गीत/नवगीत

अंगार सुनाता हूँ!!

मैंने भी श्यामल ज़ुल्फों में, अपनी शाम गुजारी है
मैंने भी रस भरे लबों पर, अपनी ग़ज़लें वारी हैं
मैं भी तो गोदी में रखकर, सिर को अपने सोया हूँ
झीलों-से गहरे नैनों में, मीठी नींदें खोया हूँ
लेकिन उस दिन, मेरे मन ने भी प्रश्न उठाए थे
जिनको सुनकर, मेरे गीतों के तेवर बल खाए थे
आज उन्हीं प्रश्नों को लेकर द्वार तुम्हारे आया हूँ
अपने दिल के छालों को अंगार बनाकर लाया हूँ
पतझड़ के मौसम में कैसे, मैं बहार के गीत लिखूँ?
हो खलिहान पटा लाशों से, और सिंगार के गीत लिखूँ?
माटी के सौंधेपन से जब, खूँ की बदबू आती हो
जब मानवता के आँगन में, दानवता मुसकाती हो
तब भावों के शोलों से मैं, ज्वालामुखी बनता हूँ
बहुत गा चुका गीत प्यार के, अब अंगार सुनाता हूँ।

जब भारत का नंदनवन, गोली से छलनी होता है
तनी खड़ी संगीने फिर भी, लज्जित झंडा होता है
राष्ट्र-वंदना जब मजहब की, कठपुतली हो जाती है
जहाँ कौम भारत माँ को, माँ कहने से घबराती हो
केसर की वादी में जब, बारूदी फसल उगाते हैं
आतंकी कुत्तों के आगे, जब नेता झुक जाते हैं
जब आहें वीरों की संसद के भीतर घुट जाती हो
और दरिंदों की फाँसी भी, लाचारी बन जाती हो
जब रावण के वंशज काराघर में, जश्न मनाते हैं
बम विस्फोटों के बंधक भी, सेना नयी बनाते हैं
रणधीरों के पौरुष पर जब प्रश्न उठाया जाता है
सेना के बलिदानों का माखौल बनाया जाता हो
छोड़ बाँसुरी, पांचजन्य का मैं जयघोष सुनाता हूँ
बहुत गा चुका गीत प्यार के, अब अंगार सुनाता हूँ।

भाई-भाई चीनी-हिन्दी, सुन घाटी मुसकाई थी
था हाथों में फूल मगर, बगलों में छुरी छुपाई थी
सात दशक पहले ऐसे ही चीनी-मिसरी घोली थी
इस गौतम के आँगन पर, चली चीन की गोली थी
बुझे दीप घर-आँगन के थे, खाली माँ की झोली थी
दीवाली की रातें थीं, पर घर-घर जलती होली थी
सन् बासठ का मुझको फिर वो, शोर सुनाई देता है
टूटते विश्वासों का फिर से, दौर दिखाई देता है
ऐसा ना हो फिर से चीनी, हमको ये छल जाएँ ना?
जीभ हमारी कहीं छाछ फिर,पीते ही जल जाएँ ना!
सस्ते बाजारों के धोखे में, कहीं तीर चल जाएँ ना
स्वर्ण-हिरण के लालच में, रगड़ हाथ रह जाएँ ना
जब व्यापारी सूरत में, चीनी रावण को पाता हूँ
बहुत गा चुका गीत प्यार के, तब अंगार सुनाता हूँ।

अपनी लेखनियों को फिर से, खंजर और तलवार करो
देश के अंदर छिपे हुए, दुश्मन के दिल पर वार करो
बहुत सह चुके अब तो गद्दारों का अंत ज़रूरी है
देश के पहरेदारों जागो, जगना बहुत ज़रूरी है
तुम सोए तो कहो देश को कौन जगाने आएगा?
फिर गांडीव धनंजय के हाथों में कौन थमाएगा?
बजरंगी के सोए पौरुष को फिर कौन जगाएगा?
शांत पड़े शोलों के उर में, कौन ज्वाल धधकाएगा?
इसीलिए मैं चिंगारी शब्दों में बाँधे लाया हूँ
तिलक शहीदों की भस्मों का, तुम्हें लगाने आया हूँ
राष्ट्रध्वजा से जो ऊँची, मजहब की ध्वजा बताते हैं
हम ऐसे भूले-भटकों को, राष्ट्र-धर्म समझाते हैं
मैं वंशज चाणक्य वंश का, तुमको आज जगाता हूँ
बहुत गा चुका गीत प्यार के, अब अंगार सुनाता हूँ।

शरद सुनेरी