वो जब से लौट आए से मेरे शहर में


वो जब से लौट आए से मेरे शहर में
दिन में ईद,रात में दिवाली हो गई है

उनके आने की खबर की ये तासीर है
खेत-खलिहान,नदी,पर्वतों में खुशहाली हो गई है

वो जो निकले हैं सँवर के मेरे छत पे
तो अमावस भी तारों वाली हो गई है

अपने होंठों से जो चूमा उन्होनें हवाओं को तो
आसमाँ के गालों पे हया की लाली हो गई है

तुम आई हो तो ये बरसातें भी लौट आई हैं
तुम्हें सराबोर करने को मतवाली हो गई हैं

शायद रब को भी था तुम्हारे आने का इंतज़ार ,तभी
मंदिरों में आरती और मस्जिद में कव्वाली हो गई है

सलिल सरोज

परिचय - सलिल सरोज

जन्म: 3 मार्च,1987,बेगूसराय जिले के नौलागढ़ गाँव में(बिहार)। शिक्षा: आरंभिक शिक्षा सैनिक स्कूल, तिलैया, कोडरमा,झारखंड से। जी.डी. कॉलेज,बेगूसराय, बिहार (इग्नू)से अंग्रेजी में बी.ए(2007),जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय , नई दिल्ली से रूसी भाषा में बी.ए(2011), जीजस एन्ड मेरी कॉलेज,चाणक्यपुरी(इग्नू)से समाजशास्त्र में एम.ए(2015)। प्रयास: Remember Complete Dictionary का सह-अनुवादन,Splendid World Infermatica Study का सह-सम्पादन, स्थानीय पत्रिका"कोशिश" का संपादन एवं प्रकाशन, "मित्र-मधुर"पत्रिका में कविताओं का चुनाव। सम्प्रति: सामाजिक मुद्दों पर स्वतंत्र विचार एवं ज्वलन्त विषयों पर पैनी नज़र। सोशल मीडिया पर साहित्यिक धरोहर को जीवित रखने की अनवरत कोशिश। पता- B 302 तीसरी मंजिल सिग्नेचर व्यू अपार्टमेंट मुखर्जी नगर नई दिल्ली-110009 ईमेल : salilmumtaz@gmail.com