चाक

”यह चित्र तो देखो, लगता है अभी बोल पड़ेगा!” कुम्हार के चलते चाक पर प्यार से गीली मिट्टी पर थपकी देते हुए हाथों वाले चित्र को देखते हुए निर्णायक मंडल के एक सदस्य ने कहा.
”बात तो बिलकुल सही कह रहे हो.” चित्र को ध्यान से देखते हुए दूसरे सदस्य ने कहा.
”सामान्य-से इस चित्र में दार्शनिकता का पुट भी है, तो आध्यामिकता का अंदाज भी और सृजन का संकेतक तो है ही.” तीसरे सदस्य का कहना था.
”रंगों का चयन भी तो देखो, खूबसूरती मानो छलक रही है!”
”यही तो श्रेष्ठ सृजन का सार है.”
”इस सृजन का सृजनहार कैसा होगा!” दार्शनिक आंखें चमक रही थीं.
”बिलकुल सृष्टि के सृजनहार जैसा, जिसके हर सृजन में सौंदर्य का सागर है.” आध्यात्मिकता उजागर हो रही थी.

”हर उत्सव-त्योहार इसी चाक के सृजन से मूर्तिमान होता है और रोशन भी.”
”यानी सृजन और रोशनी का मेल!”
”सृजन, प्रकाश और जीवंतता विजेता होती है.”
चित्रकार के इन्हीं संवेगों को सम्मानित किया गया था.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।