रीत बदलनी चाहिए

”ममा, आपने समाचार पत्र की यह सुर्खी देखी क्या?” विनय ने एक नजर समाचार पत्र और दूसरी नजर से खिड़की के शीशे से भयंकर स्मॉग की चादर में लिपटी हुई दिल्ली को देखते हुए कहा.
”कौन सी?” ममी ने किचन से आते हुए कहा.
”ममा, ये देखो- ‘दिल्ली का घुटता हुआ दम’ तथा ”ग्रीन दिवाली की अपील धुआं, हर तरफ पलूशन’ विनय ने सचित्र समाचार दिखाते हुए कहा.
”बेटा, सरकार और सुप्रीम कोर्ट तो बहुत कुछ कहती है, पर मानने वाले भी तो हों न!”
”ममा, हम लोग अपना भला-बुरा भी क्यों नहीं सोच सकते? हम सब लड़कों ने मिलकर सोसाइटी के प्रेसीडेंट को पटाखे न जलाने के लिए कहा था, सो हमारी सोसाइटी में तो सामूहिक आतिशबाजी नहीं हुई, बाकी तो शोर-शराबे का अंत ही नहीं था. देखो क्या खबर लिखी है!- ‘सुप्रीम कोर्ट की ग्रीन पटाखों की अपील पूरी तरह धुआं हो गई और हर जगह पसरा है तो सिर्फ प्रदूषण.’ बहुत बुरी बात है.” विनय रुआंसा-सा हो गया था.
”सो तो है बेटा, कान भी फट रहे थे.” ममा के कानों में अब भी वह गूंज बाकी थी.
”ममा, हमें भी प्रेम अंकल की तरह करना चाहिए. वे आपस में 6 भाई हैं. दिवाली से 2-3 हफ्ते पहले से हर रविवार को किसी-न-किसी भाई के घर दिवाली मनती है. दिवाली के दिन सब अपने घर पूजा करते हैं. इस प्रकार उनके घर दिवाली-मिलन भी हो जाता है और दिवाली के दिनों में उनकी कारों का न प्रदूषण फैलता है, न वे ट्रैफिक जाम में फंसते हैं. कितनी समझदारी से काम लेते हैं न वे!”
”सही कह रहे हो विनय, वे दिवाली के नाम पर उपहार का लेन-देन भी वे नहीं करते. उनका मानना है- मिलो-मिलाओ, खाओ-खिलाओ, मौज करो, दिवाली मनाओ. लेन-देन में समय और धन की बर्बादी तो होती है, सबके घरों में व्यर्थ की चीजें एकत्रित हो जाती हैं, ऊपर से गिले-शिकवे अलग, कि हमने इतने का दिया, उसने उतने का दिया, हमारी पसंद की चीज नहीं है, आदे-आदि.”
”ममा हमने कल स्कूल में कवि दुष्यंत कुमार की कविता पढ़ी थी-
”हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए”
मेरा मानना है-
”दिल्ली में छाई धुंध की मोटी चादर, अब तो आंख खुलनी चाहिए,
जान पर बन आई अब तो, पटाखों और लेन-देन की रीत बदलनी चाहिए.”
”वाह बेटा विनय, क्या पते की बात कही है! हम भी सबसे त्योहारों को ऐसे ही मनाने की अपील करेंगे.” पापा ने दूसरे कमरे से उसकी बात सुन ली थी.
”हम सबसे दीये जलाने की अपील भी करेंगे, ताकि हमारी स्वस्थ परंपरा भी बनी रहे और बिजली की खपत भी सीमित हो.” यह बड़ी बहिन अमृता की आवाज थी.
पूरा परिवार रीत बदलनी चाहिए के शुभ संकल्प की डोर में बंध गया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।