मुक्तक/दोहा

दोहावली

“दोहावली”

गली छोड़ कर क्यूँ गए, ओ मेरे मन मीत
कोयल अब गाती नहीं, सुबह सुरीली गीत।।-1

दूर जा रहें हैं सभी, जैसे जूनी रीत।
गाँव छोड़ कर बस रहे, शहर अनोखी प्रीत।।-2

सुना रहे हैं अब सभी, अपने मन की गीत।
मानों ओझल हो गई, लोक प्रीत संगीत।।-3

बूढ़ी दादी की कथा, अरु चौपाली हीत।
शंकित लगती चाल है, दम्भित लगते मीत।।-4

फैशन में सब कर रहे, अपने घर को तीत।
वरना मीठी ही लगे, मैना मुँह संगीत।।-5

क्यों कोई आता नहीं, दोहा करने मीत।
भला अकेला क्या करूँ, किसे सुनाऊँ गीत।।-6

मान और सम्मान सब, दिया तुम्हें मनमीत।
फिर भी तुम आते नहीं, मिलकर गाने गीत।।-7

सुंदर-सुंदर शब्द हैं, सुंदर दोहा गीत।
दे दो अपना प्यार तो, बन जाए संगीत।।-8

बहुत सुहानी शाम है, बहुत पुरानी रीत।
मिलकर गाते हैं सभी, कीर्तन प्रभु संगीत।।-9

फागुन के प्रिय माह में, सुनी फागुनी गीत।
रंग भंग अरु ताल में, लाल रंग संगीत।।-10

कलम कबीरा धन्य है, लिख्खे बात पुनीत।।
राह दिखाती आज भी, मनमोहक संगीत।।-11

महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी

*महातम मिश्र

शीर्षक- महातम मिश्रा के मन की आवाज जन्म तारीख- नौ दिसंबर उन्नीस सौ अट्ठावन जन्म भूमी- ग्राम- भरसी, गोरखपुर, उ.प्र. हाल- अहमदाबाद में भारत सरकार में सेवारत हूँ