दृढ़ता – भाग 1

” दृढ़ता ”

विवेक दिल्ली के AIIMS से ऑर्थोपेडिक सर्जन की पढ़ाई पूरी करके घर लौटा है। वह मन ही मन बहुत खुश था कि वह अब डॉक्टर बन गया है। उसके मन में परिवार से मिलने की खुशी भी शामिल थी।
विवेक अपने परिवार के साथ नाश्ता कर रहा था और नाश्ता करते करते उसके पिता ने पूछा…..”आगे क्या करने का इरादा है बेटा। कहीं नौकरी करनी है या फिर अपना क्लिनिक खोलना है अपने शहर में। तुमने कुछ सोचा है?”
“हां पापा….. अपने शहर में एक क्लीनिक खोलने का मन है मेरा ताकि अपने शहर के लोगों की सहायता कर सकूं । और फिर मुझे अपने शहर से लगाव भी है।”…
पापा और बेटे में बातचीत चली रही थी कि अचानक दरवाजे पर घंटी बजी।
“देख ना बेटा कौन आया है।”… मि.सिंघल ने अपने बेटे से कहा।
“नमस्ते अंकल! हाय सुजाता! कैसे हैं आप लोग।आईए अंदर आ जाईए।”… मिस्टर कपूर और सुजाता को देख कर विवेक ने विनम्रता से कहा।
“कैसे हो विवेक…… बहुत-बहुत बधाई तुम्हें बेटा! अब तुम डॉक्टर बन गए हो जानकर बहुत खुशी हुई। तुमसे मिलने की इच्छा हुई तो मिलने चला आया।”… मिस्टर कपूर ने कहा।

मि. कपूर और मि. सिंघल दोनों पड़ोसी है। मि.सिंघल का बेटा है विवेक । दोनों परिवारों के बीच में मित्रता का संबंध है। एक दूसरे का सुख दुख बांट लिया करते हैं। मि. कपूर की बेटी सुजाता को 4 साल की उम्र में पोलियो हो गया था जिस कारण उसकी दोनो टांगे कमजोर हो गई है। वह लंगड़ा लंगड़ा कर चलती है पर चेहरे से बहुत खूबसूरत है। और बहुत प्रतिभाशाली है। साहस मन में कूट कूट कर भरा हुआ है।कभी भी किसी कठिनाई से आसानी से हार नहीं मानती। बहुत दृढ़निश्चय वाली लड़की है, एक बार जो ठान लेती है उसे करके ही दम लेती है।

“आइए बैठिए, कैसे हैं आप लोग। सुजाता बेटा क्या हाल-चाल है तुम्हारा।”…. दोनों का स्वागत करते हुए मिस्टर सिंघल ने कहा।
“कैसे हैं आप सब। सब कुछ कैसा चल रहा है। अब तो विवेक डॉक्टर बन गया है जानकर बड़ी खुशी हुई।”… मिस्टर कपूर ने, मिस्टर सिंघल से हाथ मिलाते हुए कहा।
” आप सुनाइए आप लोगों का सब कुछ कैसा चल रहा है। सुजाता बेटी कैसी है।”… मिस्टर सिंघल ने पूछा।
“ठीक ही है सब कुछ पर… सुजाता की चिंता लगी रहती है”… मिस्टर कपूर के चेहरे पर चिंता की लकीरें थी।
“आप चिंता ना करें अंकल।आप कहे तो मैं एक बार सुजाता की जांच कर लेता हूं।”… विवेक ने विनम्रता से कहा।
“क्यों नहीं…. यह तो बहुत अच्छी बात है। लो.. विवेक, आज से तुम्हारा प्रैक्टिस शुरू हो गया। हम पड़ोसी हैं, हमें एक दूसरे की मदद तो करनी ही चाहिए।”… मिस्टर सिंघल ने उत्साहित होते हुए कहा। और क्यों ना हो… बेटा जो डॉक्टर बन गया था।

“आओ सुजाता तुम्हारी जांच कर लेते हैं, तब तक पापा और अंकल एक दूसरे का हाल-चाल पूछ लेंगे।”.. विवेक ने कहा।
“क्या तुम्हें अब भी उतनी ही तकलीफ होती है चलने में जितनी बचपन में हुआ करती थी।”… विवेक ने सुजाता से पूछा।
“बचपन का तो याद नहीं है पर हां चलने में तकलीफ तो होती है। वह आप स्वयं ही समझ सकते हैं। आप अब डॉक्टर बन गए हैं।”….. सुजाता ने उदास होकर कहा।
“यह क्या आप आप लगा रखी है तुमने। मैं क्या कोई पराया हूं या कोई अजनबी। जैसे तुमने मुझे कभी देखा ही नहीं। बचपन से एक दूसरे के साथ खेलते हुए बड़े हुए हैं।”… विवेक ने थोड़ा सा चिढ़ने का नाटक करते हुए कहा।
“अब आप डॉक्टर बन गए हैं। बचपन तो बचपन था। अब हम दोनों बड़े हो गए। मुझे एक डॉक्टर का सम्मान तो करना ही चाहिए।”…. सुजाता ने शालीनता से कहा।
“तुम क्या कर रही हो आजकल? इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी हो गई है क्या तुम्हारी? आगे क्या करने का इरादा है?”… एक साथ कई सवाल दाग दिए विवेक ने।
“लास्ट सेमेस्टर चल रहा है, वैसे मैंने बैंक पी. ओ. का एग्जाम भी दिया है। अगले महीने रिजल्ट आने वाला है। देखते हैं नसीब कहां ले जाता है।”… सुजाता ने जवाब दिया।
“नसीब अच्छा है और अच्छा ही होगा।चलो…सब कुछ सही है, बस हिम्मत रखने की जरूरत है। कुछ गोलियां लिख देता हूं खाते रहना, सब ठीक हो जाएगा।…. विवेक ने सुजाता को हिम्मत देते हुए कहा। और मन ही मन सोच रहा था कि…”तुम्हें पता नहीं है सुजाता कि तुम्हारी इतनी तकलीफ को देख कर ही मैंने ठान लिया था कि मुझे एक दिन र्ऑर्थोपेडिक सर्जन बनना है ताकि मैं तुम्हारा इलाज ठीक से कर सकूं।”
सुजाता विवेक से 2 साल छोटी थी। जब वह पोलियो ग्रस्त हो गई थी तब विवेक 6 साल का था। उसे बहुत दुख हुआ था कि सुजाता चल नहीं पाती थी। उसके साथ खेल भी नहीं पाती थी। बचपन से ही विवेक को सुजाता बहुत अच्छी लगती थी। युवावस्था में आने के पश्चात मन ही मन कब वह सुजाता से प्यार करने लगा उसे स्वयं ही नहीं पता। पर…. यह बात उसने राज ही रखी। सुजाता अपने जीवन के संघर्ष में बहुत व्यस्त हो गई थी।पर… जब कभी फुर्सत का क्षण होता तो उसे बचपन की बातें याद आती और विवेक के बारे में सोचने लग जाती….जब मुझे पोलियो हो गया था और मैं चल नहीं पाती थी तो विवेक आकर मेरे पास खड़ा रहता था और कभी-कभी तो रोने लगता था। कहता था…”तुम जल्दी ठीक हो जाओ सुजाता। तुम्हारे साथ खेलना है, तुम्हारे बिना खेलने में मजा ही नहीं आता।”… सुजाता की आंखें नम हो जाती है बचपन की बातें सोचकर।
विवेक का व्यक्तित्व उसे अच्छा लगता है। वह एक अच्छा इंसान हैं। और…. कभी मन पंख लगा कर सपनों की दुनिया में उड़ने लगता। वह सोचती कि….”विवेक जैसा हमसफर जीवन में मिल जाए तो इंसान क्या नहीं कर सकता? पर… वह जानती थी यह संभव नहीं हो सकता। विवेक का व्यक्तित्व बहुत आकर्षक है, वह एक सफल डॉक्टर है और वो ठहरी….।”… एक ठंडी आह भर कर वह सपनों की दुनिया से जल्दी वापस आ जाती।

विवेक का क्लीनिक अच्छा चल पड़ा था। धीरे धीरे चारों ओर उसका नाम एक कुशल ऑर्थोपेडिक सर्जन के रूप में जाना जाने लगा। सुजाता का चयन भी बैंक पी ओ में हो गया था और वर्तमान में वह शहर में ही पदस्थ थी । सुजाता का चिकित्सकीय जिम्मेदारी अब विवेक ने ले रखी थी।
कुछ दिनों से विवेक इस उलझन में था कि वह पापा से बातों की शुरुआत कैसे करें। पर आज उसने साहस कर ही लिया और पापा से कहा….”पापा मुझे आपसे कुछ बात करनी है…, सुजाता के बारे में।”
पापा ने सोचा शायद सुजाता के स्वास्थ्य के बारे में कुछ बातें करेगा विवेक, इसलिए सहजता से पूछा….”क्या बात कहना है कहो… सुजाता कोई पराई तो नहीं है।”
विवेक का मन थोड़ा हल्का हुआ फिर कहा….”पापा.. मैं…सुजाता से शादी करना चाहता हूं। बचपन से ही वह मुझे अच्छी लगती है। और बड़े होने के बाद मुझे यह पता चला कि मैं उससे प्यार करने लगा हूं। किसी से कुछ नहीं कहा। मैंने सोचा जब मैं इस लायक बन जाऊंगा कि शादी कर सकूं उससे, तब आपसे बात करूंगा।”
मिस्टर सिंघल की आंखें फटी की फटी रह गई और आश्चर्यचकित होकर कहां…”यह कैसे संभव होगा बेटा…उसके साथ… जीवन कैसे काटोगे तुम? और फिर तुम्हारे साथ कोई तालमेल भी नहीं है। तुम्हारा व्यक्तित्व अलग है उसका अलग है। नहीं… नहीं… यह कैसे संभव होगा?”मि.सिंघल की बातों में थोड़ी सक्ति सी आ गई थी।
“क्यों नहीं पापा, वह सुंदर है, प्रतिभाशाली है, सक्षम है और सबसे बड़ी बात यह है कि मैं उससे प्यार करता हूं। आप ही कहा करते थे कि पड़ोसी के सुख दुख में पड़ोसी को काम आना चाहिए। इससे अच्छा मौका शायद जीवन में दोबारा नहीं आएगा। एक लड़की की जिंदगी संवर जाए, क्या आप नहीं चाहते? अगर सुजाता की जगह पर मैं होता तब आप क्या करते?”….. विवेक ने थोड़ी दृढ़ता से कहा।
विवेक की बातों में दम था। उसके पापा सोचने पर मजबूर हो गए और मन ही मन सोचने लग गए कि सच ही तो कह रहा है विवेक। बेटे की सकारात्मक सोच के सामने पापा की सख्ती नरमी में बदल गई और अपने बेटे पर उन्हें गर्व होने लगा।
“आज तुमने मुझे एक पाप करने से बचा लिया बेटा…. मुझे तुम पर गर्व है कि तुम मेरे बेटे हो।”…. मिस्टर सिंघल ने अपने बेटे से कहा।
“तो… क्या… आप तैयार है पापा”…. विवेक आशा भरी निगाहों से पापा की ओर देख रहा था।
“हां……!!!”…. और बेटे को गले से लगा लिया।

पूर्णतः मौलिक-ज्योत्स्ना पाॅल।

परिचय - ज्योत्स्ना पाॅल

भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त भोपाल (म.प्र.) ईमेल - paul.jyotsna@gmail.com