अमृतसर हादसा – दोषी कौन?

विजयादशमी के दिन अमृतसर के जोड़ा फाटक के पास रावण-दहन कार्यक्रम को देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ इकट्ठी हुई थी. मैदान मे पर्याप्त जगह न होने के कारण मैदान के बाहर लोग रेलवे लाइन की पटरियों पर खड़े होकर रावण-दहन का कार्यक्रम देखा रहे थे साथ ही हाथों में मोबाइल लेकर विडियो भी बना रहे थे. तभी वहां से दो ट्रेनें गुजरी. एक ट्रेन हावड़ा एक्सप्रेस जाने के समय लोग पटरियों से हट गए और दूसरी पटरी पर चले गए ट्रेन आराम से निकल गयी थी. तभी दूसरी ट्रेन डी एम यु आ गयी जिसकी टॉप लाइट नहीं जल रही थी. रावण दहन में पटाखों की आवाज में लोगों को ट्रेन के आने की आवाज नहीं सुनाई पड़ी. ट्रेन का ड्राईवर भी पटरी पर खड़े लोगों को देख नहीं सका और भीड़ को रौंदती हुई निकल गयी. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार ६० से ज्यादा लोगों की जानें गयी और डेढ़ सौ से ज्यादा लोग घायल हुए. पल भर में खुशियाँ मातम में बदल गयी. अब शुरू हो गई चीख पुकार, आरोप प्रत्यारोप और राजनीतिक बयान बाजी.

कुछ लोगों को कहना है कि इस कार्यक्रम के आयोजक सौरभ मदान उर्फ़ मिट्ठू मदान अपनी राजनीति चमकाने के लिए इतनी बड़ी भीड़ इकट्ठी कर मुख्य अतिथि नवजोत सिंह सिद्धू और उनकी पत्नी के सम्मान में कसीदे पढ़ रहा था. हालाँकि वह रेलवे ट्रैक पर खड़े लोगों से यह भी कहा रहा था कि आपलोगों को पता है कि कौन ट्रेन कब आती है, इसलिए अपनी सुरक्षा का ख्याल रक्खें. इतना कहना काफी नहीं था. वहां यह इंतजाम होना चाहिए था कि लोग रेलवे ट्रैक पर न जाएँ या ट्रेन को रोकने की आधिकारिक ब्यवस्था हो. ऐसा कुछ नहीं किया गया केवल कुछ शर्तों के साथ पुलिस से NOC प्राप्त की गयी थी. पुलिस की पर्याप्त ब्यवस्था न थी, जो लोगों को ट्रैक पर जाने से रोक सके, नहीं बैरीकेडिंग की गयी थी. मैदान छोटा और भीड़ ज्यादा ऊपर से राजनीति चमकाने का मौका … भला कोई भी आयोजक यह मौका अपने हाथ से क्यों जाने देता. भाषणबाजी में रावण दहन का कार्यक्रम भी 6 बजे के बजाय 7 बजे हुआ क्योंकि मुख्य अतिथि मिसेज नवजोत सिंह सिद्धू  देर से आयीं अँधेरा गहराता रहा और अँधेरा भी एक कारण बना इस हादसे का. कुछ लोगों का कहना है कि हादसे के समय मिसेज सिद्धू वहां से भाग गयीं बाद में अस्पताल में लोगों के इलाज करती हुईं मिलीं. मुख्य आयोजक सौरभ मदान फरार हैं और पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. डी एम यु के चालक को गिरफ्तार कर लिया गया है …. घायलों का इलाज जारी है कुछ लाशों की पहचान हो गयी है कुछ अभी भी ऐसी हैं जिनकी शिनाख्त नहीं हो पायी है. कुछ लोग अपनों को खोज रहे हैं. हादसा काफी दर्दनाक और भयावह है. यह दुर्भाग्यपूर्ण भी है पर कोई न कोई तो जिम्मेदार है. आयोजक? स्थानीय प्रशासन, रेलवे या भीड़ ???

धार्मिक पर्व त्योहार भारत भूमि की आत्मा में है हर साल कुछ प्रमुख पर्व त्योहार धूम-धाम से मनाये जाते हैं. भीड़ इकट्ठी होती है और कुछ आवंछित दुर्घटनाएं घट जाती है.

०३.१०.२०१४ बिहार की राजधानी पटना में रावण दहन के बाद भगदड़ में मरने वालों की अधिकारिक संख्या 3४ बतायी गयी. पटना के गांधी मैदान में हुई इस घटना पर राज्य के गृह सचिव आमिर सुभानी ने घटना की पुष्टि करते हुए बताया कि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं. घटना एक्जीबिशन रोड इलाके में रामगुलाम चौक के पास उस वक्त हुई जब अफवाह की वजह से भगदड़ मच गई. घायलों को पीएमसीएच में भर्ती कराया गया है. मरने वालों में अधिकतर महिलाएं और बच्चे हैं. पुलिस के मुताबिक लोग गांधी मैदान में आयोजित रावण दहन कार्यक्रम से लौट रहे थे. वहीं, मां दुर्गा की मूर्ति विसर्जन के लिए भी इसी रास्ते पर सैंकड़ों की तादाद में लोग मौजूद थे. बताया जा रहा है कि इस दौरान किसी ने बिजली का तार गिरने की अफवाह फैला दी. चश्मदीदों के मुताबिक जिस वक्त भगदड़ मची उस वक्त गांधी मैदान का सिर्फ एक गेट ही खुला था और एक्जीबिशन रोड पर काफी भीड़ थी.

तीन दशक पहले केरल में ऐसा ही हादसा हुआ था. १९८६ में केरल के थलासेरी स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर में उत्सव का कार्यक्रम था. मध्य रात्रि में लोग रेलवे ट्रैक पर आतिशबाजी का मजा ले रहे थे तभी एक एक्सप्रेस ट्रेन आई और लोगों को रौंदती हुई निकल गयी. इस हादसे में भी २६ लोगों की जान चली गयी थी.

भारत में बड़े धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ की घटनाएं अक्सर होती रही हैं.
आइये कुछ आंकडे देखते हैं, जो अंतर्जाल से लिए गए हैं.

1986 – हरिद्वार में एक धार्मिक आयोजन के दौरान भगदड़ में 50 लोगों की मौत हो गई.
१९८८ में जमशेदपुर में भी विजयादशमी के दिन भगदड़ मची थी और कई लोग मारे गए थे. उसके बाद जमशेदपुर में भगदड़ का इतिहास नहीं है. यहाँ के प्रशासन और अनुशासित नागरिकों ने भी सबक ले लिया.
08-11-2011 – हरिद्वार में हुई एक भगदड़ के दौरान कम से कम 16 लोग मारे गए और 40 जख्मी हुए.

14-01-2012 – मध्यप्रदेश के रतलाम में शहीदे कर्बला के 40 वें दिन हुए धार्मिक आयोजन के दौरान अचानक भगदड़ में 12 लोगों की मौत हो गई

20-02-2012 – गुजरात में भगदड़, 6 लोगों की मौत गुजरात के जूनागढ़ में आयोजित शिवरात्रि मेले में रविवार रात हुई भगदड़ में 6 लोगों …

24-09-2012 … देवघर में अनुकूल चन्द्र ठाकुर की 125वीं जयंती पर सत्संग आश्रम में आयोजित समारोह में भगदड़ मे कम से कम 9 यात्रियों की मृत्यु और अनेक के घायल होने की घटना
11-02-2013 – बारह वर्षों में होने वाले कुंभ मेले में कल रविवार को मौनी अमावस्याम के दिन इलाहाबाद के रेलवे स्टे़शन पर भगदड़ मच जाने से लगभग 36 लोगों की मौत हो गयी।
26 अगस्त 2014 … मथुरा के बरसाना और देवघर के श्री ठाकुर आश्रम में मची भगदड़ से लगभग एक दर्जन श्रद्धालु मारे गए थे।

दिक्कत यह है कि ऐसी घटनाएं होने के बाद भी न धार्मिक आयोजनों के आयोजक और न ही स्थानीय प्रशासन सावधान रहता है। स्थानीय प्रशासन इसलिए इन आयोजनों में हस्तक्षेप नहीं करता, क्योंकि इससे धार्मिक भावनाएं भड़कने का खतरा होता है। इनके आयोजकों में भी इसलिए लापरवाही होती है, क्योंकि वे जानते हैं कि धार्मिक आयोजन होने के नाते वे काफी छूट ले सकते हैं। कम ही धार्मिक प्रतिष्ठान हैं, जो आम लोगों की सुविधा और सुरक्षा के नजरिये से योजनाबद्ध तरीके से आयोजन करते हों।
आजकल अन्धानुकरण भी काफी बढ़ गया है, सभी लोग इन धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर अपने पाप धो डालना चाहते हैं या पुण्य कमाकर सीधे स्वर्ग जाने की कामना रखते हैं. इसमे किसी को भी जरा सा धैर्य नहीं होता. आखिर हम सब विकसित होकर क्या सीख रहे हैं. आस्था होना अलग बात है और अन्धानुकरण अलग. हमें इनमे फर्क करना सीखना होगा. खासकर इन दुर्घटनाओं में बच्चे और महिलाएं ही ज्यादा हताहत होते हैं कम से कम उन्हें तो इस भीड़-भाड़ से बचाए जाने की कोशिश की जानी चाहिए. जांच होगी राजनीति भी होगी. मुआवजा भी मिलेगा, पर जिन्दगी वापस नहीं मिलेगी. हम सब मृत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना ही कर सकते हैं. हम सभी को अन्धानुकरण और भीड़-भाड़ से बचने की हरसंभव कोशिश करनी चाहिए. आजकल सभी कार्यक्रमों की रिकॉर्डिंग बाद में देखने को मिल जाती है फिर भीड़ का हिस्सा बनाने से क्या फायदा?

जवाहर लाल सिंह, जमशेदपुर.