लाना, सब कुछ संभाल रखा है। चार चार बेटियां है मेरी, सझली और छोटी दोनों आई थी चार,पांच दिन के लिए फिर वापस चली गई। कह रही थी बच्चों की परीक्षा है । बड़ी और मझली ने तो अभी तक झाका ही नहीं, बस फोन पर बात हो गई थी। सब अपने घर गृहस्ती में मगन है। क्या इसी दिन के लिए इन्हें पाल पोस कर बड़ा किया था।
पढ़ाया लिखाया, अच्छी-अच्छी शादियां की, आज चारों अच्छी नौकरियों में है।”…. विमला ने लंबी सांस ली और आंखों से आंसू लुढ़क कर गालों पर आ गीरे।
“नहीं रे विमला ,ऐसी कोई बात नहीं है। तेरी बेटियां तो अच्छी है। अवश्य कोई ना कोई विवशता होगी। नौकरी है, बाल बच्चे हैं, ऊपर से सास ससुर की देखभाल भी तो करनी पड़ती है उन्हें। उन्हें गलत मत समझो।”…. विमला को सांत्वना देने के लिए अंबिका ने कहा पर उसके हृदय में भी एक बात चुभ रही थी, भला बड़ी और मझली बेटी कैसे नहीं आई मां को देखने के लिए?
“मां”…… बाहर से आवाज लगाते हुए आभा, बड़ी बेटी ने घर के अंदर प्रवेश किया। पिताजी का चरण स्पर्श कर, मां के पास आकर बैठ गई। “मां मुझे क्षमा करना मैं खबर मिलते ही आ नहीं पाई, कुछ विवशता ही ऐसी थी। तुम बताओ तुम कैसी हो अब, उठ कर बैठ सकती हो ना, सुनीता ठीक से देखभाल कर रही है ना?”….. आभा के नैनों से झर झर आंसू झरने लगे।
विमला उसकी बातों से संतुष्ट नहीं थी। कहने लगी…..”ऐसी भी क्या विवशता है कि अपनी बीमार मां को भी देखने ना सकी।
“मां क्या बताऊं, सासु मां की तबीयत ज्यादा खराब थी। उनकी सेवा में लगी थी ऊपर से नौकरी और सोनू की परीक्षा भी चल रही थी। बड़ी मुश्किल से छुट्टियां मिली है ऑफिस से। क्या करती तुम ही बताओ”…. आभा रोए जा रही थी।
“मैं ना कहती थी कि कोई ना कोई विवशता अवश्य होगी, नहीं तो बेटियां ऐसी नहीं होती कि मां को देखने ना आए”… अंबिका ने कहा।
“पर अब चिंता मत करो मां, मैं एक महीने की छुट्टी लेकर आई हूं। तुम्हारी अच्छी सेवा करके ही जाऊंगी। मेरे बाद मिली आ जाएगी।” मिली मझली बेटी है ।
“उससे मेरी बात हो गई है। सब के साथ कुछ ना कुछ विवशता है। सब ठीक करके, छुट्टी मिलने के बाद ही तो आ सकती है”… आभा ने मां को समझाया और उनके गालों पर लुढ़के हुए आंसुओं को पोछने लगी।
“दीदी …चाय बन गई है, हाथ मुंह धो लो, चाय के साथ कुछ खा लो फिर आराम से बैठकर मौसी के साथ बात करना”….. रसोई घर से सुनीता ने आवाज लगाई।
“हां… आती हूं सुनीता, तेरी बातें तोे माननी ही पड़ेगी। तू नहीं होती तो न जाने मां पिताजी का क्या होता। कभी-कभी तो लगता है सब कुछ छोड़ कर मां पिताजी के पास आकर रह लूं। काश…. ऐसा संभव हो पाता”…. एक लंबी सांस लेते हुए आभा ने कहा।
आभा के जाने के बाद विमला, अंबिका से कहने लगी…”मैं कितनी गलत थी। अपने ही रक्त के बारे में इतना गलत सोच रही थी। तू सच ही कह रही थी अंबिका। कोई ना कोई विवशता अवश्य होगी।”
और दोनों चुप हो गए……।

पूर्णतः मौलिक-ज्योत्स्ना पाॅल।

 

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com