संयोग पर संयोग-5

सुदर्शन खन्ना से मुलाकात
संयोग पर संयोग की इस कड़ी में हम आपकी मुलाकात सुदर्शन खन्ना से करवा रहे हैं. आगे चलने से पहले हम आपको बताना चाहते हैं, कि ”संयोग कैसे-कैसे!” ब्लॉग हमारे पाठक-कामेंटेटर सुदर्शन खन्ना द्वारा भेजे गए संदेशों से ही सृजित हो पाया था. फिर हमें प्रोत्साहित करने को उन्होंने लिखा-

”संयोग..क्या ज़बरदस्त श्रंखलात्मक शीर्षक खोजा है. आप ही इसकी प्रणेता रहेंगी.”

बस इसी से इस श्रंखला ”संयोग पर संयोग” को आगे बढ़ने का रास्ता मिला और आज के हमारे विशेष कलाकार हैं- सुदर्शन खन्ना. सुदर्शन खन्ना के दो रूप हैं- पहला ब्लॉगर का, दूसरा पाठक-कामेंटेटर का. सुदर्शन खन्ना अपने दोनों रूपों में शिखर तक पहुंच गए हैं. पहले हम उनके ब्लॉगर रूप को ही देखेंगे. यहां हम आपको बता देना चाहते हैं, कि उनका कार्य इतना महान है, कि हम आपको उसकी केवल एक झलक ही दिखा पाएंगे.

संयोग से ही इनसे हमारी मुलाकात हो पाई. सुदर्शन खन्ना, जो 21 जुलाई को अपना ब्लॉग पर आए और आते ही अपना ब्लॉग जगत पर छा गए. उनका एक-एक ब्लॉग साहित्यिक तो होता ही है, साथ ही इतना अनुपम, अप्रतिम और नायाब होता है, कि उनके ब्लॉग ‘मैं ऐसा क्यों हूँ’ पर छोटी, गागर में सागर जैसी प्रतिक्रिया के शहनशाह नवीन भाई ने लिखा है-

”एक बार फिर से आपने अपनी कलम से बाँध लिया. छोटी छोटी घटनाओं को आप इतनी खूबसूरती से गूँथते हैं और फिर इन्हीं गांठों के बीच कब मन को छूते हुए आप हृदय परिवर्तन की कगार पर पहुंच जाते हैं पता ही नहीं चलता. एक बार फिर से एक और सामाजिक विकार को उजागर करने के लिये बहुत बधाई.”
हम भी हर ब्लॉग की प्रतिक्रिया पर यह लिखने में अत्यंत प्रसन्नता का अनुभव करते हैं-

”प्रिय ब्लॉगर सुदर्शन भाई जी, वाह, क्या बात है! ग़ज़ब का ब्लॉग-लेखन!”
”प्रिय ब्लॉगर सुदर्शन भाई जी, ब्लॉग-लेखन तो कोई आपसे सीखे!” आदि-आदि.

सुदर्शन भाई के अपना ब्लॉग जगत में आने पर ऐसा लगा, कि एक महान साहित्यकार से हमारी मुलाकात हो गई हो. उन्होंने अपने 4 महीने के छोटे-से समय में 100 ब्लॉग लिखे हैं. उनके ब्लॉग्स संख्या की दृष्टि से ही नहीं गुणवत्ता की दृष्टि से भी अपना ब्लॉग जगत को सुसज्जित कर एक नया आयाम दे रहे हैं.

सुदर्शन भाई के अपना ब्लॉग जगत में आते ही अनेक पाठक-कामेंटेटर्स उनसे जुड़ गए और वे नियमित रूप से उनके ब्लॉग्स पढ़ते हैं, उन पर प्रतिक्रिया करते हैं और सुदर्शन भाई भी उनकी प्रतिक्रिया को सम्मान देते हुए अत्यंत साहित्यिक प्रतिक्रियाएं देते हैं. ‘दीया बोलता है’ ब्लॉग की एक मिसाल देखिए-

”आदरणीय दीदी, सादर प्रणाम. आपकी प्रतिक्रियाएं बरसती हैं उन नन्हें ओलों की भांति जिन्हें हाथों में लपक लेने को अंजलि बन जाती है. नन्हें ओलों की मुलायम ठंडक हृदय में बस जाती है. इन सदाबहार ओलों के लिये हार्दिक धन्यवाद,”

प्रकाश मौसम भाई की दार्शनिक प्रतिक्रिया का ये दार्शनिक अंदाज में ही जवाब देते हैं,

ब्लॉग ‘सूरजमुखी का फूल’ में सुदर्शन भाई ने सूरजमुखी फूल के बारे में जो नई जानकारी दी है, वह अन्यत्र मिलना दुर्लभ है.

सुदर्शन भाई का पहला ब्लॉग ‘दरख्त’ कविता के रूप में आया-

”ऐ खुदा गुज़ारिश है तुझसे, मुझे अगली ज़िन्दगी में दरख्त ही बनाना,
क्योंकि उम्रदराज दरख्तों के साये में ज़िन्दगियां छांह पा लेती हैं,
एहसान फरामोश इंसान कभी किसी के काम आए या न आए,
दरख्त तो कटने के बाद काटने वालों के भी काम आ जाते हैं।”

फिर वक़्त और इंसान, मां, यह कैसा देश है मेरा, सोचता हूँ कुछ नया लिखूँ आदि कविताएं आईं, जो अपने में अपनी मिसाल खुद हैं. इनके हर ब्लॉग की अपनी एक अलग विशेषता के दर्शन होते हैं. आध्यात्मिकता का पुट लिए सुदर्शन भाई के सटीक, सार्थक, सकारात्मक, साहित्यिक ब्लॉग्स की इस छोटी-सी झलक के साथ हम उनके दूसरे यानी पाठक-कामेंटेटर रूप की झलक देखते हैं. इससे पहले हम आपको यह बताते चलें, कि सुदर्शन भाई के बहुत-से ब्लॉग्स सुपरहिट रह चुके हैं.
चलते-चलते एक विशेष बात- सुदर्शन भाई अपने बचपन के दिनों के समय का वर्णन भी इस प्रकार करते हैं, कि वह समय अभी हमारे सामने साकार हो उठता है. उनके लिए हमने ब्लॉग ‘सोच’ की प्रतिक्रिया में लिखा था- ”आपका ब्लॉग लेखन इतना चित्रमय होता है, कि एक जीवंत चित्र हमारे सामने प्रस्तुत कर देता है.”

हमारे ब्लॉग पर सुदर्शन भाई की सबसे पहली प्रतिक्रिया ‘इमोजी को जन्मदिन की शुभकामनाएं’ ब्लॉग पर आई थी. उनकी छोटी-सी, गागर में सागर जैसी प्रतिक्रिया थी-

‘ज्ञान बांटने का यह अनोखा और अद्भुत प्रयास है पढ कर आनन्द आया ऐसी रचना के लिये धन्यवाद.’
उसके बाद सुदर्शन भाई हमारे लगभग हर ब्लॉग पर अपनी नायाब प्रतिक्रियाएं लिखते रहे. उनकी प्रतिक्रिया में गंभीर सोच भी होती है, मिलते-जुलते उदाहरण भी होते हैं. मुहावरों, कहावतों, आध्यात्मिकता, सकारात्मता, विशेषणों का समावेश करते हुए वे अपनी बेबाक प्रतिक्रिया से मन मोह लेते हैं.

सच्ची खुशी (लघुकथा)- इंसानियत और यथार्थ का मेल दिखाती हुई प्रतिक्रिया-
”भरे पेट वाले क्या जानें चख के छोड़ दी गई थाली में बची झूठन का मूल्य. उनसे पूछे जिन्होनें कई कई दिनों से कुछ खाया नहीं होता. भूखा क्या जाने स्वाद क्या चीज़ है. उसके लिये तो भूख का मिटना ही स्वाद है.”

शिखर की ललक ( कविता)
”ललक की ललकार है मंज़िल आपके द्वार है, उठो तुम भी अर्जुन की भांति, गांडीव उठा लो इस युग का, चीर दो सीना अंधेरे का, खिल उठेगा फिर सवेरा, जीत लो यह महाभारत, सफलता के शिखर पर हो जाओ आरोहित. ठीक ही कहा है ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत’.”

चाक (लघुकथा)
”माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय ।

एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूगी तोय ॥

कबीर जी ने यूँ तो यह दोहा हमारे समाज के लिये लिखा है. पर इसे कुम्हार के दृष्टिकोण से देखा जाये तो शत प्रतिशत सृजनता और सकारात्मकता के दर्शन होते हैं. जिस कुम्हार को इंगित करते हुए जन मानस के लिये यह दोहा रचा गया है वह कुम्हार माटी की बात को सुनकर भी अनसुना कर देता है और तन मन से माटी को विभिन्न रूप देता रहता है. वह माटी की बात से घबराता नहीं है और बिना जीवन मौत की गुत्थी में उलझे पूरी तन्मयता से काम करता रहता है.”

और शेर चला गया (लघुकथा)
”भारत के महान और निडर प्रधानमंत्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी के बारे में बहुत ही शानदार और जानदार घटना का वर्णन जो अधिकांश को अब मालूम होगी. प्रेरणादायक घटना. इसी प्रकार की एक घटना स्वामी विवेकानंद जी के जीवन में घटी थी जब जंगल से गुजरते समय उन्होंने पीछा करते बंदरों को पलट कर घूरा था और दृढ़ता से उस भयानक स्थिति का सामना किया था और बंदरों की फ़ौज भी सकपका कर वापिस जंगल में चली गई थी.”

चावल के गलने का पता एक दाना चखकर ही किया जाता है, हम तो आपको बहुत से दानों का रसास्वादन करा चुके हैं. चलते-चलते हम आपको बताते चलें, कि सुदर्शन भाई अन्य अनेक ब्लॉगर्स के ब्लॉग्स भी पढ़ते हैं और अपनी राय प्रकट करते हैं.

प्रत्युत्पन्नमति सुदर्शन भाई की विनम्रता का कोई जवाब नहीं. वे बात-बात में लिखते हैं-
”आखिर आपकी कक्षा में पढ़ रहा हूँ… स्नेहिल और उत्साहवर्धक शब्द हमेशा ही हौसला बढ़ाने का काम कर रहे हैं. सादर प्रणाम.”
उनकी निःस्वार्थ सहायता करने की प्रवृत्ति भी कमाल की है. आप जानते ही होंगे, कि श्रंखला ‘कमाल के किस्से’ की हर कड़ी में सुदर्शन भाई का नाम कई बार आता है. उनको जो भी कमाल का किस्सा मिलता है, वे तुरंत फेसबुक या मेल से हमें भेज देते हैं और हमारी ‘कमाल के किस्से’ की कड़ी सज-संवर जाती है.

सुदर्शन भाई, एक राज की बात. हम अपने ब्लॉग्स को फेसबुक पर डालते समय जो दो अनमोल वचन लिखते हैं, आप उन पर जो काव्यमय प्रतिक्रिया करते हैं, वे अनमोल वचन बन जाते हैं. कल के विशेष सदाबहार कैलेंडर-120 में ऐसे बहुत-से अनमोल वचन आपको मिलेंगे. आपकी इन्हीं काव्यमय प्रतिक्रियाओं पर कुछ कविताएं भी बनी हैं, जो समय आने पर हम आपके समक्ष प्रस्तुत करेंगे.

सुदर्शन भाई, ब्लॉग्स का शतक पूरा होने पर आपको कोटिशः बधाइयां और शुभकामनाएं. हमें आपके बारे में जितना कुछ ज्ञात है, उनमें से भी बहुत-सी बातें इस छोटे-से कैनवास में छूट गई होंगी, शेष फिर कभी.

आशा है आप सबको संयोग पर संयोग की यह कड़ी भी पसंद आई होगी. हरि इच्छा रही तो मिलते हैं अगली कड़ी में किसी और हस्ती के साथ.

परिचय - लीला तिवानी

लेखक/रचनाकार: लीला तिवानी। शिक्षा हिंदी में एम.ए., एम.एड.। कई वर्षों से हिंदी अध्यापन के पश्चात रिटायर्ड। दिल्ली राज्य स्तर पर तथा राष्ट्रीय स्तर पर दो शोधपत्र पुरस्कृत। हिंदी-सिंधी भाषा में पुस्तकें प्रकाशित। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रूप से रचनाएं प्रकाशित होती रहती हैं।