ईशनिंदा : वीर हकीकत राय से आसिया बीबी तक

मुझे नहीं पता पाकिस्तान में आसिया बीबी ने अपने जीवन के लगभग 8 वर्ष जेल में कैसे बिताए होंगे, वो भी उस अपराध में जिसका उसे पता भी नहीं। आखिर क्यों एक ग्यारह साल की बच्ची को मौत देने के लिए 80 वर्ष के मौलवी यह कहकर आमादा हुए जा रहे हैं कि आसिया ने पैगंबर मोहम्मद का अपमान किया था इसलिए उसे मौत की सज़ा सुनाई गई।

पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने ईसाई महिला आसिया बीबी को ईशनिंदा के मामले में बरी कर दिया है। इससे पहले निचली अदालत और फिर हाईकोर्ट ने इस मामले में आसिया बीबी को मौत की सज़ा सुनाई थी।

अदालत का यह फैसला आते ही एक तरफ दुनियाभर में इसे “न्याय की मिसाल” करार दिया गया, वहीं दूसरी तरफ कट्टरपंथी इसके विरोध में सड़कों पर उतर आए हैं और मरने-मारने की बात कर रहे हैं। कट्टरपंथी धमकी दे रहे हैं कि जब तक आसिया बीबी को फांसी पर नहीं चढ़ाया जाएगा, वे सड़कों से नहीं हटेंगे। मसलन मज़हब और पैगंबर के कथित ठेकेदारों के मन में शांति तब आएगी जब एक निर्दोष बच्ची को मौत दे दी जायेगी।

यह बिलकुल वैसा ही है जैसा आज से बहुत साल पहले 1734 में वीर हकीकत राय के साथ हुआ था। मुसलमान छात्रों द्वारा हिन्दू देवी देवताओं को अपशब्द कहे जाने पर बालक हकीकत इसका विरोध किया करता था। एक दिन मौलवी की अनुपस्थिति में मुस्लिम छात्रों ने हकीकत राय को खूब मारा पीटा। बाद में मौलवी के आने पर उन्होंने हकीकत की शिकायत कर दी कि इसने बीबी फातिमा को गाली दी है।

हकीकत ने अपना पक्ष भी रखा लेकिन काज़ी ने बाकि लड़कों की बात को सही माना और अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि शरीयत के अनुसार इसके लिये मृत्युदण्ड है या बालक मुसलमान बन जाये। हकीकत ने इस्लाम स्वीकार करने से इनकार कर दिया और उसे फांसी पर चढ़ा दिया गया।

क्या है आसिया का मामला-

आसिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। 14 जून 2009 को उसने कुएं से पानी पिया था। उसके ऊपर ईशनिंदा के आरोप उसके पड़ोसियों की शिकायत पर दर्ज किए गए। ये पड़ोसी खासकर इस बात से खफा थे कि उसने गैर मुसलमान होते हुए उनके गिलास से पानी क्यों पिया। शुरू में बर्तन को अशुद्ध करने का आरोप लगाया गया और बाद में पैगंबर मोहम्मद की निंदा का। इसके बाद उसे इस पाप से मुक्ति के लिए इस्लाम स्वीकार करने को कहा गया। जब वह अपने धर्म पर अडिग रही तो उसे भी मौत की सज़ा सुना दी गई।

आसिया ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि उसकी एक गिलास पानी की प्यास उसकी मौत का कारण बन जाएगी। आज भले ही आसिया को अदालत ने छोड़ दिया हो लेकिन अभी खतरा बरकरार है क्योंकि अब्दुल वली खान यूनिवर्सिटी के छात्र मशाल खान को ईशनिंदा के आरोप में बिना अदालत के पचड़े में पड़े सैकड़ों लोगों ने मिलकर मौत की नींद सुला दिया था।

ईशनिंदा की वजह से कई लोगों की ली जा चुकी है जान- 

राशिद रहमान एक जाने माने मानवाधिकार वकील थे। रहमान उन चुनिंदा वकीलों में शामिल थे जो ईशनिंदा का आरोप झेल रहे लोगों का केस लड़ते थे। 8 मई, 2014 को दो बंदूकधारियों ने राशिद रहमान के ही ऑफिस में उनकी हत्या कर दी थी। हत्या के बाद मुल्तान शहर की अदालत परिसर में वकीलों के चेंबरों के पास पर्चे बांटे गए, जिनमें लिखा था “ईशनिंदा” करने वालों की रक्षा करने वाले राशिद का अंत हुआ।

इसी दौरान जुलाई में अहमदियों के साथ एक हिंसक घटना हुई। क्रिकेट के मैदान से शुरू हुए झगड़े के बाद एक अहमदिया युवा पर ईशनिंदा का आरोप लगा दिया गया। इसके बाद उग्र भीड़ ने करीब एक दर्जन अहमदियों के घरों में आग लगा दी। इस हमले में एक ही परिवार के तीन लोगों की जान चली गई।

कुछ समय पहले एक ईसाई अयूब मसीह साइकिल में पंचर लगाने का काम करता था। एक आदमी के साथ पंचर के पैसों को लेकर उसकी तकरार हुई। उस आदमी ने शोर मचा दिया कि देखो पैगम्बर का अपमान कर दिया। भीड़ ने पकड़कर उसे मारना शुरू कर दिया।

एक और मामले में पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में रहने वाले ईसाई दंपति शमा और शहजाद मसीह को कुरान जलाने के आरोप में ज़िंदा जला दिया गया था। इनके खिलाफ झूठी खबर फैला दी गई थी कि वे कुरान के पन्नों को जला रहें। इस खबर के फैलते ही मौलवियों ने मस्जिद से सज़ा का ऐलान कर दिया और इस ईसाई दंपति को ज़िंदा जला दिया गया। शायद यही कारण रहा है कि जिस पाकिस्तान के शहरों में कभी अल्पसंख्यकों की संख्या 15 फीसदी तक थी, अब यह घटकर चार फीसदी ही रह गई है।

बात आम नागरिकों तक सीमित नहीं है, कुरान को अपवित्र करने के मामलों में यहां की भीड़ हिंसक होकर ईशनिंदा करने वाले को मार डालती है। इस कानून में बदलाव की मांग करने वाले नेताओं को अपनी मौत से इसका खामियाज़ा भुगतना पड़ा है। वह चाहे अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री शहबाज भट्टी हों या फिर पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर।

कौन भूला होगा कि एक मौलवी मुमताज कादरी के उस बयान के बाद सलमान तासीर को कफन पहनाया गया, जिसमें मौलवी ने कहा था कि ईशनिंदा कानून में सुधार की बात करने वाले सलमान तासीर जैसे लोगों का “वजिबुल कत्ल” यानी उनकी हत्या की जानी चाहिए।

जब किसी पर अपना वश ना चले और उसे रास्ते से हटाना हो तो मज़हब सबसे बेहतरीन हथियार है, इसमें समाज से लेकर सरकार तक सब आपके साथ खड़े मिलेंगे। यदि कोई बीच में बोले तो उसे मज़हब द्रोही काफिर कहकर ऐसी फटकार लगाओ कि उसकी अगली पीढ़ी सच के सामने खड़े होने का साहस ना कर सके।

जब कोई देश किसी धर्म को लेकर किसी वाजिब आधार पर सवाल करने का अधिकार छीन लेता है तो वह देश नहीं बल्कि कबीला हो जाता है। पाकिस्तान के रहनुमाओं को यदि वास्तव में अपने अल्पसंख्यक लोगों की चिंता है तो तुरंत पहचान करें कि कौन लोग हैं, जो मज़हब के नाम पर दूसरों का कत्ल करने पर आमादा हैं? आखिर कौन लोग हैं जो मज़हब की ठेकेदारी की तख्तियां गले में लटकाएं घूम रहे हैं। जब ईश्वर या अल्लाह को मानने का अधिकार बराबर है तो सज़ा का निर्णय भी उसी परमशक्ति पर छोड़ दिया जाये। आखिर मज़हब के नाम पर कट्टरपंथी लोग निर्णय लेकर किसी के खून के प्यासे क्यों  रहे हैं?

.. राजीव चौधरी

 

परिचय - राजीव चौधरी

स्वतन्त्र लेखन के साथ आर्य सन्देश दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा के मुखतपत्र समेत, दैनिक जागरण, नवभारत टाइम्स के लिए ब्लॉग